सोमवार, 20 सितंबर 2010

जगमोहन आजाद की कविता – लेह से

लेह से

अभी-अभी की तो बात है

मां ने-

अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए

बिछाया था बिछौना

ताकि वह सो सके सुकून की नींद

रात भर,

अभी-अभी की तो बात है

जब मां-बाबा

सुना रहे थे कहानी

अपने अतीत की, नौनिहालों को

अभी-अभी की तो बात है

जब पति-पत्नी का प्यार

सिमटता था अंजुरी में

उसने देखा था...कल का सवेरा

अपने प्यार की सुनहरी आंखों में...

अभी-अभी की तो बात है
उस गांव में गूंजी थी

किलकारियां...एक नवजात की

और...अभी-अभी सीखा था चलना...

मुन्ना ने पंया-पंया

खुशी के मारे...कितनी चिल्लायी थी-

मां...मुन्ना के पंया-पंया चलने पर,

अभी-अभी की तो बात है

यहां खेत-खलिहानों में-

खेल रहा था बचपन

खेल नए- नए...मदमस्त-मदमस्त

कुछ ने बनाये थे

खुद के लिए घर रेत से

कुछ तिनका- तिनका समेट-

बना रहे थे...घोंसला

पेड़ की टहनियों में...

अभी-अभी की तो बात है

कुछ ने संज़ोए ही थे...सपने कल के लिए

और...अभी-अभी तो-

उठाया था...उसने घूंघट...उसका

जिसकी चाह में

करवटें बदल-बदल कर गुजारी थी

रातें उसने...

सब कुछ अभी-अभी ही हुआ था

पंछी चहचहा ही रहे थे

अपनों से मिलने पर

मां की रोटी...फूल ही रही थी...चूल्हे में

बच्चे लौट आए थे-

थके हारे...घरों को अपने

हर तरफ खुशहाली ही खुशहाली थी

गुनगुना रहे थे...'शेरिंग' लोक गीत कोई

प्रभु प्रार्थना में डूबे थे...लामा

सबकी शांति के लिए...लेह में...

और

अभी-अभी की ही तो बात है

ना जाने लगी किसकी नज़र-

इन सब को,लेह में...

वहां...जहां कुछ पल पहले ही

खेल रहे थे नौनिहाल

कुछ ने जलाए थे चूल्हे

कुछ भर रहे थे अटखेलियां...प्रेम की

जहां...गूंज रहे थे...लोक गीत

की जा रही थी...प्रार्थना प्रभु की-

कुछ ने खुद के लिए...संजोए थे सपने

न जाने कुदरत क्यों रोयी..लेह में...

और...हर तरफ फैला गयी

मंजर तबाही का

बिखेर गयी...खेल-खिलौने-सपने नौनिहालों के

न किसी की लिए एक घरौंदा ही-

रखा बचाए

चारों ओर तबाही ही तबाही फैला

कुदरत रोयी और रोयी...लेह में...
और...कुदरत के इस तांडव के बाद...

हम भी हुए शामिल लेह में-

सबसे पहले...सबसे तेज

उन चीखती- बिलखती आवाज़ों

भूखे- नंगे बच्चों...

टूटे- बिखरे घरों

कुछ...बची हुई...बिखरी हुई...धरोहरों के साथ

आंखों में कुछ बूंद आस

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  1. एक ख़ास विषय की रवानी लिये एक अच्छी मर्मिक कविता। जगमोहन जी को बधाई।

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