शनिवार, 25 सितंबर 2010

राजीव श्रीवास्तव की हास्य कविता – सब कुर्सी का खेल

सब कुर्सी का खेल

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बड़ी कुर्सी पे बैठ के मानस मचा रहा धमाल

नहीं जनता के ये सब तो बस कुर्सी का कमाल

 

लोग आगे पीछे घूमे जी-जी का राग अलापे

सर -जी के पसंद हैं क्या ये पहले से भांपे

 

कोई लेकर बैग घूमता कोई छतरी ताने

सोसायटी में रोब जमता कि साहब हम को जाने

 

लगा -लगा माखन सेर भर पीछे -पीछे भागे

जो सर जी का काम पड़े तो रात-रात भर जागे

 

घर का सारा काम करे ये सब्जी भी लाए

जो सर जी की मैडम कह दे वो काम है भाए

 

बचो को स्कूल छोड़ मैडम को कराए "शॉपिंग"

अपने घर वालों को भूल कर सर से करे है "सेटिंग"

 

सिर जी की तारीफ उन्हीं के मूह पे है करते

सिर जी भी गर्व से हर बात पे हामी भरते

 

सोच -सोच कर खूब इतराते देख के लंबी फौज

सोचा जब से मिले है कुर्सी हो गए है मौज

 

अपने घर पे दावत देकर साम करेंगे रोशन

हर तरह से खुस करेंगे पाने को परमोसन

 

एक ज़रा से बात पर किसी के समझ ना आई

तेरे कोई वक्त नहीं ये कुर्सी का खेल है भाई

 

जिस दिन कुर्सी पे बैठेगा दूजा कोई ऑफीसर

नहीं कोई तेरी बात करेगा नहीं कहेगा सर-सर

 

तेरे सामने ही तेरे चमचे होंगे बेगाने

हर किसी को बोलेंगे के हम इन्हें ना जाने

 

सोच रहा "राजीव दुनिया का है कैसा खेल

कुर्सी के "वॅल्यू" देख कर लोग बढ़ाए मेल

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rajeev shrivastava

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

मेडिकल कॉलेज हल्दवानी

© copyright reserved by author

2 blogger-facebook:

  1. bilkul sahi kaha

    sab kursi ka hi khel hai janab

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिलकुल सही पहचाना है अच्छा और करारा है

    उत्तर देंहटाएं

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