शनिवार, 25 सितंबर 2010

राजीव श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता – मन की गंगा

मन की गंगा

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गंगा मैली हो गयी घटा देश का मान

गंगा को साफ करने का चला रहे अभियान

 

एक और गंगा है जो सब के मन में बहती

मुझे भी साफ करो ये दबी जुबां में कहती

 

क्रोध जा मिला है इस में, नफ़रत ने जगह बनाई

एक दूसरे का वध कर रहे,लड़ रहे है भाई-भाई

 

छल-कपट से हो रही आरती,क्रोध से लगता भोग

लहू से कर रहे अर्चना,नहा रहे सब लोग

 

कभी जहाँ बस्ती थी सच्चाई, और सुन्दर थी काया

आज अधर्म और अंधकार जा मिला, जब से कलयुग आया

 

करना ही है साफ, तो कर साफ मन की गंगा

नहीं तो वो दिन दूर नहीं ,जब होगा हर तरफ दंगा

 

जो मन की गंगा साफ रहे तो गंगा भी तर जाए

जो स्वच्छ मन ही लगाए डुबकी ,तो गंगा भी स्वच्छ हो जाए

 

मन की गंगा को साफ करने का बता रहा उपाय

काम-क्रोध, ईर्ष्या, देख कभी पास ना आय

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

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3 blogger-facebook:

  1. वाह वाह बस सिर्फ़ इतना ही इंसान कर ले तो क्या बात हो मगर सिर्फ़ इतना ही नही कर पाता और ढकोसलो के जाल मे घिरा रहता है।

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  2. बहुत अच्छी लगी कविता में अन्तर्निहित भावना...

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  3. अच्छी काव्यमय अभिव्यक्ति।

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