शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

विजय शर्मा का आलेख – लिखना पागलपन है

लेखन से जुड़ी कई बातें हैं. लेखक क्यों लिखता है ? किसके लिए लिखता है ? कैसे लिखता है ? कब लिखता है ? आदि, आदि. कोई क्यों लिखता है ? इस प्रश्न के उत्तर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं.

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लिखने के उद्देश्यों को बहुत पहले आचार्य मम्मट ने बता दिया है. उन्होंने कहा है,

‘काव्यं यशसे, अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये

सद्यःपरनिवृतये कांतासम्मितयोपदेशयुजे’.

साहित्य का उद्देश्य यश और अर्थ प्राप्ति, व्यवहार कुशलता, अशुभ का नाश, तत्काल आनन्द प्राप्ति और पत्नी सदृश्य उपदेश देना है. यह बताता है कि इनमें से कुछ उद्देश्य साहित्यकार के अपने लिए हैं, तो कुछ दूसरों के लिए हैं.

लेखन से जुड़ी कई बातें हैं. लेखक क्यों लिखता है ? किसके लिए लिखता है ? कैसे लिखता है ? कब लिखता है ? आदि, आदि. कोई क्यों लिखता है ? इस प्रश्न के उत्तर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं.

‘माई नेम इस रेड’, ‘द न्यू लाइफ’, ‘द ब्लैक बुक, ‘द ह्वाइट कैसल’ आदि उपन्यासों के रचयिता ओरहान पामुक ने इस प्रश्न के जितने उत्तर दिए हैं, जितने कारण गिनाए हैं, उतने शायद ही किसी लेखक ने बताएँ हों. अपने नोबेल भाषण (2006) में वे बताते हैं कि वे क्यों लिखते हैं. वे लिखते हैं क्योंकि उनके अन्दर लिखने की एक स्वाभाविक जरूरत है. वे लिखते हैं क्योंकि वे अन्य लोगों की भाँति कोई और सामान्य कार्य नहीं कर सकते हैं. क्योंकि वे वैसी पुस्तक पढ़ना चाहते हैं जैसी वे लिखते हैं. क्योंकि वे सबसे गुस्सा हैं, सबके ऊ पर क्रोधित हैं. उन्हें सारे दिन कमरे में बैठ कर लिखना अच्छा लगता है. क्योंकि वे वास्तविक जीवन को तभी ग्रहण कर सकते हैं जब वे उसे बदल दें. वे चाहते हैं कि दूसरे सारे लोग, सारी दुनिया जान ले कि वे लोग इस्ताम्बूल में रहते हैं, तुर्की में लोग कैसा जीवन जीते थे और कैसा जीवन आज भी जीते हैं. पामुक लिखते हैं क्योंकि उन्हें पेपर, पेन और स्याही की खुशबू अच्छी लगती है. लिखना उनके लिए एक आदत है, एक पैशन है. क्योंकि लिखना यश और रूचि लाता है. वे अकेले होने के लिए लिखते हैं. क्योंकि वे जानना चाहते हैं कि वे सब लोगों से इतने ज्यादा क्यों क्रोधित हैं ? सब लोगों पर क्रोधित क्यों हैं ? वे लिखना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने जिस उपन्यास, कहानी, लेख को प्रारम्भ किया है उसे समाप्त करना चाहते हैं. क्योंकि सब लोग उनसे लिखने की आशा करते हैं. क्योंकि उन्हें भुला दिए जाने का डर है. उन्हें लाइब्रेरी की अमरता का बचकाना विश्वास है. जैसे उनकी किताबें लाइब्रेरी की सेल्फ पर रखी जाती हैं उन्हें अपनी अमरता का विश्वास है. क्योंकि लिखने में जीवन की समस्त सुन्दरता और समृद्घि को शब्दों में ढ़ालना अद्भुत और उत्तेजक है. पामुक कहानी कहने के लिए नहीं लिखते हैं. वे कहानी बनाने (कम्पोज करने) के लिए लिखते हैं. वे पलायन के लिए लिखते हैं. उस स्थान में जाने के लिए लिखते हैं, जो स्वप्न की तरह है, जहाँ जाया नहीं जा सकता है लेकिन वे जाना चाहते हैं. उन्हें वहाँ अवश्य जाना है. लिखते हैं क्योंकि वे कभी खुश नहीं हैं. लिखना खुशी देता है इसलिए वे लिखते हैं. पामुक में लिखने की भूख है इसलिए वे लिखते हैं.

अपने लिखने का कारण बासविक सिंगर भी बताते हैं. परंतु वे बताते हैं कि वे बच्चों के लिए क्यों लिखते हैं. सिंगर ने वयस्कों के लिए खूब लिखा. साथ ही बच्चों के लिए भी खूब कहानियाँ लिखीं (‘ए डे ऑफ प्लेज़र’, ‘स्टोरीज़ फोर द चिल्ड्रन’, ‘स्टोरीज़ ऑफ अ ब्यॉय ग्रोइंग अप इन वार्सा’, ‘ह्वाई नोआ चोज़ द डव’). बच्चों के लिए अपने लिखने के हजारों कारण सिंगर के पास हैं. दस कारण वे गिनाते भी हैं. बच्चे किताबें पढ़ते हैं, वे उनके रिव्यू नहीं करते हैं और न ही वे आलोचकों को घास डालते हैं. बच्चे अपनी पहचान के लिए नहीं पढ़ते हैं. न ही अपने अपराध बोध से छुटकारा पाने के लिए या अपने विद्रोह की प्यास बुझाने के लिए पढ़ते हैं. अजनबीपन से छुटकारा पाने के लिए बच्चे नहीं पढ़ते हैं. उनके लिए मनोविज्ञान का भी महत्व नहीं होता है और समाजशास्त्र से भी वे स्वयं को अलग रखते हैं. वे काफ्का या फिंगैंस वेक को समझने का प्रयास नहीं करते हैं. बच्चे अभी भी ईश्वर, परिवार, दूतों, शैतानों, चुडैलों, गोबलिंग्स, तर्क, स्पष्ठता, विरामचिह्न और तमाम बीती बातों में विश्वास करते हैं. वे मजेदार कहानियाँ पसन्द करते हैं. कमेंटरी, गाइड्स या फुट नोट्स नहीं और जब भी कोई किताब उबाऊ होती है वे बिना शर्म और झिझक या बिना डर के जम्हाई लेते हैं. दिखावा नहीं करते हैं. साथ ही वे अपने प्रिय लेखकों से उम्मीद नहीं करते हैं कि वे दुनिया का उद्घार करेंगे. वे युवा हैं और जानते हैं कि यह लेखक के बूते में नहीं है. ऐसे बचकाने भ्रम केवल वयस्क पालते हैं. इन्ही कारणों से सिंगर बच्चों के लिए लिखना पसन्द करते हैं.

