रविवार, 12 सितंबर 2010

संजय जनागल की लघुकथाएँ

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  1. लघुकथाएं

...कोई और सही

कई वर्षों से राधे जी-जान से मालिक का हुक्‍म बजा रहा था।

‘‘जी हुजूर, जी हुजूर'' इसके आगे कभी मालिक के सामने राधे के मुँह से शब्‍द नहीं निकले।

लेकिन आज मालिक राधे पर बरस रहे थे क्‍योंकि ड्राइक्‍लीन वाली दुकान से कोट लाने में उसे दो घण्‍टे से ज्‍यादा बीत चुके थे।

‘‘मैंने तुझे बच्‍चे की तरह रखा। तुझ पर इतना भरोसा किया और तूने मुझे ये सिला दिया?''

‘‘लेकिन मालिक!'' आज राधे के मुँह से पहली बार नये शब्‍द फूटे थे। मालिक ने बीच में राधे की बात को काटते हुए कहा, ‘‘नालायक, निकल जा यहाँ से। तू क्‍या सोचता है तू नहीं करेगा तो क्‍या मेरा काम नहीं होगा? मेरा काम न रूका है और न रूकेगा। तू नहीं, तो कोई और सही।''

राधे अपना सा मुँह लेकर निकल पड़ा। पूरे रास्‍ते यहीं सोचता रहा कि मालिक ने मुझे अपने बच्‍चे की तरह रखा था या एक नौकर की तरह?

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रौब

दूध की दुकान पर पुलिस की जीप आकर रूकी।

‘‘सामने से दो किलो दूध ले आ।'' पुलिस अधिकारी ने सौ रूपये का नोट हवलदार को देते हुए कहा।

''जी साब!'' कहकर हवलदार जीप उतरा।

‘‘पहले मुझे दो किलो दूध दे दे। साहब गाड़ी में बैठे है। जल्‍दी कर।'' हवलदार दुकानदार को सौ का नोट पकड़ाते हुए बोला।

‘‘साब, दूध के लिए बर्तन लाना पड़ेगा क्‍योंकि पॉलीथीन पर तो सरकार ने पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है।'' दुकानदार ने कहा।

‘‘अबे स्‍साले कानून मत झाड़। मुझे पता है तूने अन्‍दर थैली छुपाकर रखी है। चुपचाप अन्‍दर से थैली लाकर दूध दे दे, नहीं तो एक थैली के चक्‍कर में एक लाख भरने पड़ेंगे?'' सड़क पर थूकते हुए हवलदार ने कहा।

‘‘साब मैं सच कह रहा हूँ मेरे पास एक भी थैली नहीं है।'' दुकानदार ने अपनी व्‍यथा बताई।

‘‘लगता है साब को कहना ही पड़ेगा।'' हवलदार ने इतना कहकर जैसे ही जीप के पास जाने के लिए कदम उठाया, दुकानदार तुरन्‍त बोला, ‘‘साब, रूकिये। मैं कुछ करता हूँ।'' दुकानदार भागकर अन्‍दर गया और स्‍टील की भरनी में दूध डालकर पकड़ा दिया। ‘‘लीजिए साहब।'' हाँफता हुआ दुकानदार बोला।

हवलदार ने भरनी पकड़ी और जीप रवाना कर चल दिया।

दुकानदार ने राहत की सांस ली। दुकानदार अब निश्‍चिंत था ‘‘चलो मामला सस्‍ते में निपट गया।''

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संजय जनागल

अनु कम्प्यूटर्स, बड़ी जसोलाई,

रामदेवजी मन्दिर के पास, चौखूंटी,

बीकानेर-01 मो. 9252969180

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