शनिवार, 11 सितंबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 39

अनपढ़ हैं पर सच्‍चे दिल हैं बिलकुल भोले भाले लोग।

हैं मिट्टी की सौंधी खुशबू से गांव में रहने वाले लोग॥

 

छोटी बहर की ग़ज़ल के मतले ज्‍यूं सीने से लग जाते ,

कुछ मिलते हैं औराकों में फैले हुए मकाले लोग ।

 

नहीं गांठ से दुखदायी हैं न फोड़े ज्‍यूं जलते हैं,

सहलाते ही फट पड़ते हैं जैसे पांव के छाले लोग।

 

सदा छिपा लेने की जिद में सब जाहिर कर देते हैं ,

फटे लबादों पर रखते हैं बिलकुल नये दुशाले लोग।

 

नगर गाँव बस्‍ती घूमा हूँ बंजारे सा 'दामोदर' ,

मिले हैं इस बस्‍ती में जाने कैसे अजब निराले लोग।

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ग़ज़ल 37

सखी सच हैं कि क्‍या होते हैं सच सब भौर के सपने।

कि देखे मन मयूरी नृत्‍य करते मौर के सपने॥

 

जहां पर स्‍वर्ण मृग को हांफ कर रुकते हुए देखा,

अनाड़ी मन ने देखें हैं भला उस छौर के सपने।

 

मिले विरही के मन जैसा मरुस्‍थल जो युगों प्‍यासा,

वहां जम कर के बरसूं हैं घटा घनघोर के सपने।

 

चुरा कर के किसी का कुछ,बने स्‍वामी वो बौराए,

धरोहर ज्‍यूं उसे रखने के हैं इक चोर के सपने।

 

फड़क दिल धक्‌ से रह जाएं निहारुँ

बड़े अदभुत अनाड़ी धड़कनों के शोर के सपने।

 

एकटक उसको, मेरे सपनों आ करके कोई करता चुहल ‘जांगिड‘,

लगे हैं आजकल अपने से मुझको और के सपने।

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ग़ज़ल 1

हकीक़त क्‍या बदल जाती जरा मेरे सराहने से।

छुपाने से नहीं छुपती कभी शातिर जमाने से॥

 

तेरी उँचाईयों की दस्‍तरस आकाश तक लगती,

भला कैसे ढ़हेगी वो मेरे अँगुली उठाने से।

 

किसी को भी नहीं फुर्सत यहां तो खुदनुमाई से,

तुम्‍हें उम्‍मीद तारीफ की क्‍यों कर जमाने से।

 

सबब ताखीर का माकूल का लफ्‍जों तलाशी था,

बड़े बेसब्र हो चूके नहीं तोहमत लगाने से ।

 

हमारे फासले मिलने की खातिर भी तो तड़पे थे

अनाड़ी तू नहीं आया कभी मेरे बुलाने से।

 

खलाओं की दरारों में जरा फिर गौर से झांकों,

जहां खामोशियों के अक्‍स बैठे हैं अजाने से।

 

कभी खामोश रहना खुद ब खुद में तर्जुमानी

वगरना संगेबुत अल्‍फाज़ लाते किस खजाने से।

4 blogger-facebook:

  1. umda gazale.....padhkar achchha lagaa..dhanyavaad

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  2. "कभी ख़ामोश रहना ख़ुद ब ख़ुद तर्जुमानी,वगरना संगे बुत अल्फ़ाज़ लाते किस ख़ज़ाने से"। ख़ूबसूरत शे"र। बधाई। ग़ज़ल के तीसरे और चौथे मिसरों का भाव पक्छ समझ तो आ रहा है पर संयोजन कुछ और बेहतर होता तो अच्छा होता। बहर हाल आपको उर्दू में मजबूत पकड़ के लिये मुबारक बाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति .आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. कभी ख़ामोश रहना ख़ुद ब ख़ुद तर्जुमानी,वगरना संगे-बुत अलफ़ाज़ लाते किस ख़ज़ाने से। बहुत ही ख़ूबसूरत शे"र। 3रे और चौथे मिसरों का भाव समझ तो आ रहा है पर संयोजन और बेहतर होता तो क़ाबिले-तारीफ़ होता।

    उत्तर देंहटाएं

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