एक पत्रिका तो ‘लेखक क्यों और कैसे लिखता है’ इस विषय पर एक स्तम्भ ही चलाती है. ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ पत्रिका में करीब एक दशक तक ‘लेखन पर लेखक’ विषय पर एक कॉलम चला. इसमें पेशेवर लेखकों ने अपनी-अपनी लेखन प्रक्रिया का विश्लेषण किया है. इसी कॉलम को अब उन लोगों ने दो खंडों में (2001 और 2004 में) पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है. एक अन्य पत्रिका ने 28 देशों के करीब चार सौ रचनाकारों से प्रश्न पूछा, वे क्यों लिखते हैं ? और प्राप्त उत्तरों को किताब के रूप में प्रकाशित किया. अक्सर लेखक कहते हैं कि वे ‘नहीं लिखना’ नहीं कर सकते हैं. या फिर कहते हैं कि ‘मैं बस यही हूँ, एक लेखक’.

‘द ग्रास इस सिंगिंग’, ‘फोर गेटेड सिटी’, ‘चिल्ड्रेन ऑफ वायलेंस’, ‘अ प्रोपर मैरेज’ आदि चालीस से ज्यादा किताबें लिखने वाली और 2007 की साहित्य की नोबेल पुरस्कृत डोरिस लेसिंग जब लिख नहीं रही होती हैं तब बहुत दुखी हो जाती हैं. लिखना उनकी जरूरत है. वे पागलपन से बचे रहने के लिए लिखना आवश्यक मानती हैं. साथ ही यह भी मानती हैं कि लिखना पागलपन है. जिस दिन वे नहीं लिखती हैं उन्हें लगता है कि वह दिन उन्होंने गँवा दिया है. बेकार कर दिया है. उनके अनुसार लेखक एक विचार के संग प्यार में पड़ कर बह जाता है. लिखना उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रसन्नता है. वे लिखती जाती हैं. क्योंकि यह उनके लिए एक तरह की विवशता है. एक तरह की मजबूरी है, जिसे केवल एक लेखक ही समझ सकता है.

नात्सी यातना गृह से जीवित बच निकले, 2002 के नोबेल पुरस्कार विजेता इमरे कर्टीज बताते हैं कि उनके सामने जब यह प्रश्न आया तो उनके लिए कोई विकल्प था ही नहीं. जैसे गुंटर ग्रास कहते हैं कि उनके लिए कोई विकल्प नहीं था. उसी तरह इमरे के लिए भी कोई विकल्प न था. उन्हें होलोकास्ट पर लिखना ही था. इस साल (2009) की नोबेल पुरस्कृत जर्मन साहित्यकार हेरटा मूलर कहती हैं कि लिखना उनके लिए अत्यावश्यक है. अस्तित्व की तरह है. हेरटा के पास लिखने के लिए एक ही विषय है तानाशाही. तानाशाही के विरुद्घ लिखना. उनके पास कोई और विकल्प है ही नहीं. उन्होंने तानाशाही की बखिया उधेडने की कमर कस कर रखी है. उनके लिखने का यही उद्देश्य है. असल में उन्होंने यह विषय चुना नहीं है, इस विषय ने ही उन्हें चुन लिया है.

गैब्रियल गार्शा मार्केस जीवित रहने के लिए लिखते हैं और लिखने के लिए जीवित रहते हैं. विलियम फॉक्नर स्पष्ठ कहते हैं कि वे जीविका के लिए लिखते हैं. उन्होंने लेखन से खूब कमाया. उनके पास एक निजी हवाई जहाज था. इसी तरह हेमिंग्वे के पास एक नौका (याट) थी. मगर उनकी तरह बहुत कम लेखक भाग्यशाली होते हैं क्योंकि लिख कर आजीविका कमाना आसान नहीं है. दॉस्तवस्की गरीबी में गुजरे. 95 उपन्यास (‘ह्यूमन कॉमेडी’ शृंखला) लिख कर 51 साल की आयु में रचनात्मक बवंडर बाल्ज़ाक मरते समय कर्ज में डूबे हुए थे. अगर धन कमाना ही लेखक का उद्देश्य होता तो स्टीफन किंग को कुछ नहीं करना पड़ता. वे अपनी पहली किताब के बाद आराम से कहीं मौज मस्ती कर रहे होते. उनकी किताबें लाखों की संख्या में बिकती हैं. वे पाठकों में इतने लोकप्रिय हैं कि कुछ आलोचक कहने लगे यदि वे अपने धुलने वाले कपड़ों (लाउन्ड्री) की सूचि प्रकाशित कर दें तो उसकी भी लाखों प्रतियाँ बिक जाएँगी. मगर ऐसा है नहीं. पहली किताब के बाद उन्होंने लिखना बन्द नहीं किया. लिखना बन्द नहीं कर सके. वे अपनी हर अगली किताब और ज्यादा मेहनत और अधिक लगन से लिखने लगे हैं. बिना लिखे वे रह नहीं सकते हैं.

