मंगलवार, 28 सितंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल

sanjay dani

आईनों  से नहीं है  दुशमनी  मेरी ,

अक्श से अपनी डरती ज़िन्दगी मेरी।

 

हुस्न ही है मुसीबत का सबब मेरा,

क्यूं इबादत करे फ़िर बे-खुदी मेरी ।

 

साहिलों की अदा मंझधार के दम से।

लहरों को पेश हरदम   बन्दगी  मेरी ।

 

घर वतन छोड़ आया हुस्न के पीछे,

आज खुद पे हंसे   सरकशी मेरी ।

 

सूर्य   से क्यूं   नज़र लड़ाई    थी ,

खफ़ा नज़रों से अब रौशनी मेरी ।

 

सब्ज गुलशन समझ बैठा मै सहरा को

अब    कहां   से बुझेगी  तशनगी    मेरी।

 

शमा के प्यार मे मै जल चुका इतना

मर के अब रो रही है खुदकुशी मेरी ।

 

मै बड़ी से बड़ी खुशियों को पकड़ लाया

दूर    जाती गई     छोटी खुशी     मेरी।

 

तू नहीं    तो      नशा काफ़ूर है दानी ,

इक नज़र ही तुम्हारी मयकशी मेरी ।

----.

3 blogger-facebook:

  1. शमा के प्यार मे मै जल चुका इतना
    मर के अब रो रही है खुदकुशी मेरी ।

    अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

    जाने काशी के बारे में और अपने विचार दे :-
    काशी - हिन्दू तीर्थ या गहरी आस्था....

    उत्तर देंहटाएं
  2. सब्ज गुलशन समझ बैठा मैं सहरा को,
    अब कहां से बुझेगी तिश्नगी मेरी।
    ज़िदगी का हर वाकया मृगतृष्णा ही तो है
    सच्चाइयों से रू-ब-रू कराती ग़ज़ल।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सब्ज गुलशन समझ बैठा मै सहरा को

    अब कहां से बुझेगी तशनगी मेरी।

    Bahut hi sunder ghazal se roobaroo hui hoon. Shabdon ki kalatmak, kasavat bunawat aur lekhni ke tewar bahut hi bhale lage.
    daad ke saath

    उत्तर देंहटाएं

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