शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता – लालची बिल्ली

cat

(१)

बिल्ली होती है होशियार ।

चूहों को खाती है मार ।।

दांव लगाके करे शिकार ।

माने न जल्दी ये हार ।।

(२)

चोरी-चोरी उडाये माल ।

बच्चों का भी नहीं खयाल ।।

लालच होता बड़ा बिकार ।

फंस जाते इसमें होशियार ।।

(३)

लोटे में था थोडा क्षीर ।

देख के आया मुंह में नीर ।।

फ़ौरन डाला अपना मुख ।

सुख के बदले पाया दुःख ।।

(४)

कांपी उसकी सकल शरीर ।

मुँख खीचे तो आये पीर ।।

जंह-तंह पटके आये चोट ।

ब्याकुल बिल्ली जाती लोट ।।

(५)

नटखट बच्चे शोर मचाएं ।

हो-हो करके खुशी मनाएं ।।

गन्दी आदत में यह आये ।

जो करता गन्दा कहलाये ।।

(६)

बिल्ली भागे राह न पाए ।

करती क्या जब नहीं दिखाए ।।

नहीं बचेगी इसकी जान ।

ऐसा तब मन में अनुमान ।।

(७)

कम्बल लेकर दो जन आये ।

बिल्ली ऊपर तुरत बहाए ।।

फिर पकड़ा उसको तत्काल ।

अरु लोटे को लिया निकाल ।।

(८)

बिल्ली भागी हुयी निहाल ।

टल गया सिरपे आया काल ।।

लालच का कुछ ऐसा जाल।

फंसते निर्धन मालामाल ।।

अंत में होता है उर साल ।

बुरी बला मत इसको पाल ।।

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एस. के. पाण्डेय

समशापुर (उ. प्र.) ।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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