शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

एस के पाण्डेय का व्यंग्य – आज की फेमिली

क समय ऐसा भी था जब ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ का दौर था। कम से कम लोगों में ऐसी भावना थी। विचार थे। आज न ही ऐसी भावना है और न ही बिचार। सद्भावना की जगह दुर्भावना और सुविचार की जगह कुविचार ने बसेरा कर लिया है। अथवा करते जा रहे हैं। परिवर्तन लाजिमी होता ही है। जानकार बताते हैं कि पहले वाले भी कोई आदमी थे क्या ? जो आया सो कह दिए। उसे ही नियम मानकर या बनाकर अमल करने लगे। मूर्खता वश लोग पीढ़ी दर पीढ़ी उसी राह पर चलते रहे। लेकिन जब ज्ञान चक्षु खुले तो सब कुछ दिखा, समझ में आया और लोग अपने-अपने हिसाब से चलने लगे।

आखिर यह भी कोई तरीका है कि पशुशाला में जैसे पशु रहते हैं। उस तरह रहा जाय। पशुओं में समझ नहीं है। इसलिए वे बंधन में रहते हैं। जिस खूंटे में और जहाँ बांध दो बंधे रहेंगे। लेकिन हमारे समझ है। तब हम लोग यानी मनुष्य बंधन क्यों माने ? बंधन में क्यों रहें ? न धर्म का बंधन और न ही सम्बन्ध का बंधन। जिससे और जब चाहो संबंध बनाओ और जब चाहो तोड़ो। इससे यह भी साबित हो जाता है कि आज लोग मोह से परे हैं। जोड़ना-तोड़ना मोही कम कर पाते हैं। पहले वाले भी मोह को अच्छा नहीं मानते थे। मोह से दूर रहने की शिक्षा देते थे। कम से कम एक शिक्षा ही सही, कुछ न कुछ तो अमल में ला रहे हैं।

कहा जाता है कि कोई भी प्राणी हो अपना स्वभाव नहीं छोड़ता। विज्ञानी तो यहाँ तक कहते हैं कि प्रत्येक जीवधारी अपने भ्रूणावस्था में अपने पूर्वजों का जीवन इतिहास दुहराता है। आदमी के लिए भी यह सत्य है। कहना मुश्किल लगता है। क्योंकि पशु तो पशुता पर उतरते हैं। ऐसा देखा भी जाता है। लेकिन मानव मानवता पर नहीं उतरते अथवा बहुत ही कम उतरते हैं। हाँ पशुता पर जरूर उतरते हैं। उतर जाते हैं। ऐसा सिर्फ सुनने में ही नहीं आता बल्कि देखने में भी आता है।

पशु जब तक बंधन में रहता है, वह भी शालीन रहता है। भले ही वह लड़ना, चढ़ना, दौड़ना चाहे। लेकिन जब तक बंधन मानता है। कुछ भी नहीं करता अथवा नहीं कर पाता। लेकिन यदि बंधन तोड़ दे। तब चाहे लड़े, चढ़े, दौड़े, या उछले-कूदे। बंधन न मानने की वजह से ही घर-परिवार व समाज में लड़ाई, चढ़ाई, व उछल-कूद होती है। यानी पशुता बढ़ती है।

जब परिवार से ही बंधन लूज होता जा रहा है। तब समाज की क्या बात है ? लड़के-लड़कियाँ माता-पिता का, पति पत्नी का एवं पत्नी पति का बंधन नहीं मानती। एक दूसरे से लोग बंध नहीं पा रहे हैं। बंधना नहीं चाह रहे हैं। इसी तरह शिक्षक विद्यार्थी से और विद्यार्थी शिक्षक से, जिम्मेदार व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से, नेता नीति से, प्रेमी प्रीति से नहीं बंध पा रहे हैं। इसलिए ही हर जगह अराजकता की स्थिति है। आज घर व परिवार की परिभाषा ही बदल गयी है। अपना घर और अपना परिवार का क्या मतलब है ? अथवा क्या मतलब रह गया है ? पता नहीं था।

हाल में ही एक लड़की ने मुझसे पूछा कि पांडेयजी आपके फेमिली में कौन-कौन है ? मैंने जैसे ही बताना शुरू किया कि पिताजी, माताजी ...। उसने बीच में ही टोक दिया। बोली यह तो आपके पिताजी की फेमली है। मैं तो आपके फेमिली के बारे में पूछ रही हूँ। मैं फेमिली का मतलब सोचता रह गया। पिताजी, माताजी, ... मेरे फेमिली में नहीं हैं। मेरा घर उनका घर नहीं है। अब कोई पूछे कि आपके घर में कौन-कौन है ? तब उस घर के बारे में बताना होगा। जिसमें माता-पिता के लिए कोई स्थान नहीं है। अन्यथा वह घर मेरा नहीं होगा। जिस घर में माता-पिता भी हों, वह घर पिताजी का घर होता है। अथवा वह अनाथालय होता है। सच ही है। ऐसे में वह अपना घर कैसे हो सकता है ? यह आज की फेमिली है।

