गुरुवार, 30 सितंबर 2010

धूमकेतु की हास्य कविता – मेकअप उतर जाने के बाद

दिख रही है मंच पर, जो सुन्दरी ऐ दोस्तों

कल दिखेगी भूतनी, मैकप उतर जाने के बाद।

 

कर रही है नाज अपने खेत और खलिहान पर

घास फूंस रह जायेगी, साजन के घर जाने के बाद।

 

सप्त सुर की ढोलकी सी, बज रही है रात दिन

ढपला वो रह जायेगी, चमड़ी उधड़ जाने के बाद।

 

रंग रोगन से सजाई, सेकण्ड हैण्ड दूकान को

कौन पूछेगा उसे कबाड़ी के दर जाने के बाद।

 

कांच की दूकान में जब पड़ती है पत्थर की चोट

कौन पूछेगा प्रिय, दर्पण दरक जाने के बाद।

 

साधु सन्यासी महात्मा मुल्ला हो या पादरी

खाक में मिल जाएंगे, पतझर में झर जाने के बाद।

 

धीरे-धीरे भोगिये, जीवन के आनंद को

क्या रखा है देखना, बसंत गुजर जाने के बाद।

 

चढ़ गई है मंच पर, फिर देखिए सुर की नदी

कीचड़ ही कीचड़ बचेगी, नदिया उतर जाने के बाद।

 

रात दिन नोटों की बारिश, खा रही दीमक जिन्हें

मिट्टी में मिल जायेगी, ठुइयाँ के उर जाने के बाद।

 

शोहरतें मिलती है केवल, एक सीमा तक हुजूर

जमीन पर आ जाएगी, पर के कतर जाने के बाद।

 

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धूमकेतु के हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह – देख रहे हो भोलेनाथ से साभार.

5 blogger-facebook:

  1. मजहब , जात, पात, कोई भी बहाना लड़ पड़ो,
    क्या फर्क पड़ता है, अकल जाने के बाद ...

    अच्छी रचना, हास्य के साथ कहीं कहीं व्यंग्य की फुहार, लिखते रहिये ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. मज़ा आ गया. जबरदस्त क्या कटाक्ष है. बहुत पैनी धार है आपकी .

    उत्तर देंहटाएं
  3. धूमकेतु जी की हास्य-व्यंग्य रचना पढ़ने का अवसर देने के लिए आभार...तीखा व्यंग्य है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छी कविता रचनाकार को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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