शनिवार, 11 सितंबर 2010

हरेन्द्रसिंह रावत की हास्य - व्यंग्य कविता – कवि और कविता

क दिन खुश होकर कवि से बीबी बोली, 

मेरे भोले बलमा तुम हो बड़े नटखट

मैं तो खुश होली ! 

तुम कविता करते हो, जब सीढ़ियाँ चढ़ते उतरते हो, 

एक कविता हम पर भी बना दो, हम कैसे लगते हैं, 

ज़रा गा के सुना दो ! 

कवि बोले - आज नहीं फिर कभी, 

पत्नी बोली - नहीं प्राणनाथ अभी ! 

कवि ने फरमाया-मेरे दिल की महा रानी, 

किसी की दादी किसी की नानी, 

तुम स्वयं ही कविता हो, 

तुम सविता और नवदिता हो, 

तुम्हें कविता की क्या ज़रूरत स्वयं ही जयललिता हो ! 

उन्हीं दिनों दूर दर्शन पर - 

रामायण सीरियल चल रहा था, 

ललिता पंवार मंथरा बनी, 

मंथरा केकई संवाद चल रहा था! 

गुस्से से लाल पीली होती बीबी बोली, 

मैं तुम्हें ललिता लगती हूँ, 

मंथरा जैसे खूसर पुसर करती हूँ, 

कवि के बुरे थे ग्रह और थी उल्टी घड़ी,  

बीबी कवि से खूब लड़ी, 

पता नहीं कितनी पीठ पर पड़ी, 

बीबी के हाथ थी छड़ी ! 

पीठ सहलाते हुए कवि ने काका हाथरसी की कविता गुन गुनाई, 

अपनी पत्नी को सुनाई,, 

                   "खट्टे खारे खर खरे, मृदुला जी के वैन, 

चिल गोजा से लग रहे मृग नैनी के नैन, 

मृग नैनी के नैन, शान्ति करती दंगा, 

नल पर नहाती देखो, नर्मदा गोदावरी गंगा !" 

फिर क्या था, किचन से चिमटा वेलन, बट्टा

मिसायलों की तरह आने लगी, 

कवि के केश रहित खोपड़ी से टकराने लगी ! 

सामने क्रिकेट का मैच चल रहा था, 

बल्ले से चौका छक्का निकल रहा था, 

कवि को हर छक्का बेलन नज़र आ रहा था, 

बारबार खोपड़ी पर हाथ जा रहा था ! 

अचानक एक बॉल लहराती हुई फिरी, 

बंजर सी कवि की खोपड़ी पर जा गिरी !     

लेकिन कवि तो कवि होता है, 

इन जख्मों से नहीं रोता है, 

रोज चोट खाता है और एक नयी कविता बनाता है, 

एक दिन एक दोस्त के घर गया, 

दोस्त ने बिठाया पानी पिलाया, 

कवि का हाल चाल पूछा अपना बतलाया! 

कवि खुश हो रहा था,  

आज पहली बार कविता सुनने वाला श्रोता मिल रहा था ! 

मन ही मन विचार कर रहा था, 

इसे आज पूरी कविता सुनाउँगा, रात यहीं बिताऊँगा, 

जैसे दोस्त चाय का प्याला लेकर बैठक में आया, 

कवि ने फरमाया, 

"चार लाइनें सुना रहा हूँ, 

सुनते ही दोस्त बाहर भागा, जैसे बिजली का करंट लगा ! 

कवि ने भी दोस्त के पीछे दौड़ लगाई, 

सामने रेड लाईट आई, 

दोस्त बचाओ बचाओ चिला रहा था, 

इस कवि ने कविता सुनने को कहा था ! 

इतना कहते ही दोस्त रेड लाईट क्रॉस करके भाग गया, 

ट्रैफ़िक पुलिस वाला सामने आ गया! 

कवि बोला, आपने मेरे श्रोता को भगा कर

मेरे कविता सुनाने के अधिकार को छीना है, 

अब आपको मेरी कविता सुन कर इस अमृत रस को पीना है ! 

अब भागने की बारी पुलिस वाले की थी, 

भागते भागते कवि ने पुलिस वाले को ही पूरी कविता सुना दी !  

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