रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एम. जे. अकबर का आलेख - लालच अब सत्ताधारियों का नया धर्म है…

लालच अब एक नया धर्म बन चुका है। उसके अलावा अब और कुछ पवित्र नहीं रह गया है : न अफसरशाही के सर्वोच्च दफ्तर, न मुख्यमंत्री, न सेना प्रमुख और...

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

उदयकरण ‘सुमन’ की ग़ज़ल

  वो कितने बेचारे होंगे जीती बाजी हारे होंगे   खुद के सगा सहोदर ने भी ताने पत्थर के मारे होंगे   माँ जाए भी ऐसे निर्मम कमर तोड़ हत्यारे होंग...

विजयलक्ष्मी ‘विभा’ की ग़ज़ल

  कोई मौसम का हाल क्या जाने कब बदल लेगी रूख हवा जाने   मेरी कश्ती है आज दरिया में क्या हो लहरों का फैसला जाने   मुझको खुद भी नहीं खबर अपनी क...

संजय दानी की ग़ज़ल

खटखटाया ना करो दिल के दरों को, मैं खुला रखता हूं मन की खिड़कियों को।   फिर दरख़्ते प्यार में घुन लग रहा,अब काट डालो बेरुख़ी के डालियों को। ...

पूजा तोमर की रचना – मेरा परिचय

*****मेरा परिचय***** मत पूछो मैं क्या हूं? मेरा परिचय देती है मेरी कलम   जहां सबका कारवां होता है खतम वहीं से बढ़ते हैं मेरे कदम   हर उस इ...

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता – मत करना मनमानी

हाथी दादा थे जंगल में सबसे वृद्ध सयाने डरे नहीं वे कभी किसी से किये काम मनमाने।   आया मन‌ तो सूंड़ बढ़ाकर ऊँचा पेड़ गिराया जिस पर चढ़ा हुआ था ...

मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें

                               1- दीपावली हs जिन्दगी, हर साँस हs दिया अर्पित हरेक सांस बा तहरे बदे पिया   सूरज त साथ छोड़ देवे सांझ होत ही...

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की कविता - वृक्षारोपण

पेड़-पौधे तो, हमने भी लगाये हैं। फर्क केवल इतना कि, हमने फोटो नहीं खिचवाये हैं।   क्‍या सबूत कि हमने, धरा को हरा बनाया है? ये और बात है कि...

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा के दो व्यंग्य

बस बाजीगरों की कमी रह गई वैसे तो चाचा दिल्‍लगी दास ने आज भी अपने चेहरे पर खासी नकली मुस्‍कान पोत रखी थी मगर मैं अच्‍छी तरह से वाकिफ था कि ह...

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - लक्ष्‍मी बनाम गृहलक्ष्‍मी

दीपावली के दिनों में गृहलक्ष्‍मियों का महत्‍व बहुत ही अधिक बढ़ जाता है, क्‍योंकि वे अपने आपको लक्ष्‍मीजी की डुप्‍लीकेट मानती हैं। लक्ष्‍म...

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

अरूप मंडल के जूट की कलाकृतियाँ

अरूप मंडल व उनके मित्र असित वैद्य जूट से जीवंत कलाकृतियाँ गढ़ने में उस्ताद हैं. कुछ बानगी देखें - अरूप मंडल – दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंग...

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

मंजरी शुक्ल की कविता – गए थे परदेस में रोटी कमाने…

गए थे परदेस में रोजी रोटी कमाने चेहरे वहां  हजारों थे पर सभी अनजाने   दिन बीतते रहे महीने बनकर अपने शहर से ही हुए बेगाने   गोल रोटी ने ...

एकता नाहर की रचना - कुछ दर्द खामोश भी रहते हैं, हर एक दर्द दवा नहीं मांगता…

सागर को प्यास लगती है, तो दरिया से नहीं मांगता।   वृक्ष अगर गिरता है तो, लता से सहारा नहीं मांगता।   हम गिरेंगे तो कौन सम्हालेगा हमें,...

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की हास्य – व्यंग्य कविता – महंगाई कथा

महंगाई कथा कैसे चले गुजारा बाबा, इस महंगाई में। चौकी के संग चूल्‍हा रोये, इस महंगाई में।   बैंगन फिसल रहा हाथों से, कुंदरु करे गुमान। ...

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌ की बाल कविता - पिकनिक

पिक‌निक‌ लालू, कालू मोहन,सोहन, चलो वलें अब पिकनिक में| लीला,शीला,कविता,रोशन, चलो चलें अब पिकनिक में| ले जायेंगे आलू बेसन, चलो चलें अब प...

