शनिवार, 18 सितंबर 2010

उमेश कुमार चौरसिया की लघुकथाएँ





सात लघु कथाएं ः-
अपराध
कुछ लोग बतिया रहे हैं -
‘तुम्‍हें पता है वहां अपराध कम हो रहे हैं।‘
‘अच्‍छा ! ․․․․․․․हमारे यहां तो दिन पर दिन बढ़ ही रहे हैं।‘
‘वहां का कानून बड़ा कठोर है ना।‘
‘तभी !․․․․․․․यहां तो कानून का किसी को डर ही नहीं।‘
‘पता है वहां अभी एक उच्‍चाधिकारी को भ्रष्‍टाचार के आरोप में
फांसी दी गई है।‘
‘और यहां․․․․․․․․․․․․․ दुर्दान्‍त आतंकवादी की भी फांसी भी रोक दी गई है।‘

जुगाड़
‘बिरजू, तुम्‍हारा बेटा अब तो स्‍कूल जाने लगा है ना?‘
‘जी बाबूजी।‘
‘चलो अच्‍छा है, पढ़-लिख लेगा।‘
‘पता नहीं, पढ़ेगा कि नाही। ․․․․․․․․पन अब उसे होटल वाले
के बर्तन नहीं मांजने पड़ते।․․․․․․․․․एक टेम की रोटी का जुगाड़
पोषाहार से हो जाता है।‘

सम्‍मान
आज महापुरूष की जयंती है। अखबार में छपा है कि नगर के नेतागण चौराहे पर लगी महापुरूष की मूर्ति पर माल्‍यार्पण करेंगे और वहां आकर्षक सजावट भी होगी। सच में मूर्तिवाले चौराहे को आकर्षक फूलों, फर्रियों व बिजली की रंगबिरंगी लडियों से सजाया गया। मूर्ति के चारों ओर लगे जालीदार घेरे पर सजावट पर हावी बड़े-बड़े बैनर व पोस्‍टर लगे, जिन पर नेताओं के हाथ जोड हुए चित्र के साथ जयंती पर बधाई लिखा दिखाई दे रहे हैं। इनमें अधिकांश पर महापुरूष व उनके संदेशों का जिक्र न होकर मुख्‍य अतिथि के तौर पर आने वाले नेताजी के स्‍वागत का संदेश मोटे अक्षरों में दिख रहा है। चारों ओर लगे इन बैनर-पोस्‍टरों से घिरी मूर्ति मार्ग से आने-जाने वालों को स्‍पष्‍ट नहीं दिख पा रही है।

मूर्ति के पास कई छोटे-बड़े नेता माला लिए खड़े हैं। संभवतः मुख्‍य अतिथि की प्रतीक्षा हो रही है, उनके आने पर ही महापुरूष की मूर्ति पर माल्‍यार्पण होगा। तभी मुख्‍य अतिथि नेताजी की लालबत्‍ती वाली गाड़ी आ गई। वहां खड़े सभी लोगों में नेताजी को माला पहनाने की होड़ लग गई। सभी का अभिवादन करने नेताजी आगे आकर मूर्ति पर माला पहनाने की कोशिश करते हैं। मूर्ति ऊंची होने के कारण वे माला पहना नहीं पा रहे। कुछ चेले दौड़कर एक लग्‍बी लोहे की सीढ़ी ले आए और उसे मूर्ति के गले पर जोर से टिका दिया। अब मुख्‍य अतिथि नेताजी महापुरूष की गर्दन पर टिकी सीढ़ी पर चढ़कर महापुरूष को माला पहनाते हैं। सभी लोग तालियां बजाते हैं, नारे लगाते हैं, जयकार करते हैं। जयकार में महापुरूष के साथ-साथ नेताजी का नाम भी बार-बार लिया जा रहा है।
कुछ देर बाद ही पास लगे शामियाने में पार्टी हो रही है। सभी फिर से अपनी-अपनी स्‍वार्थचर्चा में व्‍यस्‍त हो गए हैं।