जिस घर या फेमिली में माता-पिता के लिए कोई स्थान नहीं है। उसमें भाई-बहन अथवा अन्य किसी के लिए जगह कहाँ से होगी ? रामू जिस शहर में नौकरी करता है। उसी शहर में उसका बाप रिक्शा चलाता है। एक दिन तो हद हो गयी। ठंढ़ी का दिन था। सूट-बूट में रामू कम्पनी से निकला। सामने वाले रिक्शेवाले से बोला रिक्शा ! आज के लोग कभी-कभी बिल्कुल अर्जुन बन जाते है। इसलिए ही रामू को सिर्फ रिक्शा दिखा आदमी नहीं और रिक्शा ही बोला। त्रिवेणीपुरम कहकर बैठ गया।

इशारे से बताते, गली-गली घुमाते अपने घर, जिसका मालिक कोई दूसरा था क्योकि वह किराये पर रहता था, पहुँच गया। वहाँ उसकी अपनी फेमिली थी। अपना घर और अपनी फेमिली। रिक्शे को रुकने को कहकर अंदर चला गया। पत्नी पैसा लेकर आई। लेकिन वहाँ कोई नहीं था। शायद उन्हें यह भी सोचने का समय नहीं मिला होगा कि जो इस कड़ाके की ठंढ़ में कोसों रिक्शा चलाकर आएगा। वह बिना पैसा लिए, बिना इंतजार किये, बिना आवाज दिए क्यों चला जायेगा ?

वह रिक्शा और कोई नहीं बल्कि रिक्शे पर बैठने वाले का बाप था। बड़े होकर जब लड़के दिन के उजाले में भी माँ-बाप को नहीं पहचानते। तब भला रात के अँधेरे में क्या पहचानेंगे ? वो भी उस समय जब ठंढ़ के कारण सर से पांव तक कपड़े से ढका हो , वो भी मैले-कुचैले कपड़े से। लेकिन बाप जन्म से लेकर बड़े होने तक और उसके बाद चाहे जितना बड़ा क्यों न हो जाय, अंत तक पहचानता है।

शहर में किराये का घर या कमरा लेने चले जाओ तो लोग पहले पूछते हैं कि फेमिली है कि नहीं। उनका मतलब भी अपनी फेमिली से होता है। यदि कोई पिताजी की फेमिली भी रखना चाहे तो उसे कमरा देने वाले कम ही मिलेंगे। इससे अपनी फेमिली का महत्व अपने आप जाहिर हो जाता है। लोग ऐसा भी बताते हैं कि अपनी फेमिली को ही साथ रखने से खर्चा कम आता है। आराम रहता है। दीगर है बच्चों को छोड़ पूरी फेमिली कमाती है फिर भी कम खर्चा भी नहीं पूरा होता।

शर्माजी का लड़का कहता है कि जो कमाए सो खाए। जब तक माता-पिता कमाए। खाए, रहे। अब मैं कमाता हूँ। अपनी फेमिली के लिए। इनका ही गुजर मुश्किल है तो दूसरों का कौन देखे ? अब वह समय नहीं है कि एक कमाए और दस खाएं। एक कमाए अथवा दो और हम दो हमारे दो या एक खाएं और उड़ाएं का जमाना है। अब दस भी कमाएँ तो एक को चाहे वह बाप क्यों न हो, नहीं खिला सकते। यह मजबूरी है। कई बैंक है तो उनमें बैलेंस रखना भी जरूरी है। पीना है पिलाना है। घूमना है घुमाना है। क्या नहीं है ? क्या नहीं करना है ? डैड यू मैनेज योरसेल्फ। मुझे आपकी जरूरत नहीं है। मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ। तुम्हे अब ऊँगली पकड़कर साथ चलने की जरूरत नहीं है। फिर पीछा क्यों नहीं छोड़ते ? अब भी जो साथ चले तो मैं तो गिरूंगा नहीं। ऐसा भागूँगा कि आप गिरेंगे। उठाने वाला भी कोई नहीं होगा। मुझे समय कहाँ है ?

एक लोग का तो यहाँ तक कहना है कि शहर में एक बाथरूम बनाकर। उसी में नहाने से लेकर लैट्रिन तक करते हैं। वह भी एक समय में एक ही आदमी। यदि पिताजी की फेमिली भी साथ में रखना पड़े तो किसी-किसी को सुलभ काम्लेक्स, जो शहरों में कहीं-कहीं बना होता है, बनवाना पड़ सकता है। पिताजी की फेमिली समस्याओं की जड़ है। आज की फेमिली नहीं। लोग भले ही मानें। वह तो अपने को बुद्धिमान मानती है। ऐसे में किसी का क्या दोष ?

अपनी फेमिली की परिभाषा अभी और बदलेगी। आज की फेमिली सिर्फ इतना सीमित नहीं रहेगी। वह दिन भी आएगा जब बच्चों के लिए जगह नहीं होगी। आज भी बोर्डिंग स्कूल न होते तो क्या होता ? हम दो के लिए भी जगह नहीं रहेगी। सब ‘एकला चलो, जरूरत वालों से मिलो’ के गीत गायेंगे। पति का पत्नी से और पत्नी का पति से न निभ पाना इसी का संकेत है। सब कुछ होगा। लेकिन फेमिली नहीं होगी। ऐसा लगता है।

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एस. के. पाण्डेय।

समशापुर (उ. प्र.)।।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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1 blogger-facebook:

  1. सच्चाई ही है.. और यह सोचकर ही दिल बैठा जा रहा है कि वो दिन न देखना पड़े जब बच्चों और धीरे-धीरे पति-पत्नी के लिए भी घर में जगह न हो..
    यह गाना तो फिर गाना ही रह जाएगा - "ये तेरा घर ये मेरा घर, ये घर बहुत हसीन है"

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