बुधवार, 8 सितंबर 2010

विजय कुमार शर्मा की कविताएँ

vijay

१. हर आँगन में आग है

अंगारों की फसल उगी है
हर आँगन में आग है
माली की लापरवाही पर
रोता सारा बाग़ है
कितनी कलियाँ मसली जाती
रौंदें जाते फूल है
रक्षक दर्शक बन कर बैठे
हँसते जिन पर शूल है

कभी विदेशी बाँट गये थे
दो टुकड़ों में ये घर बार
पर अब हम खुद सौ टुकड़ों में
बंटने को बैठे तैयार
यहाँ बना दो मंदिर मस्जिद
यहाँ बना दो खालिस्तान
हमें चाहिए सत्ता चाहे
बंट जाये फिर हिन्दुस्तान

२. प्रजातंत्र के रखवाले

जिनको घरो में दीपक नहीं
नहीं तेल और बाती
वो राह दिखाते भटको को
बने आज खैराती
प्रजातंत्र के रखवाले
पीते निसदिन खून
भरे तिजोरी आपनी
बस छाया यही जूनून

हो उद्धार देश का कैसे
जटिल बना है यही सवाल
जिसके हाथ कमान है
उसे तनिक ना ख्याल
आखिर कब तक झेलेंगे हम
पाप, अन्याय, भ्रष्टाचार को
क्यों बने है कायर से हम
लानत हमारे विचार को

अब रौशनी बुझी जा रही
अन्धकार की दिखती जीत
भूले हम तुलसी की वाणी
भय बिन कभी ना होत प्रीत
जाग जा रे मानव अब
छोड़ रंगमय ये बसेरा
"आज़ाद" आवाहन बस एक
न हो जग में कभी अँधेरा

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नाम विजय कुमार शर्मा
उपनाम "आज़ाद"
जन्मतिथि ०१ /०७ /१९८६
जन्मस्थान गाँव सरभन्ना डाक सहार जिला बुलंदशहर (उ. प.) 
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संपर्क 
ईमेल vijay.buland@gmail.com, vijay.1786@yahoo.co.in

शिक्षा ऍम. टेक., बी. टेक. (ऑनर्स)

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