रविवार, 3 अक्तूबर 2010

सतीष चंद्र श्रीवास्तव की ग़ज़लें

गजलें

(1)

ये कैसा शमाँ है ये कैसा मंजर है।

इंसानियत की पीठ में धंसा खंजर है।

 

हैवानियत की फसल कटी तब-तब,

सोच इंसान की जब-जब हुई बंजर है।

 

ये खिड़कियों से झाँकते उदास चेहरे,

सोचते है क्‍या यही उनका शहर है।

 

ले जाओ उठा कर रख दो इसे कहीं,

कैसे कह दूं यही मेरा शहर है।

 

नफरतों की आँधी चला लो जितनी,

उखड़ नहीं सकेगा ये प्रेम का शहर है।

 

लोग तो चाहते हैं मोहब्‍बत से रहना,

कोई आता, कानों में कहता प्रेम जहर है।

 

(2)

सब कुछ है मेरे देश में रोटी नहीं तो क्‍या।

वादा ही तुम लपेट लो लंगोटी नहीं तो क्‍या।

 

सत्‍ता के खेल में इंसान बन गये मोहरे,

खेलने को गर कहीं गोटी नहीं तो क्‍या।

 

ददै तो होता सिर्फ दर्द अपना पराया नहीं,

आँख पत्‍थर की है तुम्‍हारी रोती नहीं तो क्‍या।

 

लाजमी है ख्‍वाब देखना हर इंसान के लिए,

हर ख्‍वाब की ताबीर होती नहीं तो क्‍या।

 

(4)

यहाँ हादसा हर रोज होता है क्‍यूं।

नया अफसाना रोज बनता है क्‍यूं।

 

खुशबू कमल को गर फैलाना ही था,

कीचड़ में वो फिर खिलता है क्‍यूं।

 

मन्‍जिल की तलब हो गयी है अगर,

रास्‍तों की मुश्किलों को सोचता है क्‍यूं।

 

तन्‍हाँ ही चलना है हर इक को यहाँ,

राही की तलाश तू करता है क्‍यूं।

 

गीत है होंठों पर गर मुक्‍म्‍मल,

साजों की दुकान खोजता है क्‍यूं।

 

सिर्फ एक सांस की जरूरत है तुझे,

ज़माने भर की दौलत चाहता है क्‍यूं।

 

(5)

जिन्‍दगी की आंच बचा कर रख।

अपने जीवन के राज़ बचा कर रख।

 

हो जायेगा सब कुछ सुनहरा यहाँ,

आँखें में कोई ख्‍वाब सजा कर रख।

 

बहुत फलसफे सुनाती है जिन्‍दगी,

दीवार में इसकी कान लगा कर रख।

 

सिर्फ सच्‍चाई ही नहीं है जिन्‍दगी,

जिन्‍दगी भ्रम है, इसे बचा कर रख।

 

जोड़ के मत रखो दर्द को दर्द से।

गम को गम से घटा कर रख।

 

सिर्फ रोशनी में ही न रहा कीजिए,

अंधेरों पर भी नजर जमा कर रख।

 

(6)

बन्‍द जो पड़ा है यहां वो खत देखिये।

मेरी आँखें से अपनी हकीकत देखिये।

 

झूठ को सच बनाने का हुनर है इनमें,

जिन्‍दगी के खेल में इनकी महारत देखिये।

 

उनके तारीक मकानों पर भी नजर डाल,

सिर्फ अपने घरों के उजाले मत देखिये।

 

मशवरा जो मुझसे कल उधार ले गए,

देते है वही आज मुझे, नसीहत देखिये।

 

अभी तो पर्दे में है वे तो जलवा देखिये,

जब होंगे वो बे-पर्दा तो कयामत देखिये।

 

बैठा हुआ है वो बहरो की बज्‍म में,

सुनता नहीं है कोई शिकायत देखिये।

 

(7)

तुम्‍हारे साथ मैं कुछ दूर चलना चाहता हूं।

जिन्‍दगी में कुछ कर गुजरना चाहता हूं।

 

खुद से दूर जाने की सजा पा चुका हूं।

अपने आप के करीब आना चाहता हूं।

 

दर्द की फस्‍ल बो गये कुछ लोग,

प्रेम की गाथा सुनाना चाहता हूं।

 

शौक है तुम्‍हारा सब्र का इम्‍तहाँ लेना,

दीवाना हूं ख़्वाहिशों से खेलना चाहता हूं।

 

बच्‍चा कहते हो तो कुछ गलत नहीं कहते,

बच्‍चा हूं तितलियों से खेलना चाहता हूं।

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सतीष चन्‍द्र श्रीवास्‍तव

8 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (4/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक से बढ़कर एक गजलें , बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सिर्फ एक सांस की जरूरत है तुझे,

    ज़माने भर की दौलत चाहता है क्‍यूं।..

    कहाँ समझते हैं लोग ये ...एक अंधी दौड़ है , एक अंधी भीड़ है ...एक के पीछे एक भागी जा रही है ...
    सभी ग़ज़लें एक से बढ़ कर एक हैं ...
    आभार ..!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत उम्दा गज़लें पेश कि हैं ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. सारी गजले शानदार हैं.

    आभार पढाने के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सिर्फ़ एक सांस की ज़रूरत है तुझे,
    ज़माने भर की दौलत चाहता है क्यूं। ख़ुबसूरत शे'र , रचनाकार को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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