सोमवार, 13 सितंबर 2010

रामदीन की कविता – अर्ध-सत्य

ramden (Custom)

‘‘अर्ध सत्‍य‘‘

ऐसी क्‍या मजबूरी है,

सड़ा अनाज गोदामों में है क्‍या कुछ हेरा फेरी है?

मुफ्‌त नहीं दाना भी दोगे, ऐसी क्‍या मजबूरी है?

दीन हीन हैं लिए कटोरा दिन में भी अंधेरी है,

सबको नहीं तो कुछ को दे दो भूख तो बहुत घनेरी है।

बड़ी दुआ लगती है इनकी ये तो रीति बड़ेरी है,

महा उलट करती है लेकिन जब ये आंख तरेरी है।

कैसे आगे अन्‍न उगेगा कैसे फिर गोदाम भरेगा?

पका पकाया लहू सना जब भंडारों में नाज सड़ेगा।

अभी समय है अब भी दे दो मुंह में इनके तुच्‍छ निवाला,

वरना यों ही मर जायेगा ज्‍यादा अन्‍न उगाने वाला।

छान के गोबर कूड़ा खाना इनकी तो मजबूरी है,

मुफ्‌त नहीं दाना भी दोगे ऐसी क्‍या मजबूरी है।

फटे हाल भूखे अधनंगे ये फसल उगाते रहते हैं,

पता नहीं क्‍यों लापरवाही से वे उसे सड़ाते रहते हैं।

सोचो फसल उगाने को भी रोटी बहुत जरूरी है,

मुफ्‌त नहीं दाना भी दोगे ऐसी क्‍या मजबूरी है?

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रामदीन, जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णा नगर, कानपुर रोड, लखनऊ।

4 blogger-facebook:

  1. लोग चाहे मरे बाढ़, स्वाइन फ्लू या डेंगू से
    दिल्ली की शान दिखाना भी बहुत जरुरी है,
    देख के भूखी जतना को सरकार ने आँखें फेरी है
    मुफ्‌त नहीं दाना भी दोगे ऐसी क्‍या मजबूरी है?

    अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ...

    इसे पड़कर अपनी राय दे :-
    (आपने कभी सोचा है की यंत्र क्या होता है ....?)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html

    उत्तर देंहटाएं
  2. कविता में कडुवी सच्चाई है... किसान मजदूर बनेगा तभी तो हर हाथ को काम साकार होगा...

    उत्तर देंहटाएं
  3. वर्तमान परिपेक्छ्य को इंगित करती एक अच्छी कविता। विषय सीधे सीधे कविता में ढल गई है,इसमें बिंबों का उपयोग कुछ और किया जाता तो ज़ियादा असरकारी होता।

    उत्तर देंहटाएं

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