आप क्या लिखते हैं उस पर भी निर्भर करता है कि आप क्यों लिखते हैं. पत्रकार लिखता है क्योंकि उसे अखबार में रपट भेजनी होती है. शिक्षक लिखता है (चॉक बोर्ड पर) क्योंकि उसे छात्रों को समझाना होता है. मगर हम यहाँ बात कर रहे हैं सृजनात्मक लेखन की. सृजनात्मक लेखन में भी मात्र गद्य की बात हो रही है. इस आलेख में इस विषय गद्य, उसमें भी खासतौर पर उपन्यास और कहानी लेखकों के विचारों को समेटने का प्रयास किया गया है. अगर आप बुद्घिमान हैं तब तो आपको केवल उपन्यास लिखना चाहिए. हेनरी जेम्स कहते हैं कि उपन्यास लिखना बुद्घिमान आदमी के करने लायक एकमात्र काम है.

लिखना पागलपन है. जिस पर यह सवार हो जाता है वह लिखने को लाचार होता है. प्रतिदिन सुबह आप एक सादे कागज (आजकल मॉनीटर की सादी स्क्रीन) के सामने बैठते हैं. कभी पाँच मिनट, कभी घंटों और फिर कलम (की बोर्ड) चल पड़ता है. शब्द कहाँ से आते हैं ? बताना कठिन है. क्या कल आएँगे ? कहा नहीं जा सकता. पर चारा क्या है ? 25 जून 1903 को मोतीहारी (बिहार) में जन्में, ‘बर्मीज डेज’, ‘एनीमल फॉर्म’ तथा ‘1984’ जैसी प्रसिद्घ पुस्तकों के लेखक जॉर्ज ऑरवेल ‘ह्वाई आई राइट’ में कहते हैं कि उन्हें बचपन से ही, शायद पाँच या छः साल की उम्र से ही ज्ञात था कि जब वे बड़े होंगे उन्हें लेखक बनना है. 17 से 24 साल की उम्र तक उन्होंने इस विचार को त्यागने का बहुत प्रयास किया. उन्हें इस बात का ज्ञान था कि ऐसा करके वे अपनी मूल प्रकृति के साथ अन्याय कर रहे हैं. उस पर अत्याचार कर रहे हैं. देर सबेर उन्हें लेखन ही करना है. उन्हें किताबें लिखनी ही हैं. 1946 में अपने लिखे इस आलेख में वे बताते हैं कि वे क्यों लिखना चाहते हैं. साथ ही बताते हैं कि क्या लिखना चाहते हैं. जॉर्ज ऑरवेल को तो यहाँ तक मालूम है कि हर किताब असफल है फिर भी वे किताब लिखने की हिम्मत करते हैं.

समाजवादी मूल्यों की वकालत करने वाले ऑरवेल का मानना है कि रचनाकार का काल उसके लेखन का उद्देश्य निश्चित करता है. लेखन की विषय वस्तु लेखक जिस काल में रहता है उससे निश्चित होती है. परंतु लिखना शुरु करने से पहले लेखक भावात्मक नजरिया अपना लेता है और इस नजरिए से वह कभी पूरी तौर पर छुटकारा नहीं पाता है. यह उसका कार्य है कि वह अपने स्वभाव, अपने स्वर को अनुशासित करे. किसी विकृत मूड के कारण किसी बचकाने स्तर पर चिपका न रह जाए. लेकिन इसके साथ ही यदि वह अपने प्रारम्भिक प्रभावों से पूरी तौर पर बच निकलता है तो यह समझना चाहिए कि उसने लिखने के अपने आवेग (मानसिक प्रेरणा, स्पन्दन) को मार डाला है. पामुक की बनिस्बत ऑरवेल लिखने के काफी कम उद्देश्य गिनाते हैं. उन्हें लगता है कि जीविका कमाने की जरूरत को दरकिनार करते हुए लिखने के, खासकर गद्य लिखने के चार उद्देश्य होते हैं. ये हैं :

सीधे-सीधे अहं, अहंकार. चालाक दीखने की चाहत. इसकी इच्छा कि चर्चा हो. मृत्यु के बाद भी याद रखा जाए, जिन्होंने आपको बचपन में परे हटा दिया था उन वयस्कों को पीठ दिखाना, आदि, आदि. यह कहना कि अहं उद्देश्य नहीं है, बकवास है और बहुत बड़ी बकवास है. लेखक इस विशेषता को वैज्ञानिक, कलाकार, राजनैतिक, वकील, सैनिक तथा सफल व्यापारी के साथ साझा करता है. संक्षेप में कह सकते हैं कि मानवता की मलाईदार परत से साझा करता है. जनसामान्य, अधिकाँश जनता असल में स्वार्थी नहीं है. तीस साल की उम्र के बाद लोग खुद को एक व्यक्ति के रूप में सोचना-समझना बिलकुल छोड़ देते हैं और मुख्य रूप से दूसरों के लिए जीते हैं. या काम के बोझ से दब जाते हैं. मगर थोड़े से प्रतिभा सम्पन्न मेधावी लोग भी हैं. दृढ़ इच्छा शक्ति वाले. जो अंत तक अपना जीवन जीने का पक्का इरादा रखते हैं. लेखक इसी श्रेणी का प्राणी है. ऑरवेल कहते हैं कि गम्भीर लेखक पैसे में कम रूचि रखते हैं मगर पत्रकार से ज्यादा आत्मकेंद्रित तथा दम्भी होते हैं.

