सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

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surender agnihotri 251 (Mobile)

भूख से जब अंतड़ियां

पेट में दर्द देती है

जब रिरियाती नई पीढ़ी

मौत की चादर ओढ़ लेती है

तब तनी हुई मुट्‌ठी

हाथ में बन्‍दूक थाम लेती है

तब बुन्‍देलखण्‍ड के बीहड़ में

बगावत की जंग शुरू होती है

तब सिसकती ममता है

कंलकित मानवता होती है

स्‍तब्‍ध कर देने वाली शांति

चीत्‍कार की ध्‍वनि सन्‍नाटा तोड़ती है।

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132, बेलदारी लेन,लालबाग, लखनऊ

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1 टिप्पणी "सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता"

  1. द्वंद से लबरेज़ एक अच्छी कविता। रचनाकार को बधाई।

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