शनिवार, 25 सितंबर 2010

श्याम गुप्त की ग़ज़ल

आशनाई
यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है |
आंधियां भी तो मगर हमको रास आईं हैं |


मुश्किलों का है सफ़र जीना यहाँ पर ऐ दिल,
हर एक मुश्किल नई राह लेके आई है  ||


तू न घबराना गर राह में पत्थर भी मिलें ,
पत्थरों में भी उसी रब की लौ समाई है |


डूब कर जान लो इसमें है अभी दरिया गहरा ,
कौन जाने न रहे कल को ये गहराई है |

आशिकी उससे करो श्याम' हो दुश्मन कोई,
दोस्त , दुश्मन को बनाए वो आशनाई है ||


डा श्याम गुप्त

1 blogger-facebook:

  1. अच्छी ग़ज़ल "क़ाफ़िये"्में कुछ और शब्द व कुछ बिम्बों का प्रयोग और हो्ता तो यह और भी अच्छी हो सकती थी।

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