महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल

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ग़ज़ल

यादों को विस्मृत कर देना बहुत कठिन है,

खुद को ही धोखा दे पाना बहुत कठिन है।

 

जाने कैसी चोट लगी है अंतस्थल में,

टूटे दिल को आस बंधाना बहुत कठिन है।

 

तैर रही हो विकट वेदना जिनमें छलछल,

उन आंखों की थाह जानना बहुत कठिन है।

 

नादानों को समझा लेंगे कैसे भी हो,

समझदार को समझा पाना बहुत कठिन है।

 

जीवन सरिता के इस तट पर दुख का जंगल,

क्या होगा उस पार बताना बहुत कठिन है।

 

झूठ बोलने वालों ने आंखें दिखलाईं,

ऐसे में सच का टिक पाना बहुत कठिन है।

 

मौत किसे कहते हैं यह तो सभी जानते,

जीवन को परिभाषित करना बहुत कठिन है।

 

उमड़ रहे हों मन में चाहे भाव हज़ारों,

कागज़ पर कविता लिख देना बहुत कठिन है।

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महेन्द्र वर्मा

व्याख्याता, डाइट, बेमेतरा, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़

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7 टिप्पणियाँ "महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल"

  1. यादों को विस्मृत कर देना बहुत कठिन है,

    खुद को ही धोखा दे पाना बहुत कठिन है।


    बहुत सही बात ..सुन्दर गज़ल

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  2. अलग-सी ... बेहतरीन ग़ज़ल ... शुक्रिया हम तक पहुंचाने का !!

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  3. बहुत शानदार ग़ज़ल .........

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  4. मौत किसे कहते हैं यह तो सभी जानते,
    जीवन को परिभाषित करना बहुत कठिन है।

    बहुत मजबूत फ़िलासफ़ी को सहेजे बेहतरीन शे'र। जिसमें द्वंद और व्यंग दोनों अगल बग़ल हैं।

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  5. भाई अलबेला जी, अमिताभ जी और आदरणीया संगीता जी, ग़ज़ल आपको पसंद आई इसके लिए आभार...उत्साहवर्द्धक टिप्पणियों के लिए धन्यवाद।

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  6. आदरण्रीय दानी जी, आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा मैं कर ही रहा था...काव्यात्मक टिप्पणी के लिए आभार।

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  7. ajay sharma7:43 pm

    समझदार को समझा पाना बहुत कठिन है
    बहुत सही बात

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रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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