गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

दीनदयाल शर्मा की रचना - सबके मन में बैठे रावण को कौन जलाए

रावण

rawan

सालो-साल दशहरा आता
पुतला झट बन जाए।

बँधा हुआ रस्सी से रावण
खड़ा-खड़ा मुस्काए।
चाहे हो तो करे ख़ात्मा,
राम कहाँ से आए।

रूप राम का धरकर कोई,
अग्निबाण चलाए।
धू-धू करके राख हो गया,
नकली रावण हाय!

मिलकर खुशियाँ बाँटें सारे,
नाचें और नचाएँ।
अपने भीतर नहीं झाँकते,
खुद को राम कहाए।

सबके मन में बैठा रावण,
इसको कौन मिटाए।

Deendayal Sharma. 1 JPG (Custom)

-दीनदयाल शर्मा

7 blogger-facebook:

  1. I have a lot of respect for you and your writing. You write very well.I want to write in your newspaper.Please reply me the way

    thanks
    manajarishukla@gmail.com

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  2. बहुत खूबसूरती से कही है रावण की व्यथा कथा. अब जरा मेरे रावण का भी दुःख बाँट ले...

    "अब से रावण नहीं मरेगा"


    कहते हैं, रावण व्यथित नहीं होता

    मैं, कैकसी-विश्वश्रवा पुत्र

    दसग्रीव

    सूर्पनखा सहोदर, मंदोदरी पति, लंकेश

    अपराधी हूँ ,

    हाँ! मैं अपराधी हूँ...

    पर मात्र एक

    अक्षम्य अपराध

    सीता हरण का

    पर यहाँ तो होता है

    प्रतिदिन

    न जाने कितनी ही सीताओं का अपहरण

    फिर दुस्श्शासन बन चीर हरण,

    करती हैं वो, मरण का

    रोज ही वरण

    एक अपराध का दंड मृत्यु

    सौ अपराध का दंड मृत्यु

    फिर क्यों ???

    मैं एक अपराध के लिए

    युग युगान्तरों तक जलूं

    मैं, दशकंधर सबने देखा है

    तुम सब कितने सर, किसने देखा है

    मैं, लंकेश, लंकापति, दशानन

    व्यथित हूँ !!!

    मैं रावण हूँ

    पर रामायण बदलने न दूंगा

    अब मैं रावणों के हांथों नही मरूँगा

    ये प्रण लेता हूँ

    अब न मरुँगा,

    अब न जलूँगा

    जाओ ढूंढ़ लाओ,

    मात्र एक राम मेरे लिए


    तब तक मैं यहीं प्रतीक्षारत हूँ

    मैं, कैकसी-विश्वश्रवा पुत्र

    दसग्रीव

    सूर्पनखा सहोदर, मंदोदरी पति, लंकेश

    अपराधी हूँ ,

    पर सिर्फ राम का.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बस यही कोई नही कर पाता।

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (15/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. दशहरा के अवसर पर आपकी ये रचना सामयिक और अच्छी है.एक रावण को मारने के लिए राम को जन्म लेना पड़ा था. अब तो रावण ही रावण नज़र आते हैं.राम का अता-पता नहीं. मेरा लिखा हुआ एक दोहा भी हाज़िर है:-
    राम तुम्हारी भी रही, लीला अपरम्पार.
    एक दशानन मर गया ,पैदा हुए हज़ार.

    कुँवर कुसुमेश
    visit:kunwarkusumesh.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. Suresh Chand, CBI Anti-Corruption Branch, New Delhi5:19 pm

    Shri Deen Dayal Sharma ki rachna, "Sabke Man mein baithe raawan ko kaun jalaye" is very best poem, in the present time. The poet is written his poem very frankly. At this time, the man is very shelfish. He does not know value of mankind. The man is very greedy. So, raawan is existed today. Thank you for this poem.

    उत्तर देंहटाएं
  6. स्थितियां इसी लिए तो बदल नहीं पा रही कि मन में बैठे रावण मर नहीं रहे ...सिर्फ कागज़ी रावनों को मारने से क्या हासिल ...!

    उत्तर देंहटाएं
  7. Tippnidataon aur rachanakar blog ke sanchalak sri Ravi ratlami ji ka hridey se abhaar...

    उत्तर देंहटाएं

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