दूसरा कारण वे एस्थेटिक उत्साह बताते हैं. बाह्य और आंतरिक संसार में सौंदर्य देखना. शब्द और उसकी संरचना में सौंदर्य निहारना. एक ध्वनि की अपेक्षा दूसरी ध्वनि में आनन्द लेना. अच्छे गद्य की सुनिश्चितता या एक अच्छी कहानी की लयात्मकता में खुशी पाना. एक अनुभव जो कीमती लगे उसे दूसरों से साझा करना ताकि वे इससे वंचित न रह जाएँ. बहुत से लेखकों में एस्थेटिक उद्देश्य बहुत झीना होता है. लेकिन पैम्फ्लेट लिखने वाले, या पाठ्य पुस्तक लिखने वाले के भी अपनी पसन्द के, अपने प्यारे शब्द और कथन होते हैं. जो उसे सुहाते हैं. उसे अपील करते हैं. इस अपील का कोई उपयोगी कारण नहीं होता है. उसे कोई खास टोपोग्राफी भाती है, मार्जिन की चौड़ाई आदि. वे कहते हैं कि रेलवे गाइड के अलावा सब तरह की किताबों में एस्थेटिक प्रयोजन मिलते हैं. सोलह साल की उम्र में अचानक ऑरवेल ने शब्दों से मिलने वाली खुशी का अंवेषण किया. शब्दों से जुड़ी ध्वनि का आनन्द वे लेने लगे. उन्हें लयात्मक पंक्तियाँ अच्छी लगती. वे ‘पैराडाइज लॉस्ट’ की पंक्ति का उदाहरण देते हैं. इसमें आए शब्दों के संगीत ने उनके शरीर में झुरझुरी भर दी थी. ‘ही’ शब्द की वर्तनी में एक ‘इर्’ के स्थान पर दो ‘ई’ का प्रयोग उन्हें लुभा गया था.

तीसरा कारण वे इतिहास आवेग से संबंधित मानते हैं. चीजें जैसी हैं उन्हें वैसी ही देखने की इच्छा. सत्य बातों को जानने और सम्भाल कर रखने की इच्छा ताकि बाद के लोग इन्हें प्रयोग कर सकें. ऑरवेल चौथा और अंतिम कारण राजनीतिक उद्देश्य मानते हैं. वे ‘राजनीति’ शब्द का विस्तृत अर्थ में प्रयोग करते हैं. शब्दों को किसी खास इच्छित दिशा में ले जाना. लोगों को किस तरह के समाज में रहना चाहिए. इस दिशा में उन्हें कैसे प्रयास करने चाहिए. इसके लिए उनके विचारों को बदलना. लोगों को अपने विचारों से परिचित करा कर उन्हें उनसे सहमत कराना लेखक का उद्देश्य होता है. वे दावे के साथ कहते हैं कि कोई भी किताब असल में राजनैतिक पूर्वग्रह से मुक्त नहीं होती है. कला को राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं यह विचार ही अपने आप में राजनैतिक नजरिया है. नोबेल पुरस्कृत अमेरिकी लेखिका टोनी मॉरीसन विश्वास करती हैं कि सच्चा कलाकार कभी भी अराजनैतिक नहीं होता है. क्योंकि ‘एक कलाकार यही होता है — एक राजनैतिक.’

ये भिन्न आवेश एक दूसरे से लड़ते रहते हैं. ये भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में जलते-बुझते रहते हैं. एक ही व्यक्ति में अलग-अलग समय में भिन्न होते हैं. जब ऑरवेल ने वयस्कता प्राप्त की उनके लिए प्रथम तीन उद्देश्य चौथे के ऊ पर हावी रहे. आगे वे कहते हैं कि शांत समय में उन्होंने मात्र वर्णनात्मक अथवा सुसज्जित अलंकृत किताबें लिखी होतीं और शायद वे अपने राजनीतिक स्वामी भक्ति से अपरिचित ही रह जाते. पहले पाँच साल वे भारतीय साम्राज्यवादी पुलिस में थे और बर्मा में पोस्टेड थे. उसके बाद काफी समय तक उन्हें गरीबी और एक तरह की असफलता की स्थिति में रहना पड़ा. इस अनुभव ने उनके भीतर अधिकारियों, सत्ता के प्रति स्वाभाविक रूप से नफरत भर दी. पहली बार उन्हें भान हुआ कि मजदूर वर्ग का भी अस्तित्व है और बर्मा के काम ने उन्हें साम्राज्यवाद की प्रकृति की कुछ समझ दी. उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘बर्मीज डेज’ तीस साल की उम्र में लिखा.

स्पैनिश युद्घ और 1936-37 की घटनाओं ने पलड़ा पलट दिया और ऑरवेल को स्पष्ठ रूप से पता चला कि वे किधर खड़े हैं. प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 1936 से उन्होंने प्रत्येक पंक्ति तानाशाही के खिलाफ और प्रजातंत्रिक समाजवाद के पक्ष में लिखी है. जैसा उन्होंने समझा, वैसा उन्होंने लिखा. उनका प्रारम्भिक बिन्दु सदैव पक्षपात की भावना, अन्याय रहा है. वे लिखते रहे

क्योंकि वे किसी झूठ को उजागर करना चाहते थे. किसी तथ्य के बारे में लिखते जिसकी ओर वे लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते. उनकी पहली चिंता होती कि उनकी बात की सुनवाई हो. लेकिन यदि यह एक कलात्मक अनुभव न होता तो वे कभी कोई किताब या पत्रिका के लिए लेख न लिखते. ऑरवेल ऐसा मानते हैं कि जो उनकी स्वाभाविक प्रवृतियाँ है और इस जमाने की जो जरूरतें हैं दोनों को समायोजित करते हुए चलना उनका काम है. ‘एनीमल फार्म’ पहली किताब थी जिसमें उन्होंने पूरी सचेतनता के साथ यह प्रयास किया है. राजनैतिक उद्देश्यों और कलात्मक उद्देश्य को घुलाया-मिलाया. दोनों को मिला कर सम्पूर्ण बनाया.

