रविवार, 19 सितंबर 2010

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा का व्यंग्य – गरीब तेरी अब खैर नहीं

ज जब मैं चाचा दिल्‍लगी दास से मिजाजपुर्सी करने उनके घर गया, चाचा चाची को समझा रहे थे कि धोती में टांके लगा देना और बनियान में पैबंद। चाची के ना नुकर करने पर वो उसे समझा रहे थे, भाग्‍यवान बस एक बार और थोड़ी कोफ्‍त उठा लो, फिर यूं फटी धोती में टांके और बनियान में पैबंद लगाने की कभी जरुरत नहीं पड़ेगी। पता नहीं उनके ‘विजन डॉक्‍यूमेंट' में उन्‍होंने गरीबी को समूल साफ करने का दृढ़ संकल्‍प लिया है। हां ऐसा होगा तो तब, जब वो तख्‍तनशीन हो जाएंगे। भला विपक्ष में बैठकर कोई ग़रीबी जैसी नियामत को क्‍या खाक हटा सकता है कोई गरीब । और अगर ये विपक्ष में नहीं होते तो यकीनन इस चुनावों के एन कल्‍ब मौके पर इनका ध्‍यान गरीबी की और कभी न जाता। वैसे इनकी पार्टी ने सत्ता की एक लम्‍बी पारी खेली है मगर तब ‘गरीबी हटाओ' का नारा देकर ही काम चला लिया था, यूं दृढ़ संकल्‍प पहली बार लिया है।

मैंने चाचा को बीच में टोकते हुए पूछ लिया कि चाचा यह कोई चुनावी चौंचले ही है या इस गरीबी का उन्‍मूलन वाकई किया जाएगा। हर बार चुनावों के वक्त भ्रष्‍टाचार, आतंकवाद आदि आदि के सफाये के शिगुफे छोड़े जाते रहे हैं मगर नतीजे सामने आज तक नहीं आए। तब चाचा मुझे लगभग डांटते हुए बोले, तुम्‍हारे जैसे नेगेटिव सोच वालों का क्‍या किया जाए, कभी किसी बात को समझने की कोशिश ही नहीं करतेे। गरीबी का सफाया किया जा सकता है और वो भी चुटकियों में। और इसके तरीके भी कई है। और हर तरीका कामयाब होने वाला है, चाहे जब आजमाइश की जा सकती है।

पहला तो एक आसान सा तरीका है कि किसी को भी सरकार गरीब होने को प्रमाण पत्र ही नहीं दे। पूर्व में जिनको प्रमाण पत्र दे दिये गए हैं उन्‍हें खारिज कर दिया जाए। गरीबी रेखा को अमीरी रेखा में तब्‍दील कर दिया जाए। हर आदमी से ‘मैं गरीब नहीं' का घोषणा पत्र भरवा दिया जाए, आयकर स्‍थायी खाता संख्‍या सबके लिए समान रुप से लागू कर दी जाए, और ऐलान कर दिया जाए कि हमारे मुल्‍क में आज के दिन कोई गरीब नहीं है और यह काम पांच वर्ष के एक शासन काल में आसानी से किया जा सकता हैं । मगर इसके लिए दृढ़ संकल्‍प की आवश्‍यकता है जो उन्‍होंने पहले ही ले रखा है।

दूसरा तरीका इससे भी आसान है। पहले तो सत्ता में आए लोग अपना बैंक बेलेंस हल्‍का करे और वो उनमें तकसीम कर दें जो जो आज के दिन गरीब है। फिर ‘भूदान आंदोलन' की तर्ज पर ‘रोकड़ा दान आंदोलन' चलाया जाए और जिन-जिन के पास सात पुश्‍तों का बंदोबस्‍त है उनसे माल मत्ता मांगा जाए और जरुरत मंदो को दे दिया जाए फिर देखना गरीबी चंद सैकिण्‍डों में रफूचक्‍कर होती है कि नहीं फिर तो होटलों में प्‍लेटें धोने वाले बच्‍चे बस्‍ते लेकर निजी स्‍कुलों में जाते दिखाई देंगे, फुटपाथों पर सोने वाले बेकार पडी़ कोठियों में आराम फरमाते नजर आएंगे। ईट भट्‌टों पर काम करने वाली मजदूरिनों को ओवर टाइम नहीं करना पड़ेगा। दिन भर परिश्रम करने वाले कामगार फिर दो ईंटों के चूल्‍हे पर खाना बनाते नजर न आकर किसी रेस्‍तरां में नाश्‍ता करते और लाइन होटल में खाना खाते देखे जा सकेंगे। किधर भी नजर घुमा लो गरीबी नाम की फाख्‍ता फुर्र हो चुकी होगी, कहीं नजर नहीं आएगी। ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

तीसरा और कारगार एक उपाय और है। इससे यह गरीबों और अमीरों के बीच की खाई पाटी जा सकती है इस खाई में आवाम के नुमाइन्‍दों के भत्ते, सहूलियतें, इन ऊंचे पदों पर बैठे अहलकारान की पैंतीस पैंतीस हजार रुपए की स्‍केलस , ये बेतहाशा हो रहे सरकारी खर्चे आदि आदि डालकर इसे पाटी जा सकती हैं, और देखते ही गरीबी छूमंतर हो जाएगी। मगर इसके लिए कुछ करना पडे़गा। सिर्फ ‘दृष्‍टि पत्र' जारी करने से कुछ नहीं होगा, चुनाव सम्‍पन्न न होने तक कोरी भाषणबाजी से तो कुछ हासिल होने वाला नहीं। ये भाषण तो सुनते सुनते हमारे कान पक गए हैं।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

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