शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

ग़ज़ल

अकारथ तो बड़े बूढ़ों की ये बानी नहीं जाती।

दुआएँ दिल से निकली हों तो बेमानी नहीं जाती॥

 

हजारों बार परवानों को समझाया है शम्‍मा ने।

मग़र कुछ बात है कि फ़ितरते-फ़ानी नहीं जाती॥

 

खुदाया तू ने तो बख्‍़शा सरोसामाँ मसर्रत का।

मगर इस बुतकदे की फिर भी वीरानी नहीं जाती॥

 

कमी क्‍या थी तेरे दर पे अगर जो हाथ फैलाते।

फ़क़ीरी में भी लेकिन शाने-सुल्‍तानी नहीं जाती॥

 

हजारों बार की है फिर भी तौबा टूट जाती है।

नसीहत क्‍या करें नासेह की मानी नहीं जाती॥

 

तुम्‍हारा इक नहीं तो क्‍या, हजारों आस्‍ताँ थे पर।

करें क्‍या खाक दर-दर की मग़र छानी नहीं जाती॥

 

मुदावा म़र्जे उल्‍फ़त का न कर पाया था लुकमाँ भी।

ये नब्‍ज़ चारासाजों से तो पहचानी नहीं जाती॥

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ग़ज़ल

असलियत में तो दो चार हैं।

वैसे यारों की भरमार हैं॥

 

मुखबिरी करके बच जाएंगे।

जो असल में गुनहगार हैं॥

 

क्‍या किसी को सजा दे भला?

मुंसिफी खु़द ख़तावार है॥

 

कौन किसका मुदावा करे?

खुद चिकित्‍सक ही बीमार है॥

 

आप किस किस को बहलाएंगे?

हर बशर एक अखबार है॥

 

आंकते क्‍या हो घाटा-नफा?

प्‍यार है कि व्‍यापार है?

 

सारे रिश्‍ते सियासी हुए।

हर तरफ सिर्फ बाज़ार है॥

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ग़ज़ल

कभी थे साफग़ोई के लिए विख्‍यात आईने।

मग़र अब दे रहे हैं गिरगिटों को मात आईने॥

 

अग़र जो बचके रहना हो सुरक्षित दूरियां रक्‍खो।

किसी के भी सगे होते नहीं हज़रात आईने॥

 

ह़की़कत व्‍यक्त करने का हुनर जब से भुलाया है।

तभी से हो रहे हैं देश में आयात आईने॥

 

फक़त शीशा समझ करके ना हर्गिज टाल देना तुम।

छिपा रखते है सीने में सरस जज़्‍बात आईने॥

 

ना इनसे दोस्‍ती अच्‍छी ना इनसे दुश्‍मनी अच्‍छी ।

हर इक नुक्कड़ पे बैठे हैं लगाकर घात आईने॥

 

संवरने के बहाने इक झलक दिखला गया है जो।

उसी के वास्‍ते है मुन्‍तज़िर दिनरात आईने॥

 

कभी तो पत्‍थरों की बारिशें भी झेल जाते हैं।

चटख जाते हैं जाने क्‍यों कभी बेबात आईने॥

 

हमारी ही तरह इनके बने है गात मिट्ठी से।

इसी से झेल पाते हैं नहीं आघात आईने॥

 

क़वायद सीखने की कर रहे आहिस्‍ता आहिस्‍ता।

बुजुर्गों के हुनर से बेख़बर नवजात आईने॥

 

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ग़ज़ल

बुलबुल के आरिजों से नवग़ान लापता है।

अहले चमन के दिल से अरमान लापता है॥

 

दम तोड़ने लगी है बदलाव की हवायें।

तब्‍दीलियों के सारे इम्‍क़ान लापता है॥

 

इन्‍सानियत की अस्‍मत नीलाम हो चुकी हैं।

है जिस्‍म तो सलामत पर जान लापता है॥

 

खबरों की सुर्खियाँ अब जिनको तलाशती हैं।

खुदगर्ज हाकिमों के फ़रमान लापता है॥

 

रहमत की परवरिश में अभिशाप पल रहे हैं।

इंसाफ देखिये कि वरदान लापता है॥

 

गिरजे में है ना जीसस मस्‍ज़िद में ना ख़ुदा है।

दरअस्‍ल मंदिरों से भगवान लापता है॥

 

अल्‍लाह के फरिश्‍तों गफ़लत में अब ना रहना।

बंदों की आस्‍था के प्रतिमान लापता है॥

 

आवाम बेजुबाँ है सायों की सल्‍तनत में।

राजेश' रोशनी की पहचान लापता है॥

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ग़ज़ल

घरों की खस्‍ताहाली का पता देते हैं दरवाज़े।

छिपाओ लाख लेकिन सब बता देते हैं दरवाज़े॥

 

खजानों की तलाशी में खँगाली खाक दुनियां की।

मग़र असली मुहब्‍बत की मता देते हैं दरवाज़े॥

 

भले कितनी भी रंजिश हो न लांघो देहरी घर की।

क़दीमी आबरु का वास्‍ता देते हैं दरवाज़े॥

 

चली आई मेरे घर तक न जाने हसरतें कितनी।

हजारों ख्‍वाहिशों को वास्‍ता देते हैं दरवाज़े॥

 

है शाइर का मकां इसके दफ़ीने और ही होंगे।

कि शोहरत और दौलत को धता देते हैं दरवाज़े॥

 

मुनासिब मश्‍विरा ये है संभलकर खटखटाना तुम।

मकीनों के इरादों को जता देते हैं दरवाज़े॥

7 blogger-facebook:

  1. भारत प्रश्न मंच कि पहेली का जवाब
    http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_8440.html

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  2. सारी गज़लें बहुत अच्छी लगीं

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक से बढ़कर एक...बेहतरीन ग़ज़लें...बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छे गज़लियात ले लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सारी गज़लें बहुत अच्छी लगीं

    उत्तर देंहटाएं
  6. फ़क़ीरी में भी लेकिन शाने-सुल्‍तानी नहीं जाती॥

    मुखबिरी करके बच जाएंगे।
    जो असल में गुनहगार हैं॥

    मग़र अब दे रहे हैं गिरगिटों को मात आईने॥

    छिपा रखते है सीने में सरस जज़्‍बात आईने॥

    रहमत की परवरिश में अभिशाप पल रहे हैं।

    मकीनों के इरादों को जता देते हैं दरवाज़े॥

    गंग-जमुनवी धारा में ढले आपके उद्गार बड़े ही मनमोहक हैं राजेश भाई| अपने ताज़ातरीन दोस्त की बधाई क़ुबूल कीजिएगा|

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