पाठकों के लोकप्रिय लेखक डीन कुंट आठ साल की उम्र से लिखने लगे. इतना ही नहीं वे अपनी कहानियों को बेचने का प्रयास भी इसी उम्र से करने लगे. उन्हें लगता है कि जो चीज मुफ्त में मिलती है लोग उसकी कद्र नहीं करते हैं. सो वे कहानियाँ लिखते उन्हें अलग-अलग स्टेपल करते, फिर बिजली के काम में लगने वाले टेप से कहानियों की जिल्द को सफाई और मजबूती से बाँधते. कवर को खूब रंगारंग सजाते और अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को बेचने निकल पड़ते. शुक्र है कि उनके आसपास का कोई और बच्चा उस समय यह काम नहीं कर रहा था अतः उन्हें किसी प्रतिस्पर्द्घा का सामना नहीं करना था. शुरु में लोगों ने उनकी कहानियाँ खरीदी पर जब वे तेजी से लिख कर और सजा कर रोज-रोज बेचने पहुँचने लगे तो लोगों ने खरीदना बन्द कर दिया. वे इसे वयस्कों का षडयंत्र मानते हैं. उनके मन में उस पैसे को खर्च करने या इस काम से खूब कमा कर धनी बनने का विचार न था. मगर वे अपने आसपास के बच्चों से भिन्न कार्य कर रहे थे. सारे बच्चे परम्परागत क्रियाओं में व्यस्त थे. फुटबॉल, बॉस्केट बॉल खेल कर चरित्र निर्माण कर रहे थे. तितलियों के पंख नोच रहे थे. अपने से छोटे और कमजोर बच्चों को सता रहे थे. सामान्य घरेलू प्रयोग में आने वाली वस्तुओं से विस्फोटक बना रहे थे. कुंट कहानियाँ लिख रहे थे उन्हें बेचने का प्रयास कर रहे थे. उन्होंने करीब दो डॉलर कमाए. जब लोगों ने उनसे कहानियाँ खरीदनी बन्द कर दी तब भी वे लिखने में जुटे रहे और लोगों को मुफ्त में पढ़ने के लिए देते रहे.

बाद में जब वे कुछ बड़े हुए तो उनकी कहानियाँ न्यूयॉर्क सिटी के प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित होने लगीं. ये प्रकाशक न तो कहानियों को अलग-अलग स्टेपल करते, न ही उसे एक साथ टेप से बाँधते. क्योंकि वे प्रत्येक कहानी की कई प्रतियाँ प्रकाशित करते थे. प्रकाशक उन्हें रकम भी देने लगे. प्रारम्भ में यह रकम इतनी न थी कि वे मात्र लेखन पर गुजारा कर पाते. उन्हें विश्वास न था कि केवल लिख कर वे समाज में सम्मानपूर्वक रह सकते हैं. इसके साथ वे यह भी जानते थे कि पेट पालने के लिए लेखन के साथ-साथ कोई धंधा करना है तो वह आकर्षक होना चाहिए. आकर्षक इसलिए होना चाहिए क्योंकि जब लेखक की जीवनी लिखी जाए तो वह रंगीन हो. यदि लेखक की जीवनी को आकर्षक बनाना है तो बम डिस्पोजल अथवा हवाईजहाज अपहरण का काम करना चाहिए. ये काम उन्हें खासे उचित लगते. लेकिन वे अपनी पत्नी के शुक्रगुजार हैं जिसकी आ मद नी इतनी थी कि वे इन दोनों कामों से बच कर लिखना करते रह सके. नहीं तो कहीं जेल में सड़ रहे होते या फिर बेपहचान माँस के लोथड़ों के ढ़ेर बने होते.

धीरे-धीरे उनकी किताबों ने शोहरत हासिल की और धन बरसने लगा. जल्दी ही उनके पास चार किताबों को लिखने का प्रस्ताव आया जिसकी अग्रिम राशि जहाज अपहरण से कम न थी (वैसे आजकल फिरौती की रकम काफी बढ़ गई है). जब अन्य लोगों और लेखकों को यह प्रस्ताव ज्ञात हुआ तो वे उनसे कहने लगे कि वाह बेटा ! तुम्हारी तो चाँदी है. इन किताबों के लिखने के बाद तुम्हें कुछ और लिखने की जरूरत नहीं होगी. मजे करोगे. कुंट का विचार था कि वे इन चारों किताबों को बयालिस साल की उम्र में लिख कर पूरा कर लेंगे. लोगों की बात सुन कर वे सोचने लगे तब फिर वे बाकी उम्र क्या करेंगे ? रकम खूब मिलनी थी. क्या वे भी जूआ, घुड़दौड़ और शराब में डूब जाएँगे ? जैसा कि लिख नहीं रहे होते धनी-मानी लोग अक्सर करते हैं ? मगर इन किताबों को पूरा करने के बाद वे लिखना न रोक सके. यह पैसा नहीं था जो उन्हें लिखने को प्रेरित करता है. वे कहते हैं यह लिखने की प्रक्रिया का प्रेम है जो उन्हें निरंतर लिखने के लिए उकसाता रहता है. कहानी कहने की प्रक्रिया, जीते-जागते, साँस लेते चरित्र निर्माण, उचित शब्दों को पाने का संघर्ष, सही शब्द पा लेने की प्रसन्नता, शब्दों से संगीत बनाने की खुशी, उन्हें लिखते रहने के लिए प्रेरित करती है.