श्रद्धांजलि
नगर के प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार की मृत्‍यु हो गई। आज शोक-सभा है। विविध संस्‍थाओं और विधाओं से संबद्ध अनेकों लेखक, साहित्‍यविद्‌, गणमान्‍य लोग उपस्‍थित हैं। विविध संस्‍थाओं से प्राप्‍त शोक-संदेश पढ़े जा रहे हैं। शोक-संदेशों में दिवंगत साहित्‍यकार के कृतित्‍व या उससे मिलने वाली प्रेरणा का जिक्र नहीं है, वरन्‌ उनसे अपने संबंधों का अतिश्‍योक्‍तिपूर्ण बखान ही किया जा रहा है। किसी संदेश में तो उन्‍हें प्रातःवंदनीय तक कहा गया, किसी में उनके जाने से साहित्‍य जगत अनाथ होने की बात कही गयी।
संदेश पढ़े जाने के दौरान भी कुछ संस्‍थाओं के स्‍वयंभू पदाधिकारी शोक-सभा के आचरण को भूलकर बीच में ही वक्‍ता को रोकते हुए पहले उनका संदेश पढ़ने को कहने लगे। कुछ ने तो स्‍वयं माईक पकड़कर अपना संदेश पढ़ना शुरू कर दिया।
शांतिपाठ से शोक-सभा सम्‍पन्‍न हुई। अब लोग समूहों में खड़े अपनी-अपनी रचनाशीलता का बखान व स्‍वार्थचर्चा में व्‍यस्‍त हो गए हैं। एक समूह में कुछ वरिष्‍ठ साहित्‍यकार बतिया रहे हैं। एक-‘यार, एक सौ चालीस किताबों में बुड्‌ढे ने लिख क्‍या होगा!‘, दूसरा-‘सब इधर का उधर किया होगा, वरना इन्‍हें साहित्‍य की समझ ही कितनी थी।‘, तीसरा-‘गोष्‍ठी में नाश्‍ता करा करा के साहित्‍यकार बन गए।‘, चौथा-‘पुरस्‍कार कैसे मिले ये मत पूछो, सब पैसों की माया है।‘
यह सब सुन रहे एक पत्रकार से रहा नहीं गया। वह बोला-‘भद्रजनों, आपको ये इतने अयोग्‍य लगते थे तो आप यहां शोक-सभा में आए ही क्‍यों?‘ एक लेखक मसखरी में हंसते हुए बोला-‘यार, लोगों को शक्‍ल दिखानी पड़ती है।‘

पुण्‍य
सेठजी अपनी कोठी में यज्ञ-पूजा करवा रहे हैं। इक्‍यावन संभ्रान्‍त पंडितों को बुलाया गया। सबने मिलकर सेठजी की सुख-शांति के लिए यज्ञ किया और फिर विविध स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजनों का भरपेट सेवन किया। अंत में सेठजी ने उन्‍हें कीमती शॉल, धोती-कुर्ता, चांदी का सिक्‍का और सुन्‍दर लिफाफे में ग्‍यारह सौ एक रूपये भेंट दिए। पंडितों ने प्रसन्‍न होकर आशीर्वाद देते हुए सेठजी से कहा-‘सेठजी, आज आपने बड़े पुण्‍य का काम किया है।‘
कोठी से कुछ दूर ही एक अनाथालय है, जिसमें मूक-बधिर व विमंदित बच्‍चे रहते हैं। वहां एक भिखारी बच्‍चों को कपड़े और खाने-पीने की वस्‍तुएं दे रहा था। बच्‍चे उस भिखारी के साथ बहुत प्रसन्‍न थे। पता लगा कि वह भिखारी लगभग प्रत्‍येक माह वहां आता है। जगह-जगह घुमकर उसे भीख में जो कपड़े और रूपये-पैसे मिलते हैं, उसमें से वह अपने उपयोग के लिए जरूरी कपड़े रखता, अपनी बीमार पत्‍नी के इलाज के लिए गांव में पैसे भेजता और फिर शेष कपड़े यहां बच्‍चों में बांट देता। जो पैसे उसके पास बचे रहते उससे बच्‍चों के लिए खाने-पीने की वस्‍तुएं और किताबें ले आता। कहता-‘इन बच्‍चों को खुश देखकर मुझे बड़ी शांति और सुकून मिलता है। लगता है जैसे कई जन्‍मों का पुण्‍य मिल गया।‘

