रविवार, 10 अक्तूबर 2010

पुरुषोत्‍तम विश्‍वकर्मा का व्यंग्य – किराए के कौए

चाचा दिल्‍लगी दास की अटपटी बातें सुनकर के कोई भी मंद बुद्धि से मंद बुद्धि व्‍यक्ति भी आसानी से ही समझ सकता है कि चाचा सनकी तो है ही उपर से सठिया भी गए हैं। अगर आपको यकीन नहीं आ रहा है तो इनके ये शब्‍द सुनकर देख लें, जो आज चाचा ने मेरे से कहे थे कि ”मैं कई दिनों से सोच रहा हूँ कि कुछ कौए पाल ही लूं“। अब तो आप भी समझ गए होंगे कि चाचा सनक व सठियाने की सनद लिए धड़ल्‍ले से घूम रहे है। आप की तरह मैं भी ऐसा ही समझा था मगर चाचे की आगे की पूरी बात सुनकर अब समझा हूँ कि मैंने तब कितना ग़लत समझा था चाचा दिल्‍लगी दास को।

चाचे ने समझाने कि गरज से बताया कि वे सचमुच वाले कौए पाल रहे हैं न कि वैसे जैसे हमने दिल्‍ली और जयपुर में बेकार की काँव काँव कर योजनाएं डकार कर विकास की बीट करने वाले पाल रखे हैं। न वैसे जैसे आकाशवाणी व दूरदर्शन चैनलों वालों ने पाल रखे हैं, जो सदा घड़ी देख कर ही काँव काँव करते हैं औेर न ही वैसे जो भीड़ देखते ही काँव काँव शुरु कर देते हैं जैसे गिद्धों को बुला रहे हों कि देखो यहां शिकार पड़ा है। बड़ी बोटियां तुम खा लो और बची खुची खुरचन हमारे लिए छोड़ देना। चाचाजी आगे बोले मैं सचमुच उन कौओं जैसे कौए पाल रहा हूँ जो किसी की मुण्‍डेर पर बैठ कर काँव काँव कर मेहमान आ रहे हैं, मेहमान आ रहे हैं, रोटियां ज्‍यादा बनाना कहेंगे या जिन्‍हें देखकर कोई विरहणी कहेगी कि उड़ जारे कागा मेरा पिया घर आए। और मेरे पाले हुए कौए लोगों की श्राद्ध भी खाएंगे। खास तौर से तो मैं श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध खाने के लिए कौए किराये पर दूंगा और ये कमाई करने का आईडिया मुझे मेरे पड़ोस में घटी एक आश्‍चर्यजनक घटना हो जाने के बाद आया, सुनोगे तो तुम भी कौए ही पालोगे अगर कभी कुछ पालने का शौक चर्राया हो तो।

अरे हुआ यूं था कि मेरे पड़ोसी के पुत्रों ने अपने पिताजी का पहला श्राद्ध निकाला था। निकाला तो अनमने मन से था फिर भी निकाला था। मेरे पड़ोसी रिटायर्ड होने तक छककर रिश्‍वत खाते रहे थे, घर में आज जो कुछ भी हैं वो सब कुछ रिश्‍वत का ही हैं, मुझे तो यहां तक शक है कि उन्‍होंने चारों बेटे भी उत्‍कोच लेकर ही पैदा किए थे या पैदा करने रिश्‍वत झटकी थी तभी तो उनके बेटे अनमने मन से लोक लाज के मारे ही श्राद्ध निकाल रहे थे। चारों बेटे बड़े बड़े थालों में भांति भांति की खाने की चीजें लिए काफी देर से छत पर खड़े थे मगर कोई भी कौआ उनमें चौंच नहीं मार रहा था। यहां तक कि वो ही कौए नीचे फुटपाथ पर बैठे बूट पॉलिस वाले के पिता का श्राद्ध खा आए थे। पत्ते-दोनों में रखा सब कुछ चाट आये थे उसके बच्‍चों ने तो श्राद्ध पर खरीदी गई मिठाई चखी ही नहीं थी यहां तक कि पास रखे कागज के डोंगे में रखी बची खुची सामग्री भी ले गये थे। मगर वो ही कौए मेरे पड़ोसी जी का श्राद्ध नहीं खा रहे थे। ताज्‍जुब हो रहा था कि हकीर से भी हकीर चीज खा जाने वाले कौए रिश्‍वत के अन्‍न का एक दाना भी नहीं खा रहे थे।

अगर कोई लालची कौआ उनकी छत पर जाने की चेष्‍टा करता तो बाकी उसे डांट देते, काँव काँव कर उसे आगाह कर देते कि देखो ये अपवित्र अन्‍न हैं इसे कोई न खायें वरना योनि भ्रष्‍ट हो जाएगा, कौएं की कौम भी बड़ी काइयां किस्‍म की होती है सब कुछ खा जाने वाली जात मेरे पड़ोसी जी का श्राद्ध नहीं खा रहे थे, उनके पुत्र पहले तो मिन्‍नतें करते रहे आखिर भुनभुनाते हुए बोले जंगली कहीं के। जरा पता तो लगाना कि कहीं कौएं किराये पर मिलते है कि नहीं। जब से मैंने ये सुना मुझे तीव्रता से काक प्रेम हो गया और कौए पालने की धुन सवार हो गयी, वैसे भी कोई दूसरा भी शुरु करे तो धन्‍धा मुनाफे वाला है। एक सीजन में सालभर के मुनाफा वसूली की गारंटी।

पुरुषोत्‍तम विश्‍वकर्मा

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  1. ek shaleenta liye sadha hua vyangy,jagah jagah ek sath do do laxyon par chout,masalan fk jagah to koue khilane par bhi mithaiyan nahi kha rahen hain to doosari jagah kouon ke liye mithai hai bacchon ke liye nahin,matalab sadharan lagane vali baat men bhi vyangya
    rajeshvidrohi

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