विजय वर्मा की ग़ज़ल – क्या करें

क्या करें?
साथ छोड़ गयी अपनी ही छाया ,क्या करें,
बेवक्त उनकी याद ने सताया, क्या करें  !

 
दिल की वादियों से जिसे रुखसत कर चुका था
जिक्र बारहां उसका ही उठाया,क्या करें!

 
चला पै-दर-पै ,सर पे मेहरे-दरख्शां
ना मिला एक कतरा भी साया,क्या करें!

 
सभी कह रहें है कि सूरत है अच्छी
सीरत का ख्याल ना आया ,क्या करें!

 
सुलह तो थी कि आँखें अश्क-बार ना होगी
कमबख्त हंसते-हंसते छलकाया,क्या करें!

 
इस सावन मेरे आशियाने सिर्फ बरसे अंगारे
मेरे हिस्से फुहार ना आया ,क्या करें!
--

बारहां=बार-बार
पै-दर-पै=लगातार
मेहरे-दरख्शां =चमकता सूरज

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

-----------

-----------

3 टिप्पणियाँ "विजय वर्मा की ग़ज़ल – क्या करें"

  1. विजय जी बहुत कुछ कह जाता है ये मिसरा:-

    साथ छोड़ गयी अपनी ही छाया ,क्या करें,

    बधाई क़ुबूल करें|

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुलह तो थी आंखें अश्क बार ना होगीं'
    कमबख्त हंसते हंसते छलकाया क्या करें। ख़ूबसूरत शे'र। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. चतुर्वेदी साहब और दानी साहब
    प्रतिक्रिया देने के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.