शनिवार, 18 सितंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल

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छल का आंगन झूठ का मैदान है।,
सांसों का छप्पर भी बेईमान है।

 
खिड़कियां ग़म की खुली मत रहने दो,
सुख के  दरवाज़ों  का ये अपमान है।

 
मत कहो धरती को जीवन दायनी,
कब्रों  से लबरेज़  ये  शमशान है।

 
गर वफ़ा की बारिशें ना हो तो फिर,
इश्क़ की हर खेती में नुकसान है।

 
हिम्मते-कश्ती डरे साहिल से पर,
लहरे-ग़म से जग का ऐलान है।

 
तुम हवस की सिढियों पर चढ रहे,,
मेर पा  को सब्र का वरदान है। (पा-- पैर)

अमरिका से इक ही फ़न में आगे हम कि,
भ्रष्टतम  मुल्कों  में  हिन्दुस्तान  है।

 
इश्क़ करने की सज़ा ऐसी मिली,
अब कफ़न ही सांसों का भगवान है।

 
है ग़रीबों के लहद पे तेरा राज,
अब अमीरी भी कहां इंसान है।

4 blogger-facebook:

  1. यथार्थ का चित्रण करती हुई एक अच्छी रचना ... बधाई।

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  2. खिड़कियां ग़म की खुली मत रहने दो,
    सुख के दरवाज़ों का ये अपमान है।

    Bahut badhiya.

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रेम नारायन जी , महेन्द्र वर्मा जी व भरोल जी का शत शत अभिनंदन।

    उत्तर देंहटाएं

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