शनिवार, 25 सितंबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 43

ये कंगन बज परस्‍पर कर रहे हैं बात यूं आली।

अधूरी रह गयी लगती कोई चाह ज्‍यूं आली॥

 

चिहुक हैं हर्ष की या दर्द की सिसकी हैं क्‍या जानू ,

अभी निर्णय न कर पायी इसे क्‍या नाम दूं आली।

 

छुपा बैठा हो भीतर तो भला हो क्‍या खबर हमको ,

वगरना दूर तक दिखता न कोई चारसू आली।

 

लिपट कर ये तरुवर वल्‍लरी कहते चुहल करके,

अगर परवान चढ़ ना हो तो किसी को थाम लूं आली।

 

अरी ये ढ़ोर वय का क्‍या क्‍या करने को उतारु हैं,

खड़ी हैं लाज बैरन बन के चरवाहा क्‍यों आली।

 

 

ग़ज़ल 45

छोड़ कर जाना नहीं तू गाँव की दहलीज को

शहर में तहजीब के पहरे कड़़े हो जायेंगे॥

 

इन खरोंचों को हिफाजत से रखोगे तो यही,

जख्‍म आखिर एक दिन काफी बड़े हो जायेंगे।

 

कब्र गहरी खोद कर के इस तरह पत्‍थर चुने,

जैसे हो शुब्‍हा कि ये उठ कर खड़े हो जायेंगे।

 

मर गये बेमौत इतने आज तो आँसू बहा

कल सुबह अखबार के ये आँकड़े हो जायेंगे।

 

चाँद ने मायूस हो कर चाँदनी से यूं कहा,

अपना क्‍या होगा अगर तारे बड़े हो जायेंगे।

 

इस कदर जज्‍बात को छेड़ा करो न रात दिन,

हैं बड़े मासूम ये फिर चिड़च़िड़े हो जायेंगे।

 

ग़ज़ल 60

खरे मोती बनी जब जब बही बूंदी पसीने की।

ह़कों से रह गयी वंचित वही, बूंदी पसीने की॥

 

उचित हक़ दो इन्‍हें इनका नहीं सैलाब बन कर के,

डुबो देगी तेरी दूनिया यही बूंदें पसीने की।

 

इसे पूँजी व साम्‍यवाद ने मिल कर के लूटा है,

दिलासे ले के बस बहती रही बूंदे पसीने की।

 

हिमायत करने वाले सरनगूं होंगे नदामत से,

दिखादे खोल कर अपनी बही बूदें पसाने की।

 

ये संगो खिस्‍त से मिलके बने खालिक फसीलों की,

कभी फूलों की नकअत में छुपी बूंदें पसीने की।

 

 

ग़ज़ल 35

खोल रखे या बंद पड़ें हो इक मुद्दत से दरवाजे।

सदा गुजरगाहों को तकते हैं हसरत से दरवाजे॥

 

दरवाजे पर बैठे रहते मदद मिले ही उठते थे,

आज उन्‍होने बंद कर लिए झट से अपने दरवाजे।

 

केवल बौनों को ही देखा इस घर से आते जाते,

किसकी खातिर बना रखे फिर इतने ऊँचे दरवाजे।

 

सिंहद्वार पर बिठा रखे हैं जिसने चौकीदार कई,

नहीं जानता खुले पड़े हैं उसके पिछले दरवाजे।

 

चाहे कितना ही धीरे से खोलो अथवा बंद करो,

चुगलखौर हैं बज के सारा जाहिर करते दरवाजे।

 

दरवाजे पे दस्‍तक देने फिर दुखः ही आया होगा,

इसी वहम से खुले नहीं हैं किसी भी घर के दरवाजे।

 

बंद किवाड़ों पर मकड़ी ने भी तहरीर लिखी ‘जांगिड'

ऐसे होते लावारिस या यायावर के दरवाजे।

 

ग़ज़ल 34

नहीं ध्‍यान कुछ भी रख पाते अक्‍सर लोग दलाली में।

कितने कितने छेद हो गये किसकी किसकी थाली में।

 

कीड़े जब आपस में मिलते बड़े फख्र से बतियाते,

किसने क्‍या क्‍या लुत्फ उठाये अपनी अपनी नाली में।

 

नहीं मिला माकूल लफ्‍ज तो काम चलाया गाली से ,

बचा खुचा परिचय दे डाला उसने गाली गाली में।

 

कीमत लुढ़की कौड़ी के भी मौल से नीचे उतर गयी,

नहीं लिवाली अच्‍छी आवक हाजिर हैं बिकवाली में।

 

ले ने दे ने और पकड़ने वाले रिश्वतखोर हुए ,

इसी लिऐ तूफान न आता हैं अब चाय की प्याला में।

 

खुद की तुलना में वो सबको आछा हल्‍का मान रहा,

क्‍या कर रखा उसने अपनी माप तौल प्रणाली में।

 

अपनी कोई सोच नहीं हैं नहीं किसी की सनते हैं,

इसी को कहते आटा गीला हो जाना कंगाली में।

 

चोर, उचक्‍के, गुण्‍डे, डाकू हर षोबे में काबिज हैं,

जिनसे रखवाली करनी थी वो बैठे रखवाली में।

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3 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन ग़ज़ल हैं भाई .... शुक्रिया पढवाने का !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. ्छोड़ कर जाना नहीं गांव की दहलीज़ को'
    शहर में तहज़ीब के पहरे कड़े हो जायेंगे। अच्छी अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

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