मंगलवार, 21 सितंबर 2010

विजय वर्मा की कविता – अहं के पेड़

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अहं के पेड़

अहं के बीज

बोये थे मैंने ,

दोस्तों ने भी मिथ्या-प्रशंसा के

उर्वरक डाले थे.

कैसे-कैसे भ्रम मैंने

मन में पाले थे,

फिर बारी आयी

आत्मा-श्लाघा के मानसून की.

फूल खिले हठधर्मिता के

देख-भाल की उनकी.

दुर्व्यवहारों के फूटे कोपल.

अहंकार में सने हए

कुछ  दिनों में निरंकुशता के

मोटे-मोटे तने हुए.

बहुत उपजाऊ हो गया

मेरा यह अभिमानी मन,

इसको हरा-भरा रखने को

किये मैंने लाख जतन.

स्वार्थी-जनों ने कुछ

मेरे लिए दुआएं की,

उसका कुछ असर

दिखाई दिया नहीं लेकिन.

भूल गया था मै कि

स्वार्थी-दुआओं में

असर नहीं होते.

अहं के पेड़ हो

चाहे जितने बड़े,

गहरे उनके जड़ नहीं होते.

----

विजय कुमार वर्मा,

बोकारो थर्मल,

दामोदर घाटी निगम.डी एम् डी -३१/बी

--
v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

9 blogger-facebook:

  1. भूल गया था मै कि

    स्वार्थी-दुआओं में

    असर नहीं होते.

    अहं के पेड़ हो

    चाहे जितने बड़े,

    गहरे उनके जड़ नहीं होते.

    बहुत बढिया !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सटीक बात कही है ..अहम के पेड़ों की जड़ें नहीं होतीं ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, सार्थक, सम सामयिक, अर्थवत्तात्मक कविता,पुष्ट कला व भाव पक्ष,शब्द व अर्थ प्रतीति स्पष्ट बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी कविता। अहं के पेड़ अक्सर बहुत बड़े होते हैं ये काटे नहीं जा सकते , ये आप ही कभी भरभरा के गिरते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 28 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  6. अहं के पेड़ हो

    चाहे जितने बड़े,

    गहरे उनके जड़ नहीं होते.

    bahut hi sarthak rachna ..haqiqat ko aaina dikhati

    उत्तर देंहटाएं
  7. कितनी व्यावहारिक बातें कितनी सरलता से कह दीं आपने .बहुत ही अच्छी प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह वाह , क्या कविता है , आप अंतर्यामी भी लग रहे हो , अभी कल ही मैंने एक अहंकारी मानव को फुफकारते देखा था .

    उत्तर देंहटाएं

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