कुंट कहते हैं कि इस प्रसन्नता के साथ लेखन एक तरह की पीड़ा है. यह प्रसव पीड़ा है. सृजन का कष्ठ है जो अंततः असीम संतोष और खुशी देता है जिसकी तुलना अन्य किसी खुशी से नहीं की जा सकती है. कुंट ने प्रारम्भ में थोड़े समय के लिए कई काम किए, किसी पेशे में इतनी मेहनत उन्होंने नहीं की. लेखन की मेहनत के विषय में वे बताते हैं कि कई बार दस-दस घंटे कम्प्यूटर के सामने बैठना पड़ता है. एक पन्ने को अंतिम रूप देने के लिए अक्सर दर्जनों बार पुनर्लेखन करना पड़ता है. जब तक मनमाफिक वाक्य नहीं रच जाता है, उसके लिए उचित शब्द नहीं मिल जाते हैं, चैन नहीं पड़ता है. इतनी परेशानियों के बावजूद कुंट को लिखना अच्छा लगता है. ऑरवेल को लगता है कि किताब लिखना एक भयंकर, थकाने वाला संघर्ष है. मानो किसी दुखदायी बीमारी का दौर हो. कोई इस तरह का काम कभी नहीं करेगा जब तक कि कोई राक्षस आपके पीछे न पड़ जाए. राक्षस जिसे न तो आप रोक सकते हैं न ही समझ सकते हैं. यह सच है कि कोई तब तक पठन योग्य नहीं लिख सकता है जब तक कि अपने व्यक्तित्व का उन्मूलन करने के लिए संघर्ष नहीं करता है उसे मिटाने का प्रयास नहीं करता है.

मनःशास्त्री एब्राहम मेस्लॉव ने मानव की आवश्यकताओं का गहन अध्ययन कर उसे विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया है. वे इसे पिरामिड के रूप में प्रस्तुत करते हैं. प्रारम्भ में वे केवल पाँच मूल आवश्यकताओं की बात कर रहे थे — भौतिक आवश्यकताएँ मतलब भूख, प्यास की आवश्यकताएँ, सुरक्षा आवश्यकताएँ, अपनापन (बिलॉन्गिनेस) की आवश्यकताएँ, एस्टीम मतलब आदर, सम्मान की आवश्यकताएँ और आत्म-साक्षात्कार (सेल्फ एक्चुलाइज़ेशन) की आवश्यकता. परंतु बाद में उन्होंने अपने अध्ययन में तीन अन्य उच्च आवश्यकताओं को जोड़ा. एस्थेटिक आवश्यकता जैसे सौंदर्य, लयात्मकता, समन्वय (हार्मनी). संज्ञान (कॉग्नेटिव) आवश्यकता जैसे जीवन का अर्थ, ज्ञान और बोध. अंतिम उच्च आवश्यकता वे सीमित स्व के पार जाने की जरूरत यानि — सेल्फ ट्रांसेंडेस को मानते हैं. रचनाकार आदर, सम्मान, सौंदर्य, लयात्मकता, समन्वय, जीवन का अर्थ जानने-समझने के लिए तो लिखता ही है परंतु उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता स्व के पार जाने की होती है. अपने स्व के पार जाने के लिए रचनाकार सृजन करता है.

आखीर लेखक लिखता किसके लिए है ? जब इस बात की पड़ताल की जाए तो तुलसी ने स्वांतःसुखाय के लिए लिखा. मगर नात्सी यातना गृह से जीवित बच निकले और 2002 के नोबेल पुरस्कार विजेता इमरे कर्टीज कहते हैं कि यह एक खतरनाक प्रश्न है. इमरे लिखते समय टार्गेट रीडर से वास्ता नहीं रखते हैं. वे विस्तार से बताते हैं कि अगर लेखक सोचने लगे कि वह किसके लिए लिखता है तो इस बात के क्या-क्या खतरे हैं. अगर एक लेखक एक सामाजिक वर्ग या समूह को प्रभावित करना चाहता है, जो करना उसे पसन्द है, तो न केवल उन्हें खुश करने के लिए बल्कि उन्हें प्रभावित करने के लिए उसे सबसे पहले देखना होगा कि उसकी शैली प्रभाव डालने के लिए उपयुक्त है या नहीं. वह अपना समय इसी को देखने में, अपनी स्टाइल को देखने में गुजारने लगेगा. वह पक्के तौर पर कैसे जान सकता है कि उसके पाठक को क्या पसन्द है ? उन्हें वास्तव में क्या अच्छा लगता है ? वह प्रत्येक पाठक से पूछ नहीं सकता है. और अगर वह पूछता भी है तो इससे कोई फायदा नहीं होगा. वह भविष्य के पाठकों से कैसे पूछेगा ? वे आगे कहते हैं कि भविष्य के पाठकों के लिए अपनी छवि पर भरोसा करना होगा. उनको लेकर जो अपेक्षाएँ वह पालता है इसका उस पर क्या प्रभाव होगा जो वह पाना चाहता है.

