मंगलवार, 28 सितंबर 2010

यशवंत कोठारी का आलेख : बच्‍चों को अपराध की दुनिया में कौन धकेलता है ?

yashwant kothari

यदि आंकडे प्रमाण है कि तो पिछले दो-तीन दशकों में बाल अपराधियों और युवा वर्ग में हिंसा और पराध करने की प्रवृति में बहुत वृद्धि हुई हैं। 16 वर्ष से कम आयु के लगभग 1500 बच्‍चें जेल में बंद हैं। बड़े शहरों में युवाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही हैं।

इन अपराधियों में आपराधिक प्रवृत्ति का विकास हाने का एक प्रमुख कारण हमारी दूषित शिक्षा पद्धति हैं। दस जमा दो हो या इससे पूर्व की पद्धति, सभी में अपराधों की रोकथाम या शिक्षार्थी को अपराधों की ओर जाने से रोकने का कोई प्रावधान नहीं हैं। बढ़ती बेरोजगारी, अनिश्‍चित भविष्‍य और शिक्षा की अर्थहीनता स्‍पष्‍ट हो जाने पर बालक, किशोर, युवा अपराधों की दुनिया में किस्‍मत आजमाते हैं। शुरू की सफलताएँ उन्‍हें और आगे जाने की ओर प्रवृत्त्‍ा करती हैं।

समाजशास्‍त्रियों का मत है कि कानून का उल्‍लंघन करने वाले बच्‍चों के अन्‍दर अपराध के बीच प्रारंभिक वर्षों में स्‍कूलों में या कॉलेजों में पड़ जाते हैं और समय पाकर विकसित होते रहते हैं।

लगभग हर अपराधी किसी न किसी मारक परिस्‍थिति का शिकार होता है। चोरी-चकारी, उठाईगिरी या ऐसे मामूली अपराधों का मूल कारण गरीबी, अशिक्षा और पेट की भूख हैं।

बच्‍चें चाहे सरकारी स्‍कूल में हों या पब्‍लिक स्‍कूल में या महंगे बोर्डिंग स्‍कूलों में, अध्‍यापकों, अभिभावकों की मानसिकता लगभग एक जैसी होती हैं। यदि किसी कक्षा में 2 छात्र लड़ पड़े तो अध्‍यापक दोनों को डाँट फटकारकर भगा देंगे। पेंसिल, पेन कॉपी, किताब आदि की चोरियाँ मामूली बात हैं, जो हमारी शिक्षा पद्धति के कारण बढ़ती ही चली जा रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में स्‍कूलों में फिजिकल पनिशमेंट का स्थान डांट, फटकार, धमकी और आर्थिक दण्‍ड ने ले लिया है, जो छात्रों के कोमल मन को लम्‍बे समय तक प्रभावित कर उसे अपराधी जीवन की ओर ले जाती हैं।

स्‍वच्‍छंद व्‍यवहार, बढ़ती आर्थिक खाई और बदलते सामाजिक मूल्‍यों तथा राजनीतिक जागरूकता ने छात्रों व अध्‍यापकों के बीच खाई को बहुत बढ़ा दिया हैं। पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता की अंधी नकल, सिनेमा, टी․वी․ का प्रसार और ड्रग लेने की बढ़ती प्रवृति भी छात्रों में बढ़ी हैं। एक स्‍कूली छात्र ने बताया कि टी․वी․ पर लगातार दिखाए जाने वाले धारावाहिकों से उसने ड्रग लेने की सीख पाई। कैसे बचेगी किशोरों की दुनिया।

मनोवैज्ञानिकों का विश्‍वास है कि बालक और किशोर अपने आस-पास, घर स्‍कूल आदि के वातावरण से ही सीखता है। बालक का मस्‍तिष्‍क अपरिपक्‍व होने के कारण वह स्‍वयं अच्‍छे और बुरें कार्यों में अंतर नहीं समझ पाता। ऐसी स्‍थिति में गलत रास्‍तों की ओर बढ़ता है और अपराधों की दुनिया में प्रवेश पा जाता है।

वास्‍तव में 5 से 15 वर्ष की आयु बच्‍चे के मानसिक विकास की आयु है। वह हर नई वस्‍तु की ओर जिज्ञासा से देखता है। ऐसी जिज्ञासाओं की पूर्ति के लिए वह अध्‍यापक या माता-पिता की ओर देखता है। अध्‍यापक उपलब्‍ध नहीं होते, माता-पिता व्‍यस्‍त रहते हैं। फलस्‍वरूप बालक कुंठित हो जाता है और बड़े घर के बच्‍चों को तो अपने माता-पिता के दर्शन भी हफ्‍ते में एक-दो बार ही हो पाते हैं।

वस्‍तुतः जिस सामाजिक परिवेश, देश, काल व परिस्‍थितियों से हम गुजरते हैं, उनका हमारे बच्‍चों के दिमाग पर असर होता है और बाल मन पर होने वाले इस असर के लिए अध्‍यापक और शिक्षा पद्धति जिम्‍मेदार हैं। शिक्षा पद्धति का विकास करते समय हमें बाल मनोविज्ञान और अपराधों की दुनिया से बच्‍चों को दूर रखने की कोशिश का भी ध्‍यान रखना चाहिए।

शिक्षा पद्धति बच्‍चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक ज्ञान तथा सामयिक दिशा निर्देश भी दे, तभी बाल अपराधों में कमी होगी और देश को अच्‍छे नागरिक मिल सकेंगे।

लेकिन हमारी शिक्षा पद्धति कुछ इस प्रकार की है कि छात्र-अध्‍यापक सम्‍पर्क बहुत कम होता है। कॉलेजों में तो यह सम्‍पर्क नाममात्र का ही होता है, लेकिन स्‍कूलों में छात्रों को अध्‍यापकों के अधिक सम्‍पर्क में लाए जाने की कोशिश की जा सकती है, ताकि छात्र कोर्स के अलावा भी बहुत कुछ सीख सके।

यदि बच्‍चों को शुरू से ही बाल अपराधों तथा उनके परिणामों से अवगत कराया जा सके तो बालक किशोर स्‍वयं इन अपराधों से दूर रहने की कोशिश करेंगे।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर - 302002

फोन - 2670596

3 blogger-facebook:

  1. आपने बहुत ही महत्वपुर्ण विषय मे आलेख लिखा है । हम सब को इस विषय मे बहुत ही गम्भिर्ता से सोचना चाहिये।

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  2. bahut khoob ,ek mukhya visay bahut aache andaj main prastut kiya hai aap ne -badahi

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  3. बच्चों के मनोविज्ञान को समझना असान नहीं है लेकिन यही उनके भीतर पनपती अपराध की प्रवृत्ति को दूर करने मे सहायक सिद्ध होगा ।

    उत्तर देंहटाएं

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