मंगलवार, 21 सितंबर 2010

दीप्ति परमार की कविताएँ

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जाने क्यों ?

जाने क्यों ?

थमी सी है जिन्दगी

महसूस होता है

कहीं कुछ कमी सी है जिन्दगी ।

आँखों से आँसू तो सूख गये हैं

फिर भी क्यों नमी सी है जिन्दगी

कहीं कुछ कमी सी है जिन्दगी ।

काँरवां तो साथ ही चल रहा है

फिर भी क्यों रुकी सी है जिन्दगी

कहीं कुछ कमी सी है जिन्दगी ।

रंग तो बहुत है जमाने के

फिर भी क्यों बेरंग सी है जिन्दगी

कहीं कुछ कमी सी है जिन्दगी

जाने क्यों ?

थमी सी है जिन्दगी !

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छोटी दुनिया

यूं तो

दुनिया छोटी है

लेकिन

दिलों-दिलों के बीच

बड़ी लंबी दूरी है ।

यूं तो बहुत मिल जाते हैं

लेकिन कोई हमदर्द नहीं मिलता ।

यूं तो वक्त बहुत है

लेकिन अपनों के लिए नहीं मिलता ।

यूं तो खुशियाँ बहुत है

लेकिन गमों से छुटकारा नहीं मिलता ।

यूं तो राह बहुत है

लेकिन हमराह नहीं मिलता ।

यूं तो आदमी छोटा है

लेकिन उसका अहं तो छोटा नहीं होता

इसलिए

दुनिया छोटी रही

और

आदमी बड़ा बन गया !

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डॅा. दीप्ति बी. परमार, प्रवक्ता हिन्दी-विभाग

आर. आर. पटेल महाविधालय, राजकोट

4 blogger-facebook:

  1. sach ,kitana sach!mool sacchai aham hee to hai.sansaar chota ho gaya hai.
    Aapaki kavita thode se saral shbdon se hi Atma bodh kara sakata hai.
    Bahut hi sunder aur sanvedansheel.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदमी बड़ा बन गया ....अच्छी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  3. दीप्‍त‍ि जी की हर नज्‍म सोचने को वि‍वश कर देती है और हर बार एक संदेश देती है । यही उनके लेखन का चमत्‍कार है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छी कवितायें नाज़ुक ज़िन्दगी और मजबूत अहं का बख़ूबी बख़ान करती हुई।

    उत्तर देंहटाएं

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