शनिवार, 25 सितंबर 2010

संजय जनागल की लघुकथाएँ

लघुकथाएं

टुकड़े

संजय जनागल

‘‘साब, ये क्‍या सुनने में आ रहा है कि जाति आधारित जनगणना होने वाली है?'' चंपक मालिक के पाँव दबाते हुए बोला।

‘‘हाँ, तुमने सही सुना है।'' मालिक ने कहा।

‘‘लेकिन आप तो हमेशा जातिवाद मिटाने के पक्षधर रहे हैं? फिर ये?'' चंपक फिर बोला।

चंपक की ओर मुँह करके मालिक ने कहा, ‘‘पार्टी को बचाने के लिए उनकी बात माननी पड़ी। पार्टी के दो टुकड़े होने की नौबत आ गई थी?''

‘‘पार्टी के दो टुकड़े ?? मैं समझा नहीं।'' चंपक आँखें नीची करके बोला।

‘‘चंपकिया तू तो बहुत भोला है। अगर जाति आधारित जनगणना की मांग को ठुकरा देते तो अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और शीर्ष अधिकारी मिलकर नई स्‍वतंत्र पार्टी बना लेते?''

‘‘पार्टी को दो टुकड़ों में बंटने से तो आपने बचा लिया लेकिन क्‍या इस जाति आधारित जनगणना से देश कई टुकड़ों में नहीं बंट जायेगा।'' इस बार चंपक की आवाज़ में एक अजीब सा द्वेष था। परन्‍तु तब तक मालिक गहरी निद्रा में सो चुके थे।

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ऐसे ही....

खरगोश को अपने जाल में फंसाने के लिए गीदड़ ने उसे कहा, ‘यदि तुम मेरे मित्र बन जाओ तो तुम्‍हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।'

खरगोश चुपचाप खड़ा गीदड़ की बातें सुनते हुए भागने का अवसर ढूंढने लगा।

गीदड़ फिर बोला, ‘एक बार मैं गलती से शेर की मांद में घुस गया, फिर क्‍या था सामने शेर खड़ा मुझे घूरता रहा, परन्‍तु उसकी मुझ पर हमला करने की हिम्‍मत नहीं हुई। मैंने शेर को एक ही बार में चारों खाने चित कर दिये और उसके बाद वो शेर कभी भी अपनी मांद में नहीं आया और आज तक मैं उसकी मांद में रह रहा हूँ। मेरी वीरता के तो बहुत उदाहरण है।'

खरगोश चुपचाप सुनता रहा।

‘इसी तरह एक बार बब्‍बर शेर का सामना हो गया। लेकिन मैं डरा नहीं और पूरा एक दिन बब्‍बर शेर मेरे सामने खड़ा रहा। ना मैं हिला और ना बब्‍बर शेर।' जैसे ही बोलते-बोलते गीदड़ ने आसमान से धरती की तरफ देखा कि खरगोश तो गायब है। अपनी किस्‍मत को बुरा भला कहते हुए जैसे ही पीछे मुड़ा तो हक्‍का-बक्‍का रह गया और कुछ ही देर में गिड़गिड़ाता नजर आया, ‘मैं तो ऐसे ही कह रहा था....आप तो महाबली हैं.....आप तो जंगल के राजा हैं।'

द संजय जनागल

अनु कम्‍प्‍यूटर्स, बड़ी जसोलाई,

रामदेवजी मन्‍दिर के पास, चौखूंटी,

बीकानेर-01 मो. 9252969180

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