गुरुवार, 9 सितंबर 2010

एस के पाण्डेय का व्यंग्य – एक मास्टर का मूड

एक मास्टर का मूड

एक कॉलेज में एक अध्यापक ऐसे भी थे। जो सदा लड़कों को कोसते रहते थे। उनका कहना था कि तुम लोगों के कमरे में आते ही मूड ऑफ़ हो जाता है। तब क्या खाक पढाऊँ ?  चलो दुनियाबी दुनिया के बारे में बताते हैं। कहते कि लड़कियों को पढ़ाने जाता हूँ, तो पता ही नहीं चलता कि एक घंटा कब बीत गया। एक दिन तो चार बजे के बाद भी पढ़ाए जा रहा था। तब प्रिंसिपल साहब बोले शर्मा जी चार कब का बज चुका। तब जाकर क्लास छोड़ा। यहाँ तो पाँच मिनट में ही उबन होने लगती है। इसी से दुनियाबी दुनिया के बारे में पढ़ा कर समय काटता हूँ।

कहते कि घर से आता हूँ, तो अगर कभी मूड उखड़ा रहता है। तो एक्सट्रा क्लास ले लेता हूँ। क्लास खाली ना होने पर किसी से कहकर उसका क्लास ले लेता हूँ। वह भी खुश हो जाता है और मैं भी। तरह-तरह  की  क्रीम व सेंट की महक नाक में पड़ते ही मूड सही हो जाता है।

उसके बाद पढ़ाना शुरू। क्या-क्या और कबतक पढ़ा जाएँ , इसकी कोई सीमा नहीं। कभी-कभी तो कोई लड़की कह भी देती थी कि सर जी ये सब तो किताब में नहीं है। तब  कहते थे कि जो किताब में है,  उसे तो खुद भी पढ़ सकती हो।  जो इन किताबों में कहीं नहीं है। जो कोई नहीं पढ़ाता,  मैं वो भी पढ़ाता हूँ। जिंदिगी में हर चीज की जरूरत पड़ती है।

कुछ लड़कियां हँसती, कुछ शर्म से सिर नीचा किए रहतीं। कुछ चाहकर भी किसी से न कह पाती। शर्मा जी कहते मुझसे क्या शर्माना है ?  मैं तो तुम लोगों की झिझक कम करना चाहता हूँ।

जब वे पढ़ाने आते तो  दूसरे कक्षाओं के  लड़के भी कभी-कभी आकर बैठ जाते थे। एक बार कुछ विद्यार्थियों ने कहा। अब तक आप ने ट्रांसलेसन भी नहीं पढ़ाया। तब बोले चलो लिखो एक वाक्य- 'तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त'। इसी का ट्रांसलेसन समझाने लगे। किसी ने कहा सर कोई एक इमपोरटेंट करा दीजिये जो बोर्ड परीक्षा में आ जाये। बोले इससे इमपोरटेंट और कोई नहीं है। ये समझ लो तो सब कर ले जाओगे।

बहुत से वुद्धिजीवियों  , शिक्षाविदों, व विज्ञानियों का रुझान इंटरडिसप्लिनरी  शिक्षा की ओर है। मतलब बिषयों की सीमा से परे जाकर विद्यार्थियों को शिक्षा दी जानी चाहिये। जैसे प्राणिविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान, रसायन, भौतिकी, गणित, कम्प्यूटर, मैंनेजमेंट आदि को उच्च स्तर पर यथासम्भव साथ लेकर चलना चाहिये। कुछ लोंगो का मत है कि आर्ट और साइंस के बीच की दूरी भी कम कर देनी चाहिये। शर्मा जी इसके बहुत ही बड़े पक्षधर हैं और इस व्यस्था को जी-जान से अमल में ला रहे हैं। अंग्रेजी पढ़ाते हुए कभी क्वांटम फिजिक्स से डिराक नोटेसन तो कभी हिंदी से जायसी के जो प्रथम कर लावै, तो कभी बिहारी के भरे भवन में, तो इसी तरह कभी समाजशास्त्र आदि से भी कुछ चयनित बिषयों से छात्रों तथा खासकर छात्राओं का ज्ञानवर्धन करते हैं। जनसंख्या बृद्धि के कारणों पर तथा उसे रोकने के लिए लडकियों को समझाते हैं। इससे ये भी पता चलता है कि शर्मा जी देश की समस्याओं से भी काफी चिंतित रहते हैं और विद्यार्थियों से खासकर लडकियों से बहुत उम्मीद भी रखते हैं।