कैरो के उपन्यासकार नजीब महफूज का विचार है कि लेखक का अंतिम लक्ष्य बौद्घिक और सामान्य दोनों तरह के पाठक को संतुष्ठ करना होना चहिए. इसके साथ वे सावधान भी करते हैं कि मास अपील के लिए सस्ते हथकंड़े नहीं अपनाने चाहिए. हॉरर और पोर्नोग्राफी पर नहीं उतर आना चाहिए. चीन के लेखक गाओ ज़िंग्जियान के अनुसार लेखक पढ़े जाने के लिए लिखता है. वे कहते हैं कि लेखक और पाठक का रिश्ता आध्यात्मिक संवाद का होता है. लेकिन इसके लिए उन्हें आपस में मिलने की आवश्यकता नहीं है. इमरे कर्टीज अपने नोबेल भाषण में पूछते हैं तब फिर लेखक किसके लिए लिखता है ? वे स्वयं ही उत्तर देते हैं कि वह स्वयं के लिए लिखता है. वे कहते हैं कि कम-से-कम मैं तो सीधे इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि मैं स्वयं के लिए लिखता हूँ. वे जब लिखते हैं तो उनके मन में कोई पाठक नहीं होता है. न ही किसी को प्रभावित करने की इच्छा मन में रख कर वे लिखते हैं. किसी खास मकसद को मन में रख भी वे लिखना शुरु नहीं करते हैं. किसी को सम्बोधित करके भी नहीं लिखते हैं. अगर वे कोई लक्ष्य रखते है तो वह होता है हाथ में लिए गए विषय के अनुकूल भाषा. उसके अनुकूल फॉम साधे रखना. इससे ज्यादा कुछ नहीं. हेरटा मूलर ने एक साक्षात्कार में बताया कि वे सदैव खुद के लिए लिखती हैं. चीजों को अपने लिए स्पष्ठ करने के लिए लिखती हैं. आंतरिक रूप से समझने के लिए कि वास्तव में क्या हो रहा है.

यह एक बड़ा मनोरंजक प्रश्न है कि लेखक लिखता कैसे है ? प्रश्न मनोरंजक है मगर उत्तर इतना आसान नहीं है. उत्तर बड़ा जटिल है. इस प्रश्न के उत्तर के कई पक्ष हैं. मोटे तौर पर बाह्य और आंतरिक तो हैं ही. बाह्य आयाम सरल और मनोरंजक है मगर आंतरिक काफी जटिल और अनसुलझा हुआ.

कुछ लोग भोर में लिखते हैं. कुछ को बिजली का बिल बढ़ाना अच्छा लगता है वे रात में लिखते हैं (आजकल दिन में लिखने से भी बिल बढ़ता है घर में प्राकृतिक रौशनी का अभाव होता है और कम्प्यूटर भी बिजली से ही चलता है). विक्टर ह्यूगो जिस कमरे में सोते थे उसी में खड़े होकर लिखते थे. वे लिखते जाते और पन्ने नीचे गिराते जाते ताकि लिखने के लिए जगह बनी रहे. पन्नों पर नम्बर डालते जाते ताकि बाद में परेशानी न हो. क्यूबा के लेखक फेर्नांडो ओर्टिज बिस्तर पर बैठ कर पेपर को आधा मोड़ कर लिखते हैं. इतना लिखते कि अँगूठे पर पेंसिल पकड़ने का निशान पड़ गया. वे रात को शुरु करते और भोर तक लिखते. सोलह-सत्रह घंटे काम करके बाल्ज़ाक शाम आठ बजे सो जाते फिर जब सारी दुनिया सो जाती बारह बजे के बाद उठ कर फिर से लिखने में जुट जाते. छः मोमबत्तयिओं के प्रकाश में बैठ कर लिखने वाला यह लेखक सारे परदे गिरा कर लिखता मानो बाहरी दुनिया से कोई ताल्लुक नहीं रखना है. चिली के एक लेखक का कहना है दिन रात उनके मन में कहानी चलती रहती है और ज्यों ही पक जाती है वे लिखने बैठ जाते हैं. यह चौबीस घंटों में कभी भी हो सकता है, बशर्ते वे घर पर हों. लोग बातें कर रहे हों, गाना बज रहा हो, हल्ला गुल्ला हो रहा हो, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. बल्कि ये सब उन्हें लिखने को प्रेरित करते हैं. जबकि जोर्ज एमाडो आगंतुकों और फोन का उत्तर लिखते समय देते चलते. लिखने के बीच में वे रसोई में भी झाँक आते और खाना बनाने वाले को सलाह भी दे आते भले ही सलाह खाने का स्वाद बिगाड़ दे. क्यूबा के उपन्यासकार लियोनार्डो पाडुरा सुबह-सुबह अपने कम्प्यूटर पर बैठ जाते हैं और दोपहर तक लिखना चलता रहता है.

गुंटर ग्रास के लिखने का तरीका भिन्न है. वे लम्बे पदों को तब तक चुभला कर लुगदी बनाते हैं जब तक कि वह पद साधने योग्य नहीं हो जाता है. जब तक उन्हें सटीक लहज़ा, कम्पन, स्वर, सही उच्चारण नहीं मिल जाता है. तब वे उसे पेन से कागज पर उतारते हैं और वे लिखने पूर्व की सारी कसरत, सारी प्रक्रिया एकांत में करते हैं. वे एकांत में जोर-जोर से खूब बोलते हैं. उन्हें इसमें आनन्द आता है. वे सही ध्वनि, उसके सटीक उच्चारण वाले शब्दों को पकड़ने का प्रयास करते हैं. इस दौरान वे शब्दों के जादू से सम्मोहित होते हैं. जबकि वी. एस. नॉयपॉल यह सारी उठापटक अपनी पत्नी के सामने करते हैं. हाँ वे यह सारी बातें बाचचीत के रूप में नहीं करते हैं. यह सब उनकी ‘लाउड थिंकिंग’ का हिस्सा होता है. पत्नी को यह बात मालूम है. अतः नॉयपॉल की इस पूरी व्यक्तिगत प्रक्रिया में वे मौन रहती हैं. पति के विचारों की स्पष्टता के लिए मात्र ‘डैश बोर्ड’ का कार्य करती हैं.

