शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

यशवन्‍त कोठारी का आलेख – नया ज्ञानोदय बेवफाई सुपर विशेषांक उर्फ बेवफाई का उदास उत्सव!

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बेवफाई का उदास उत्‍सव !

यशवन्‍त कोठारी

भारतीय ज्ञानपीठ के मासिक पत्र नया ज्ञानोदय के जुलाई 2010 तथा अगस्‍त 2010 के अंक बेवफाई सुपर विशेषांक के रुप में आये है, एक तीसरा सुपर विशेषांक निकलने वाला था। शायद भू्रण हत्‍या हो गई। और सितम्‍बर 2010 अंक सामान्‍य अंक की तरह ही आया। बेवफाई के इस प्रकार के अंकों की एक लम्‍बी श्रृखंला प्रकाशित की जा सकती है क्‍योंकि अधिकांश विश्‍व साहित्‍य पे्रम, घृणा, सेक्‍स, बेवफाई, वेश्‍यावृत्‍ति, देह ब्‍यापार, गणिका साहित्‍य, देवदासी प्रथा के आसपास ही रचे गये हैं। इस सम्‍पूर्ण प्रक्रिया का कोई ओर छोर नहीं हैं। वर्षों पहले सारिका ने विश्‍व साहित्‍य में गणिका, देहव्यापार अंक, विषकन्‍या अंक आदि प्रकाशित किये थे।

इसी प्रकार धर्मयुग ने एक लम्‍बी श्रृंखला दूसरी पत्‍नी-दूसरी औरत पर छापी थी। फिर धर्मयुग ने कलमुंही तू मर क्‍यों नहीं गई ‘1 दिसम्‍बर 92' प्रकाशित किया था। तब भी सुधी पाठकों ने साहू परिवार तक आपत्‍तियां दर्ज कराई थी। विशेषकर सारिका के देह व्‍यापार अंकों को लेकर। हालांकि तब सारिका ने सर्वाधिक, बिक्री के रिकार्ड तोड़ने के विज्ञापन भी छापे थे, शायद नया ज्ञानोदय भी ऐसे ही किसी रिकार्ड को तोड़ने का प्रयास कर रहा है मगर साहू परिवार से यह तो पूछा ही जा सकता है कि बेवफाई के इस विराट उत्‍सव के माध्‍यम से वे हिन्‍दी साहित्‍यिक पत्रकारिता को किस ओर ले जाना चाहते है। क्‍या आज हिन्‍दी साहित्‍यिक पत्रकारिता एक उदास उत्‍सव हो गई है जिसमे देह की चर्चा किये बिना रंग भरना बहुत ही मुश्‍किल हो गया हैं।

समकालीन भारतीय व क्षेत्रीय भाषाओं की पत्रकारिता में यह सब शायद बाजार की मांग के अनुरुप हो रहा है। बाजार नंगेपन की मांग करता है तो शायद सम्‍पादक का कर्तव्‍य है कि वो भी नंगापन दिखाये।

खैर अब कुछ चर्चा पढ़े गये दो अंकों की।

जुलाई अंक में उर्दू अफसानों की भरमार है और यह उम्‍मीद की गई है कि सब कुछ बेवफाई के सहारे ही चल रहा है। सिवाय राजकपूर की उदास प्रेम कहानी के कुछ भी पठनीय नहीं लगता। अधिकांश रचनाएँ बाजार में -- उपलब्‍ध है। जो कुछ उपलब्‍ध नहीं वो इन रचनाओं पर समीक्षात्‍मक अध्‍ययन। जिसका कोई औचित्‍य और वजूद समझ में नहीं आता। आखिर पाठक को यह सोचने-समझने का अधिकार है कि नया क्‍या मिला। चर्वित चर्वण से क्‍या फायदा हुआ साहित्‍य का भी और पाठकों का भी और प्रतिष्ठान का भी। मेरा सच या उसका सच या हम सब का सच-सब सच बाजार के हवाले है।

अगस्‍त अंक में हिन्‍दी कहानी में बेवफाई के गीत गाये हैं। अधिकांश रचनाएँ पुरानी है। कविताएं तो लगभग सभी पुरानी है प्रेम कविताओं को बेवफाई की कविताएँ बना दिया गया है। रचनाओं पर चर्चा करना अभीष्ठ नहीं है क्‍योंकि सब कुछ जाना पहचाना है। मूल प्रश्‍न ये है कि बेवफाई के सहारे प्रकाशक-सम्‍पादक कहना क्या चाहता है? यदि कहने के लिए नया कुछ नहीं है तो फिर देह-ब्‍यापार -गणिका अंकों की श्रेणी में ही इन अंकों को भी रख दिया जाना चाहिये। आखिर देह को बेचने का अधिकार तो सामूहिक है क्‍यों सर जी। और फिर केवल स्‍त्री का बाजार ही क्‍यों ?

सारिका-धर्मयुग कालान्‍तर में बंद हो गये। धीरे-धीरे साहित्‍यिक पत्रकारिता भी हाशिये पर चली गई। लेकिन नई बोतल में पुरानी शराब या पुरानी बोतल में नई शराब प्रस्‍तुत करने से नया क्‍या हो जाने वाला है। तलाश किसकी। भटकाव किसका किसके लिए। पुस्‍तक की मृत्‍यु की घोषणा करना वैसे ही है जैसे साहित्‍य की मृत्‍यु की घोषणा करना। पुस्‍तक रुप बदल कर जिन्‍दा है। और शायद ये भी एक प्रकार की बेवफाई ही है। इन्‍टरनेट पर उपलब्‍ध इन अंकों पर एक लम्‍बी काली पट्‌टी की उपस्‍थिति प्रेस-सेंसरशिप की याद दिलाती है। क्‍या बेवफाई को भी काली पट्‌टी की जरुरत है या फिर प्रिंट मीडिया को बचाने की एक असफल कोशिश। आखिर साहित्‍य सबके लिए होना चाहिये।

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यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

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ईमेल - ykkothari3@gmail.com

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