गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की हास्य व्यंग्य कविताएँ

बारात जाने के बाद

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बारात की मौज-मस्ती,

हर कोई रखता याद ,

आओ बताउँ तुम्हें कि,

क्या होता, बारात जाने के बाद!

 

सूना मंडप,सूना पंडाल,

हर तरफ सूना हो जाता है,

फूल माला तहस नहस है,

कुर्सियों पे कोई सोता है!

 

लड़की की माँ गमगीन है,

फूट फूट कर रोती है,

बारात के जाने के बाद,

माँ की ऐसी हालत ही होती है!

 

बाप का दिल भारी है,

पर एक चिंता सताती है,

लोगों का हिसाब करने में,

सुबह से शाम हो जाती है!

 

"केटर्र" का मूड खराब है,

खोए बर्तन गिनवाता है ,

जितने में बात हुई थी,

उससे ज़यादा पैसे बताता है !

 

खाने की प्लेटों को लेकर,

असमंजश बना ही रहता है,

आप जितनी भी प्लेट गिनवालो,

वो उससे ज़्यादा ही कहता है!

 

फोटो वाले से झिक झिक होती,

जब अपना मुह वो खोलता है,

बेफ़िजूल की फोटो खिचता,

रोल-पे रोल जोड़ता है!

 

सारे 'वालों' को पैसे देने में,

बाप का पसीना छूटता है,

एक " वाले से फ़ुर्सत पता,

तो दूसरा प्रकट हो जाता है!

 

खाना-मिठाई बहुत बच जाती,

तब इनको ठिकाने लगाते है,

आस पड़ोस में बाँट कर,

एक रस्म निभाते हैं!

 

फिर शुरू होती काना- फूसी,

लोग अपनी राय सुनाते हैं,

कोई आवभगत पे रोष जताता ,

कुछ लोग इंतज़ाम पे नाराज़गी जताते हैं!

 

शादी में ये सब है चलता,

नहीं इसे कोई याद रखता है,

मैंने तो बस यू ही बतलाया कि,

बारात जाने के बाद,

क्या-क्या होता है!

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एक गली-एक मकान -एक व्यापार

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हर बड़े शहर की

आसमान छूती इमारतों

और तेज भागती जिंदगी के बीच,

होती है, एक गली,उस गली,

मैं एक मकान,उस मकान,

मैं होता है एक व्‍यापार!

 

जहाँ नुमाइश लगती है

जहाँ तोल-मोल होता है

जहाँ जाँच -परख होती है

और सौदा हो जाता है आबरु का,

सौदा होता है मासूमों की जिंदगी का,

कुछ पल के सुख के लिए!

 

इन पलो में आदमी

हैवानियत की सारी हदें,

पार कर जाता है.

कई मासूमों की चीख

चारदीवारी मैं गुम हो जाती है,

ना जज़्बातों की कीमत,

ना उम्र का लिहाज,

बस खेल होता है -

चमड़ी से दमडी वसूलने का!

 

रात भर महफ़िल सजती है,

जब सारा शहर सो जाता है

तो इस व्‍यापार मैं खूब उछाल आता है,

कई चेहरों से शराफ़त का नकाब उठ जाता है,

और सुबह होते ही खामोशी ,

जैसे रात मैं कुछ हुआ ही ना हो ,

और इंतजार एक नयी रात का

इसी शहर में,

इसी गली में,

इसी मकान में

कुछ नये चेहरे के साथ

फिर वही व्यापार-----!

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आइडियल बहू

बेटा ज्यों-ज्यों बड़ा हुआ माँ ने सपना देखना किया शुरू,

सोच रही क्या जतन लगाऊं और ले आऊं आइडियल बहू!

 

खुली आँखों से देख के सपना जोड़ -तोड़ लगा रही,

मोहल्ले की हर सुंदर लड़की में उसे अपनी बहू नज़र आ रही!

 

सास -बहू के देख सीरियल अपने को रिझा रही,

बड़ी बिंदी,लंबा टीका और घूँघट देख- देख मुस्का रही!

 

राह चलती हर लड़की को देख कुछ छण रुक जाती है,

नैन -नक्स को ध्यान से देखे फिर उसका पता लगा रही!

 

इतना भी कम ना था जो बेटे का बियो-डाटा बटवा दिया

उसकी तारीफ के बाँध के पुल इस्तेहार छपवा दिया

 

सोच रही कोई माँ जी कहती, छम-छम करती आएगी

सुबह सुबह जल्दी उठेगी और हरी भजन सुनाएगी

 

सुंदर चेहरा कजरारे नैन मंद-मंद मुस्काएगी

दिन भर रहे टिप-टॉप घर की शोभा बड़ाएगी

 

सर्व गुण सम्पन्न ,संस्कारी और सुंदर बहू लाएगी

पड़ोसिनों को उससे मिलवा खूब रौब जमाएगी

 

पति को परमेश्वर कहे और घर को स्वर्ग बनाएगी

दिन भर सारे काम करे और फिर पैर दबाएगी

 

माँ के ऐसे सपनों से बेटे का मन घबरा रहा

कहाँ से लाए आईडीअल बहू, ये गम उसे सता रहा

 

एक दिन बेटा माँ से बोला, तू क्यों नहीं समझती है

आज कल आइडियल बहू सिर्फ़ सीरियल में ही दिखती है

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rajeev shrivastava

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

3 blogger-facebook:

  1. बारात जाने के बाद बहुत अच्छी लगी...जो सच है उसे इतनी खूबसूरती के साथ कहा है....बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक दिन बेटा माँ से बोला, तू क्यों नहीं समझती है

    आज कल आइडियल बहू सिर्फ़ सीरियल में ही दिखती है

    अरे भाई सीरियल में भी कहां अच्छी बहुएं रह गईं है

    http://shikanjee.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. shaandaar prastuti ke liye, khaas kar baarat jaane ke baad badhaai.

    उत्तर देंहटाएं

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