घर पर उन्होंने कोचिंग भी पढ़ाना शुरू किया। शुरू में लड़कों के साथ ही लड़कियों को भी पढ़ाते थे। बाद में एक दिन बोले अब तुम लोगों का क्लास अलग रहेगा। कुछ लड़कों ने आपत्ति किया नहीं सर, प्लीज ! ऐसा मत कीजिए। लेकिन नहीं माने। बोले ये भावी माताएं हैं। इनका कुछ तो ख्याल करना ही पड़ेगा। तुम लोगों के सामने उनको ठीक से पढ़ाने में मजा नहीं आता है।

प्रैक्टिकल वगैरह में नम्बर दिला देते थे। इसी से कुछ लड़के व लडकियाँ न चाहते हुए भी पढ़ते थे। शियाकत कौन करता ?  उसका तो फेल होना तय ही था। कुछ लोग फेल भी होते थे। खासकर कोई लड़की हो जाये तो लड़के उड़ा देते कि शर्मा  सर ने ही कराया होगा। इनका विरोध करके कोई नहीं बचा। इसी से तो लोग इनकी कोचिंग में भरे रहते हैं। इनकी खासियत थी की हर बिषय पढ़ाते थे। गणित, विज्ञान व अंग्रेजी आदि। सिलेबस का भी और सिलेबस के बाहर का भी। बहुत लोग तो सिलेबस भी पूरा नहीं करा पाते। किताब का भी और किताब के बाहर का भी। खासकर लड़कियों को। वैसे लड़कों पर कम मेहरबान नहीं रहते थे।

एक बार परीक्षा के दौरान एक लड़की अचानक बेहोश हो गयी। सर भी गार्डी कर रहे थे। लड़कों ने तो संकोच बश उठाया नहीं। अन्य लडकियाँ भी मूक व पंगु बनी रहीं। शर्मा जी ने फ़ौरन उसे सिर्फ उठाया ही नहीं बल्कि क्लास से बाहर लेकर चले गये। बाद में लड़के खबर लाये कि प्रिसिपल साहेब शर्मा सर को डांट रहे थे। कहीं किसी दिन कोई बवाल न खड़ा हो जाये।

एक बार बोले जब रिटायर हो जाऊँगा तो एक अस्पताल खोलूँगा। मतलब दवाखाना। कहते सुई लगाना आता है। पहले ही सीख लिया था। महिलाओं और लडकियों को बहुत कम लागत पर दवा देने की बात करते थे। आला वगैरह भी रखने को कहते थे। कोई चाहे इंजेक्सन लगवाने आये या दवा लेने। ये पहले मुयायना करना चाहते थे। मतलब जो काम डॉक्टर से भी छूट जाये उसे ये पूरा कर दिया करेंगे। लड़के हँसते। कहते सर आपके दवाखाने पर तो भीड़ लगी रहेगी। आप जैसे डॉक्टर की बहुत जरूरत है। कुछ लडकियाँ व महिलाएं तो सिर्फ आपके अस्पताल में ही आया करेंगी।

कई  वर्ष बीत चुके  हैं । पता नहीं शर्मा जी का अस्पताल कैसा चल रहा है ? 

आशा है वहाँ पर्याप्त भीड़ होगी । कॉलेज में भी शर्मा जी के स्थानपर दुनियाबीदुनिया के बारे में पढ़ाने वाला कोई ना कोई तो आ ही गया होगा । आज शायद देश में शर्मा जी जैसे डॉक्टर और मास्टर की कमी नहीं  है ।

डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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  1. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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