शनिवार, 25 सितंबर 2010

राजीव श्रीवास्तव की हास्य - व्यंग्य कविता - उदघाटन से पहले टूटा पुल

उदघाटन से पहले टूटा पुल

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लाखों का निकला टेंडर और जेबें हो गयी फुल

उद्घाटन से पहले देखो टूट गया था पुल

 

जनता के मेहनत की कमाई इस पुल मैं हुई बर्बाद

पर किसी के घर बन गये कोई हुआ आबाद

 

पुल से नदी पार करने का सपना मन मैं थे संजोए

सोच रहे थे उनके ख़ुशियों को किन के लग गई हाए

 

नहीं पता इन्हें कि क्या टूटे पुल की कहानी

घटिया सा सामान लगाया खूब करी मनमानी

 

पुल से ज़्यादा इनको चिंता कमीशन की सताई

सोच रहे थे ज़्यादा से ज़्यादा इससे करो कमाई

 

बना के तैयार कर दी इन्होंने जिंदा लास

पैसे देकर आकाओ से पुल कराया पास

 

सजी खूब महफ़िल थी उस दिन हाउस हुआ था फुल

नेता जी फीता काटे उससे पहले टूटा पुल

 

सभी के सपने ऐसे टूटे जैसे टूटे कॉच

नेता जी कह के चल दिए की कराव जाँच

 

जनता को दे जाँच का लोलीपाप मामला किया था गुल

देशद्रोही फिर मिल बैठे बनाने को नया पुल

 

सोच रहा राजीव की उपर वाले ने किया अहसान

जो पुल टूटता बाद मैं तो जाती कितनी जान

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

मेडिकल कॉलेज हल्दवानी

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