गुरुवार, 9 सितंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़लें - मेरी तनहाई के हक़ मे दुआ कर दे…

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(1)

तू मेरे सुर्ख़ गुलशन को हरा कर दे,

ज़मीं से आसमां क फ़ासला कर दे।

 

हवाओं के सितम से कौन डरता है,

मेरे सर पे चराग़ों की ज़िया कर दे ।

 

या बचपन की मुहब्बत का सिला दे कुछ,

या इस दिल के फ़लक को बड़ा कर दे।

 

तसव्वुर में न आने का तू वादा कर,

मेरी तनहाई के हक़ मे दुआ कर दे।

 

पतगों की   जवानी पे रहम खा कुछ ,

तपिश   को   अपनी मद्धम ज़रा कर दे।

 

तेरा ज़ुल्मो सितम मन्ज़ूर है मुझको ,  

मुझे जो भी दे जलवा   दिखा कर दे।

 

तेरे बिन कौन जीना चाहता है अब ,

मेरी सांसों   के थमने   की दवा कर दे।

 

यहीं जीना यहीं मरना है   दोनों को,

यहीं तामीर काशी - करबला   कर दे।

 

(2)

(दिल के दरों को)
खटखटाया ना करो दिल के दरों को,
मैं खुला रखता हूं मन की खिड़कियों को।

फिर दरख़्ते प्यार में घुन लग रहा तुम,
काट डालो बेरुख़ी के डालियों को।

गर बदलनी दुश्मनी को दोस्ती में,
तो मिटा डालो दिलों के सरहदों को।

बढ गई है ग़म की परछाई ज़मीं में,
धूप का दीमक लगा ,सुख के जड़ों को।

मैं मकाने-इश्क़ के बाहर खड़ा हूं,
तोड़ आ दुनिया के रस्मों की छतों को।

गो ज़ख़ीरा ज़ख़्मों का लेकर चला हूं,
देख हिम्मत, देख मत घायल परों को।

फ़स्ले-ग़ुरबत कुछ अमीरों ने बढाई,
लूट लेते हैं मदद के पानियों को।

ख़ुशियों के दरिया में ग़म की लहरें भी हैं,
सब्र का शिक्छा दो नादां कश्तियों को।

घर के भीतर राम की हम बातें करते,
घर के बाहर पूजते हैं रावणों को।

छत चराग़े-सब्र से रौशन है दानी,
जंग का न्योता है बेबस आंधियों को।
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4 blogger-facebook:

  1. दोनों रचनायें सुंदर है.
    घर के भीतर राम की हम बातें करते,
    घर के बाहर पूजते हैं रावणों को।
    विजय तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. तसव्वुर में न आने का तू वादा कर
    मेरी तनहाई के हक़ मे दुआ कर दे।

    ये एक शे‘र एक उपन्यास के बराबर है।....बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह ...दोनों गज़लें शानदार ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आदरणीय विजय तिवारी जी, महेन्द्र वर्मा जी और आदरणीया संगीता स्वरूप्र जी को टिप्पणियों के लिये शत शत धन्यवाद। साहित्य कार की यही तो एक पूंजी है जिसके कारण वो औरों से जुदा है।इन दोनों ग़ज़लियात में एक-एक छोटी छोटी ग़लती है। "या इस दिल के फ़लक" के बाद "कुछ" शब्द छूट गया है जिससे बहर में दोष पैदा हो रहा है। "सब्र का शिक्छा" की जगह "सब्र की शिक्छा"होनी चाहिये। जिन्हें मैं जानते हुवे भी सुधार नहीं पा रहा हूं। बहरहाल शुक्रिया to every body.

    उत्तर देंहटाएं

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