गुरुवार, 16 सितंबर 2010

मो. अरशद खान की बाल कहानी - बंटवारा

किसी गांव में एक बूढ़ा किसान रहता था। उसके दो लड़के थे। एक का नाम बड़कू और दूसरे का नाम छुटकू था। दोनों हमेशा आपस में झगड़ते रहते थे। किसान उनको बहुत समझाता पर उनके कानों पर जूं तक न रेंगती।

एक बार किसान बीमार पड़ गया। बहुत दवा-इलाज किया, पर कोई फायदा न हुआ। उसका स्‍वास्‍थ्‍य निरंतर गिरता गया। एक दिन उसने सदा के लिए आंखें मूंद कर लीं।

किसान की मृत्‍यु के बाद कुछ समय तक तो दोनों लड़के आपस में मेल से रहे। लेकिन एक दिन किसी बात पर दोनों झगड़ पड़े। बड़कू कहने लगा, ‘‘देखो छोटे, अब हम एक जगह नहीं रह सकते। अब हमें पिता की संपत्‍ति आपस में बांट लेनी चाहिए।''

‘‘हां, यही ठीक रहेगा। रोज-रोज की झंझट से छुटकारा मिलेगा,'' छुटकू बोला।

दोनों ने धन-दौलत, जमीन और अन्‍य सभी चीजें आपस में बांट लीं। बस, बच रही एक गाय। समस्‍या यह आई कि गाय किसके हिस्‍से में जाए ?

इस बात पर दोनों में बहस होने लगी। बहस ने धीरे-धीरे विवाद का रूप धारण कर लिया। आस-पास के लोग इकट्‌ठा हो गए। जब बहस से कोई हल न निकला तो पंचायत बुलाई गई।

पंचों के सामने बड़कू-छुटकू ने अपनी समस्‍या कह सुनाई। सारी बात जानकर पंचों ने अपना निर्णय सुनाया, ‘‘चूंकि गाय एक ही है इसलिए इसे बांटना संभव नहीं है। अतः दोनों भाइयों को चाहिए कि वे गाय का दूध आपस में बांट लिया करें।''

पंचायत के निर्णय से दोनों भाई संतुष्‍ट हो गए।

पर अगले दिन नई समस्‍या आकर खड़ी हो गई। सवाल यह था कि गाय को चारा-भूसा कौन खिलाए ? इसी बात पर दोनों फिर झगड़ने लगे।

फिर पंचायत बैठी। पंचों ने निर्णय दिया-‘‘दोनों भाई बारी-बारी से एक-एक दिन गाय के दाने पानी का प्रबंध करें।''

पंचायत के निर्णय से दोनों भाई सहमत हो गए।

कुछ दिन शांति से बीते।

कुछ दिनों के बाद गाय ने सुंदर बछड़े को जन्‍म दिया। दोनों भाई बहुत खुश हुए। लेकिन एक समस्‍या फिर आ खड़ी हुई। सवाल यह पैदा हुआ कि बछड़ा किसके हिस्‍से जाए। इस बात को लेकर दोनों फिर लड़ पड़े।

लड़ाई-झगड़े से कोई हल न निकला तो उन्‍होंने पंचायत के सामने फिर गुहार लगाई।

पंचायत ने निर्णय दिया-‘चूंकि बछड़े का बंटवारा संभव नहीं है इसलिए उसे पंचायत में दान दे दिया जाना ही उचित होगा।'

‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी' यह सोचकर दोनों भाई बछड़ा दान देने पर सहमत हो गए।

शाम को बड़कू दूध दुहने बाड़े में पहुंचा तो हैरान रह गया। गाय की हालत विचित्र हो रही थी। वह जोर-जोर से रंभा रही थी। रस्‍सी से छूटने के प्रयास में उसने अपनी गर्दन घायल कर ली थी। चारे की नांद एक ओर औंधी पड़ी थी। बड़कू हैरान रह गया। वह भागकर छुटकू के पास पहुंचा और सारी बात बताई।

सारी बात जानकर छुटकू बोला, ‘‘भैया मुझे तो लगता है बछड़े के बिछोह में गाय पगला गई है।''

‘‘अब दूध कैसे दुहेंगे ?'' बड़कू बोला।

‘‘चलो फिर कोशिश करके देखते हैं।''

दोनों बाड़े के अंदर जा पहुंचे। गाय उन्‍हें देखते ही क्रोध से फुंफकारने लगी। उसके नथुनों से झाग उड़ने लगा।

दोनों डरते-डरते अंदर पहुंचे और दुहने की कोशिश करने लगे पर सफल न हुए। पुचकारा, हरी घास की लालच दी मगर बात फिर भी नहीं बनी। घंटे भर की कोशिशों के बाद दो-दो दुलत्‍तियां खाकर दोनों बाहर आ गए।

दो दिनों तक गाय का यही हाल रहा तो दोनों फिर भागकर पंचों के पास पहुंचे।

बड़कू ने पंचों के सामने गिड़गिड़ाकर कहा, ‘‘पंचों जब से हमने बछड़ा दान दिया है, गाय की बुरी हालत हो रही है। दो दिन से उसने तिनका तक नहीं छुआ है। दूध दुहना तो दूर, उसके पास जाना मुहाल है।''

सारी बात सुनकर सुनकर पंचों ने कहा, ‘‘इस तरह से तो गाय की मृत्‍यु हो जाएगी और तुम्‍हें गो हत्‍या का पाप लगेगा। बछड़ा भी बिना गाय के दूध के जीवित नहीं रह सकता है। उचित यही होगा कि गाय भी पंचायत को दान दे दी जाए।''

मरते क्‍या न करते गाय भी पंचायत को दान करनी पड़ी।

लौटते समय बड़कू ने छुटकू से कहा, ‘‘हम बेकार ही बंटवारे के चक्‍कर में फंसे़। बछड़ा तो गया ही था, गाय भी हाथ से निकल गई।''

‘‘हां भैया,'' छुटकू बोला, ‘‘बंटवारा कभी सुख नहीं देता।''

- डॉ. मोहम्मद अरशद खान

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