हंसी
जब जतिन वह बैंक पहुँचा तो वहाँ अधिक भीड़ नहीं थी। बैंक अभी खुला ही था। सफाई कर्मी फर्श साफ कर रहा था। फर्श पर गीले के कारण फिसलन हो गई थी।
जतिन संभलता हुआ आगे बढ़ा, तभी उसके पास से जा रहा एक अधेड़ फिसल कर गिर गया॥ उसके कुछ कागजात भी इधर-उधर बिखर गए। यह देख जतिन को जोर से हंसी आ गई। अधेड़ ने तनिक नाराजगी से उसकी ओर देखा, फिर चुपचाप अपने कागजात उठाकर बाहर चला गया।
जतिन इस घटना पर मुस्‍कुराता हुआ सीढ़ी चढ़ने लगा। लापरवाही से पैर रखने के कारण उसका संतुलन बिगड़ गया और वह धड़ाम से गिर गया। अब आस-पास खड़े अन्‍य लोग हंस रहे थे।

नासमझ
टी․वी․पर सैनिकों के जीवन पर विशेष कार्यक्रम आ रहा था। हमारे साथ पिताजी के मित्र मेहरा जी और उनका बेटा मनीष भी टी․वी․ देख रहे थे। कार्यक्रम देखते हुए पिताजी बोले-‘‘सैनिकों का जीवन कितना रोमांचक होता है।‘‘ इस पर मेहरा जी ने कहा-‘‘ हाँ, कितनी मेहनत करते हैं ये सैनिक। अपने घर-बार से दूर रह कर कितना त्‍याग करते हैं। देश की सुरक्षा के लिए जान पर खेलने को भी तैयार रहते हैं। हमें गर्व करना चाहिये अपने वीर सैनिकों पर․․․․․․․․․․․․․।‘‘
मनीष जो काफी देर से बड़ी दिलचस्‍पी के साथ यह कार्यक्रम देख रहा था, अपने पिताजी की बात सुनकर बोला-‘‘ पिताजी, दरअसल मेरी भी बचपन से ही सेना में जाने की इच्‍छा है। अब तो मैंने ग्रेजुएशन भी कर लिया है। आप कहें तो मैं अब एन․डी․ए․ के लिए एप्‍लाई करूं।
मनीष का यह कहना था कि मेहराजी भड़क उठे-‘‘ क्‍या कहा तूने ? तू सेना में जाएगा ! जानता भी है सेना क्‍या होती है? अरे हमारे खानदान में कोई नहीं गया सेना में। ये हमारे लिये नहीं है। ․․․․․․․․․․․․․․․․वहां हमेशा जान का खतरा रहता है। पता नहीं कब क्‍या हो जाए।․․․․․․․․․․․․․ और फिर यहां क्‍या नौकरी की कमी है जो हम तुझे इतनी दूर जाने देंगें। समझता तो कुछ है नहीं, पता नहीं कहां से ये बेवकूफी की बातें सीखकर आता है। खबरदार जो आइन्‍दा ऐसी बकवास की।‘‘
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-उमेश कुमार चौरसिया
50, महादेव कॉलोनी, नाग फनी, बोराज रोड अजमेर 305001 राजस्थान
ई-मेल ukchaurasia@yahoo.com ब्‍लॉग umeshkumarchaurasia.blogspot.com

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