शनिवार, 25 सितंबर 2010

आपने अब तक पढ़ी तो होंगी बहुतेरी ग़ज़लें, किन्‍तु सबसे अलहदा है मोहतरिम राजेश विद्रोही की ग़ज़लें॥

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राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

बेशक हम भी चाहेंगे कि वाज़िब मांगें पूरी हो।

लेकिन ये क्‍या बात हुई कि चाहे जो मज़बूरी हो'

 

असली है रुहानी रिश्‍ते अष्‍टावक्र बताते है।

चमड़ी में क्‍या तो रक्‍खा है काली हो या भूरी हो॥

 

मिलना तो मन का होता है, तन तो सिर्फ बहाना है।

ऐसा मिलना भी क्‍या मिलना, जो मिलना दस्‍तूरी हो॥

 

बहनों की रक्षा करना तो भाई पर है फर्ज सदा।

वो फिर सीता-सावित्री हो, नज़मा हो या नूरी हो॥

 

ये मेरी अनमोल विरासत इसे ना कायरता समझो।

तब तक नहीं आक्रमण करते जब तक नहीं जरुरी हो॥

 

और नहीं अभिलाषा कोई मालिक बस इतना कर दे।

हर सुबहा चम्‍पा सी उजली हर सन्‍ध्‍या सिन्‍दूरी हो॥

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जीवन की अलबेली यादें।

हैं विश्‍वस्‍त सहेली यादें॥

 

खट्टी-मीठी और चरपरी।

कड़वी और कसैली यादें॥

 

नहीं पुरानी पड़ती हर्गिज़।

लगती नित्‍य नवेली यादें॥

 

लाख सहेजो, लाख समेटो।

रहती बिखरी फैली यादें॥

 

सुधियों की सुनी गलियों में।

धूल भरी मटमैली यादें॥

 

जाने क्‍या कुछ सँग ले आती।

आती नहीं अकेली यादें॥

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आपने अब तक पढ़ी तो होंगी बहुतेरी ग़ज़ल।

किन्‍तु सबसे अलहदा है मोहतरिम मेरी ग़ज़ल॥

 

मातहत बनकर गुजर करने से मर जाना भला।

हो नहीं सकती किसी की भी कभी चेरी ग़ज़ल॥

 

आशिको-माशूक की दर्जे बयानी ही नहीं।

वक्‍त पर साबित हुई है राज' रणभेरी ग़ज़ल॥

 

सर ज़मीने हिन्‍द के ज़र्रे जवानी पा गये।

मीर या गालिब ने जब जब चाव से टेरी ग़ज़ल॥

 

चाहने वालों ने बख्‍़शी है हयाते-जांविदा।

हो ना पायेगी कभी भी राख की ढे़री ग़ज़ल॥

 

ना तो खारिज़ कर सका ना दे सका इस्‍लाह भी।

उसने मुझको ही सुना दी हू ब हू मेरी ग़ज़ल॥

 

मां अग़र हिन्‍दी है तो उर्दू सगी मौसी मेरी।

इस तआल्‍लुक से हुई राजेश' मौसेरी ग़ज़ल॥

 

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सबकी सुनकर भी अपनी पे अड़े हुए हैं, बड़े मियाँ।

लोग शहर के कैसे चिकने घड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

पहले यूं खुदगर्ज नहीं था, कुछ अपनापा बाकी था।

आख़िर हम भी इसी शहर में बड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

ये मत सोचो इस मरभुक्के गाँव में क्‍या तो रक्‍खा है?

जाने कितने बड़े ख़ज़ाने गड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

चाँद सितारों पर जा पहुँचे दुनियाँ के सब लोग मग़र।

आप और हम तो उसी सतह पर खड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

कहने को तो बाज़ारों में आम हो गयेआम' मगर।

ये तो सब के सब आँधी के झड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

जब जब झोपड़ियाँ सुलगी हैं जब जब भी खलिहान जले।

राजमहल पर पहरे क्‍योंकर कड़े हुए हैं बड़े मियाँ??

 

भाई भाई की रंजिश में पंच कहाँ से आ टपके।

हर कुनबे में अक्‍सर दो दो धड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

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मैं किसी की हाजिरी हर्गिज बजा लाता नहीं।

इसलिए कटु सत्‍य कहने से भी घबराता नहीं॥

 

ज़ात से हूँ आदमी इन्‍सानियत मेरा धरम।

इसलिए मैं मज़हबी उन्‍माद फैलाता नहीं॥

 

ना किसी मठ का मुगन्नी ना किसी दर का मुरीद।

कोई मस्‍जिद या कि मंदिर मेरा अन्न‍दाता नहीं॥

 

मेरी खातिर उसका दर्जा देवता से कम नहीं।

जो किसी की भावना को ठेस पहुंचाता नहीं॥

 

बख्‍श दे मौला मेरे तुझसे निहां कुछ भी नहीं।

हर किसी दर पे तो मैं दामन भी फैलाता नहीं॥

 

ना तो सज़्‍दों का सलीका ना इबादत का शऊर।

वो सवाली हूँ कि जिसको मांगना आता नहीं॥

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यतीमी थी मुक़द्दर में निगहबानों से क्‍या शिकवा ?

गिला गुलजार से कैसा बियाबानों से क्‍या शिकवा ??

 

मिले हैं ग़म के नज़राने हमें अपनों से दुनियाँ में।

शिकायत ग़ैर से क्‍या और बेगानों से क्‍या शिकवा ??

 

शिकायत ग़र्दिशे-तक़दीर की आखिर करे किस से ?

फरिश्‍तों से मिले फतवे तो इन्‍सानों से क्‍या शिकवा ??

 

परिन्‍दों के मुकद्दर में क़फ़स भी कैद लिक्‍खी थी।

गिला सैयाद से क्‍या और गुलिस्‍तानों से क्‍या शिकवा ??

 

न था साहिल से मिल पाना सफ़ीने के मुकद्दर में।

गिला क्‍या नाखुदा से और तूफानों से क्‍या शिकवा ??

 

न हो मायूस अहले अंजुमन की बेवफाई से।

निगाहें फेर ले साकी तो पैमानों से क्‍या शिकवा ??

 

मेरे अशआर की किस्‍मत में गुमनामी बदी होगी।

गिला नक़्‍क़ाद से क्‍या कदरदानों से क्‍या शिकवा ??

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जिधर देखते हैं क़हर देखते हैं।

सितम है कि आठों पहर देखते हैं॥

 

संभाला है जब से ज़रा होश हमने।

फ़िजाओं में घुलता ज़हर देखते है॥

 

ये मेहनत ही मज़हब है मेहनतकशों का।

ना दिन-रात ना दोपहर देखते हैं॥

 

अज़ब फ़लसफा है नये शायरों का।

ना अर्कान ना ही बहर देखते है॥

 

ये दहशत के मारे मछेरे अभी भी।

सुनामी सी कोई लहर देखते हैं॥

 

ना दंगा न कर्फ्यू ना नफ़रत जहां हो।

कोई एक ऐसा शहर देखते हैं॥

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4 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन और एक-एक शे’र शानदार...

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी ग़ज़लें प्रशंसनीय हैं। प्रत्येक शे‘र में परिस्थिति का अच्छा ज़िक्र है। सुंदर रचनाएं...बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर रचनायें, बधाई-बिद्रोही जी मेरे साथ चेतनापरिषद आदि कई संस्थाओं की गोष्ठियों में शिरकत किया करते थे, उनकी शानदार गज़लें मूलतः विद्रोही हुआ करती थीं।

    उत्तर देंहटाएं

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