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 48 आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी। कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥   आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढ़ने , और कर के कत्‍ल लौटा, आदम...

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

ग़ज़ल कुछ के ख़ातिर मददगार है जिन्‍दगी। पर अमूमन तो दुश्‍वार है जिन्‍दगी॥   मौत को यूं ही मुज़रिम समझते रहे। जबकि असली ख़तावार ह...

विजय वर्मा की दो कविताएँ – सलीब व धोखा

     [१] सलीब ना रिश्तों की अहमियत है ना भावनाओं पे  गौर है, एक अज़ब की बेकसी है एक गज़ब का दौर है। क्या कहूँ, किससे कहूँ सभी ने तो ...

राजीव श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता – लो आया करवाचौथ

एक सुबह जब आँख खुली तो मेरे उड़ गये होश , मेरे बीवी खड़ी सामने आँखों में भर के जोश !   बोली मिस्टर कैसे हो और कैसी कटी है आपकी रात , ना जान...

राघवेन्द्र सिंह का आलेख - चीन के द्वारा भारत की घेराबंदी

वर्ष 2007 में चीन द्वारा वास्‍तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण या उससे मिलती जुलती लगभग 140 घटनायें हुई, वर्ष 2008 में 250 से भी अधिक तथा वर्...

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

संजय दानी की ग़ज़लें

(1) सर झुकाता ही नहीं हंगामे- इश्क़, इसलिये सबसे उपर है नामे-इश्क़।   है नहीं सारा ज़माना रिंद पर, कौन है जो ना पिया हो जामे-इश्क़।   इश्क़ ...

गोविंद सिंह असिवाल की पुस्तक समीक्षा – पी. दयाल श्रीवास्तव के बाल गीत संग्रह

समीक्षा व्यंगकार पी दयाल श्रीवास्तव के एक जोड़ी बाल गीत संग्रह समीक्षक .. गोविंद सिंह असिवाल                                          2बी....

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

अनामिका घटक की कविता

इस पार प्रिये तुम हो मुझे नहीं जाना उस पार क्योंकि इस पार … मैं  हूँ तुम्हारी संगिनी उस पार निस्संग जीवन है स्वागत के लिए इस पार मैं सहधर्म...

प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌ का बाल गीत - मुनियाँ की बारात

मुनियाँ की बारात   हाथी, घोड़े, उल्लू तक थे मुनियाँ की बारात में भालू ,बंदर , शेर उचकते मुनियाँ की बारात में। शोर शराबा, ढोल ढमाका, आतिशबाजी...

प्रमोद भार्गव का आलेख - कचरा मैदानों से फूटती शैतानी (लैंडफिल)गैसें ?

कचरा मैदानों से फूटती शैतानी (लैंडफिल)गैसें ? केंचुओं से संभव है जहरीली गैसों पर नियंत्रण! प्रमोद भार्गव सॉफ्‍टवेयर इंजीनियर अभिषेक भ...

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का व्यंग्य : लुंगी महिमा बनाम लुंगी पर एक शोध प्रबंध

प्र स्तुत अंश देश के होनहार एवं प्रगतिशील विचारधारा वाले समाज शास्त्र के एक पी एच डी के एक छात्र द्वारा प्रेषित शोध प्रबंध से लिया गया है। व...

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌ की रचना – तिरंगा लिख

तिरंगा लिख न अच्छा न गंदा लिख कोई कहानी जिंदा लिख|   किस दल को कब कहां दिया काले धन का चंदा लिख|   काले चेहरे नहीं छुपा सबका गोरख धंधा लिख...

मंजरी शुक्ल की बाल कहानी – फूलों का नगर

गु रु वशिष्ठ के यहाँ बहुत से राजकुमार शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते थे और गुरुकुल मे रहा करते थे। गुरूजी सभी शिष्यों को समान र...

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

दामोदर लाल ‘जांगिड़’ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 55 गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार। बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥   कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव, दुखि...

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

दीप्ति परमार की उपन्यास समीक्षा : छिन्नमस्ता - नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा

( प्रभा खेतान के उपन्यास पर केन्द्रित ) विशिष्ट प्रतिभा की धनी प्रभा खेतान (1 नवम्बर 1942 से 19 सितम्बर 2008 ) ने दर्शन शास्त्र् से एम. ए...

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

एक दिन -- कुछ हसरतें तुझसे बेपनाह मोहब्बत करता हूँ, सारी जिंदगी समझाता रहा, खून के एक-एक कतरे से, खत लिख,मर कर एलान- ए- मोहब्बत क...

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