शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

जोगेंद्र सिंह की दो कविताएँ

 

रस्पर विपरीत गुण धर्मों का मेल ?
एक तरफ सूखी धरती , वीरान ..
दूजी बाढ़ग्रस्त ..
लबालब सोच -सी डूबी ...
मिलन क्या संभव है इनका ?
बन जाना मौत का वायस जल का -
चाहे प्यास या
प्रलय बाढ़ विभीषिका से ....l
क्यों होता मानव मन भी
दो भागों में यूँ बँटा?
न बंजर उपजाता तृण मात्र कहीं
न अति आर्द्र में दिखता सुलभ
अंकुरण गात ....!
हैं विपरीत ..
पर होता आकर्षण हर बार ...
न संभाव्य होता
दृष्टिगत मेल कहीं ..
तथापि
'अंकुरण ' पाता कोमलतम भाव यहीं ....!
स्थान
अनुभूति सब हैं भिन्न -भिन्न l
है कुछ भान भी -
पारिस्थितिक वस्तुस्थिति का ....
किन्तु
न जाने कैसा मोह फंसा ...
खिंचे चले आते
द्वि पक्ष बन नियति जैसे ...
बेमेल , पर नयनाभिराम -सा
मिलना यूँ दूर रहकर ध्रुवों का !
जुड़े हों रक्त -नील वर्ण
परस्पर आधे-आधे ...
सोचता हूँ अन्यमनस्क -
एक ओर है सूखी धरती
बंजर वीरान ...
ओर है बाढ़ग्रस्त लबालब सोच -सी दूजी ..
हाँ, कदाचित बने अब नया उपमान !
हूँ ! ये अंकुरण नव जीवन का l

---

बेबस !
स्वप्न संजोने से डरता !
अगली पंक्ति
कब पास से गुज़र गयी ?
तटस्थ
उदासीन
हर पंक्ति से ....
अंतिम पंक्ति का
अंतिम आदमी !
शून्य दृष्टिपात !
अपनी आँखों पर
अविश्वास के
चित्र खींचता ...
शून्यता को रिक्त करता
दे रहा राष्ट्र को
चुप योगदान
और ...
पी रहा उपेक्षा ...
जी रहा सरल
लाल बत्ती , बिन बत्ती के आवागमन सा !
अंतिम पंक्ति का
रुका आदमी !
राशन की पंक्ति
चिलचिलाती धूप...
बहता स्वेद कण
तरल नमक में घुलती
रत प्रतीक्षा ....
लौट आता यूँ ही
खाली हाथ ...
अंतिम पंक्ति का
अंतिम आदमी !
दफ्तर , बाबू ...
प्रहरी कानून के ...
करता चिरौरी सबकी  ..
मंडराता
काटता
अपनी विपन्नता की
धुरी पर अनगनित चक्कर ....!
क्रमश : पत्नी के कम होते गहने ..
ठोस रिक्तता
अपमान
उम्र पकने तक के फेरे !
देखता है उचककर
उस न दिखती अग्रणी पंक्ति को
जो उसके पद चिह्नों को
रौंदती
खड़ी है ...
पीछे छोड़ कर उपहास के रेत कण !
जिसकी किरकिरी लिए
मसलता आँख को
अंतिम पंक्ति का
अंतिम आदमी !
अब भी प्रतीक्षारत है ...
शायद कुछ कदम और ...
भीड़ का कोहरा छंटने तक
चल सके
उठ सके ...
जी सके ...!
अंतर्मन की पीड़ा को
कतार से बाहर
उलीच सके ...
कोई उत्तर ...
हाशिये पर खिंचा
अनुत्तरित प्रश्न -सा
अंतिम पंक्ति का
सरल आदमी !
---

जोगेंद्र सिंह
मुंबई

3 blogger-facebook:

  1. अच्छी पंक्तिया है .....

    एक बार इसे जरू पढ़े -
    ( बाढ़ में याद आये गणेश, अल्लाह और ईशु ....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_10.html

    उत्तर देंहटाएं
  2. दोनों कवितायें भाव प्रधान,खासकर प्रथम वाली,अंकुरण नव जीवन का।
    रचनाकार को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हैं विपरीत ..
    पर होता आकर्षण हर बार ...
    न संभाव्य होता
    दृष्टिगत मेल कहीं ..
    तथापि
    'अंकुरण ' पाता कोमलतम भाव यहीं ..

    achha bhav hai ..bemel mel se hi hota hai nav ankuran,dusari rachna bhi achhe bhav yukt vyng se pripurit hai ,antim pankti ka antim aadami ant tak kuch bhi hasil nahi kar pata ..

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------