बुधवार, 8 सितंबर 2010

गोपी गोस्वामी की कविता – थ्री ईडियट्स

थ्री ईडियट्स


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एक कत्ल हुआ
बीच सड़क पर दिन-दहाड़े
शहर जगा था
पर न ठिठका, न रुका
आँखें मूंदे
बस चलता रहा
अगर होती इस शहर की
संवेदन तंत्रिका की
कुछ कोशिकाएं भी जंगरहित
तो शायद ये शहर कुछ पल
ठिठक कर देख पाता कि
मरने वाली का नाम
‘मानवता’ था
शहर को इससे क्या
उसे तो
आदत है लाशों को लांघकर
आगे बढ़ने की

पर खबर तो बन गई न
और खबरिया चेनलों की तो
निकल पड़ी
हत्या ! वो भी मानवता की
इस शहर में हो क्या रहा है?
इसने, उसने, किसने,
जिसने भी मारा
कयास और दावों का युद्ध
लड़ा जाने लगा है
और ब्रेकिंग न्यूज की सडांध
बेचकर टी आर पी कमाने वाले
खबरिया चैनल
लगे पड़े हैं ‘मानवता’ की
लाश का पोस्टमार्टम करने

पर मानवता तो मर गई
पहले चीर-हरण फिर हत्या
कृष्ण की अनुपस्थिति खेदजनक
और हत्यारा
फिर से छुप गया है, या मिल गया
या फिर घुल गया है
इसी शहर में
पर सबने देखा है हर नुक्कड़
पर बिक रहे हैं मुखौटे
भ्रष्टाचार,व्याभिचार, लालच, आतंक,
द्वेष-घृणा सबके मुखौटे उपलब्ध हैं
फिर से निकलेगा शहर की
महत्वकांक्षा की कोख में पल रहा
स्वार्थ
खरीदेगा फिर से एक मुखौटा
और फिर से होगी ‘हत्या’
हर बार की तरह फिर मरेगी
‘मानवता’
पर शहर चलता रहेगा
जिन्दा रहेगा,
पर खामोश रहेगा

गांधीजी के तीनो बन्दर
उदास हैं
सीधे, सरल वो तीन अनमोल वचन
क्या किसी कूट-भाषा का तिलस्म थे?

उसके कानों कि
ऊँचाई तक कोई पहुंच भी गया
तो यही पायेगा कि कानों पर
हाथ धरे बैठा है प्रशासन

और किसने कहा कि
क़ानून अंधा है
क्या आँखों पर हाथ रखने से
भला कोई अंधा हो जाता है

और आप जनाब?
आप क्यों चुप हैं
मुँह पर हाथ?
अरे! आप तो जनता हैं?

3 blogger-facebook:

  1. सुन्दर मर्मस्पर्शी पंक्तियों के लिये रचनाकार को बधाई साथ ही ये भी कहना चाहूंगा इसे पढते समय मुझे लग रहा था कि मैं किसी अच्छे गद्यकार को पढ रहा हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. रोंगटे खडे करने वाली , सच को आईना दिखाती एक सशक्त रचना सोचने को मजबूर करती है……………कुछ पल रुकने को मजबूर करती है………………गहन चिन्तन और मनन चाहती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. rachana men kavitv hai,agar sonet ki tarah flow
    men hoti to rang kuchh aour hi hota

    उत्तर देंहटाएं

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