इस सन्दर्भ में महिला रचनाकार को देखना अलग अनुभव है. कैसे और कब लिखती हैं महिला रचनाकार. कैसे और कब लिखती हैं टोनी मॉरीसन ? जब उनके बच्चे छोटे थे वे एक साथ कई काम कर रहीं थीं. रोज ऑफिस जाना, घर संभालना और लिखना. अब उन्हें लौट कर सोचने पर यह सब थोड़ा पागलपन जैसा लगता है. पर उस समय उन्होंने यह सब एक साथ किया. वे इसे विचित्र नहीं मानती हैं क्योंकि प्रत्येक सामान्य स्त्री यह करती है. कई काम एक साथ. वे भोर में, बहुत सुबह अन्य लोगों के उठने के पहले उठ कर लिखती. रात को वे ज्यादा नहीं लिख पाती. उनकी सृजनात्मकता सुबह अपने चरम पर होती. और वे सप्ताहांत में भी खूब लिखती. इसी तरह जब गर्मी की छुट्टियों में उनके बच्चे उनके अभिभावकों और उनकी बहन के पास ओहिओ चले जाते तब वे भरपूर लिखतीं. उनके अनुसार यदि समय का संयोजन कर लिया जाए तो यह सम्भव है. समय का उपयोग करना सीखना पड़ता है. बहुत सारे काम करते हुए आप लिखने की योजना बना सकते हैं. कई अन्य काम ऐसे होते हैं जिनमें दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती है. इन कामों के साथ आप लिखने की योजना बनाते चल सकते हैं.

वर्जीनिया वुल्फ का कहना है कि यदि स्त्री को फिक्शन लिखना है तो उसके पास पैसा और अपना एक कमरा होना चाहिए. लेकिन अमेरिकी लेखिका एनाइस निन ‘ए वूमन स्पीक्स’ में कहती हैं कि स्त्री सदैव अपराध बोध के साथ लिखती है. क्योंकि स्त्री लेखन को, सृजन की इच्छा को पुरुष से जोड़ कर देखती है. क्योंकि यह उपलब्धि लाता है. वह उपलब्धि को पुरुष का क्षेत्र मानती है. इसीलिए जब एक पुरुष को लिखना होता है वह खुद को एक कमरे में बन्द करके बिना किसी अपराध बोध के लिखता है. घर परिवार को भुला कर, सबसे कट कर महीनों लेखन में डूबा रह सकता है. मगर स्त्री ऐसा नहीं कर पाती है. उसे लगता है कि ऐसा करना स्वार्थी होना है, आत्मरति है. स्त्री रसोई, बच्चों और सोने के कमरे में बैठ कर लिखती है. वह घर का हिस्सा बनी रहती है. निन की एक दोस्त लेखक हैं. उनके पति भी लिखते हैं. दोनों ने जब घर बनाया तो पति ने अपने लिखने के लिए एक अलग कमरा बनवाया परंतु पत्नी के लिए उसने ऐसा कुछ नहीं सोचा. पत्नी ने भी नहीं सोचा. वह घर, मेहमानों और बच्चों के बीच लिखती रही. मगर एक बार वह स्वयं निश्चय कर ले तो घर के सदस्य उसे भी स्पेस देने लगते हैं. समस्या दूसरों की ओर से उतनी नहीं है जितनी कि स्त्री की खुद की निर्मिति है.

कुछ लोग एक बार में एक किताब पर काम करते हैं. कुछ और लोग एक साथ कई किताब लिखते हैं. कुछ लोग पहले हाथ से लिखते हैं तब उसे टाइप करते हैं. उनका कहना होता है कि हाथ से लिखने पर विचार तेजी से आकार ग्रहण करते हैं. कुछ लोग सीधे टाइप करते हैं. कुछ लोग एक बार में लिख कर समाप्त कर देते हैं. कुछ लोग पहले नोट्स बनाते हैं तब लिखते हैं. कुछ और लोग एक ही विचार को बार-बार लिखते-काटते-संवराते हैं. किसी को लिखने के लिए एकांत, साउंड प्रूफ रूम चहिए. कोई हल्ले-गुल्ले और शोर-शराबे की बीच भी आराम से रचना कर सकता है. कुछ लोग नहा-धोकर, तैयार हो कर लिखने बैठते हैं. इसाबेल एलेंडे सजधज कर पूरे मेकअप के साथ लिखने बैठती थीं मानो अभी बाहर जाना है. तो कुछ को नहाना-धोना लिखने में बाधा लगता है. एकाध लोग नंगे होकर लिखते हैं. कुछ को जाड़े का मौसम रास आता है तो कुछ को ग्रीष्म काल भला लगता है. कुछ लोग किसी खास दिन खास तारीख को ही लिखते या लिखना शुरु करते हैं. जैसे इसाबेल एलेंडे 8 तारीख को ही लिखना प्रारम्भ करती, क्योंकि ‘ला कासा डे लोस एस्पिरिटस’ 8 जनवरी को उन्होंने शुरु की थी, जो खूब प्रसिद्घ हुई थी. एलेजो कार्पेनटियर सुबह साढ़े पाँच बजे से आठ बजे तक लिखते हैं. दोपहर को इस पांडुलिपि को टाइप करते. लेज़मा लीमा शाम को प्रारम्भ कर गई रात तक लिखते. लियोनार्डो पाडुरा एक बार में एक किताब पर काम करते हैं और उसके कई प्रारूप बनाते हैं. दो किताबों के बीच में वे या तो पत्रकारिता करते हैं अथवा फिल्म स्क्रिप्ट लिखते हैं. जबकि मैक्सिको के पाको इग्नासिओ टैबो द्वितीय एक साथ कई किताबों पर रात में काम करते हैं. अर्जेन्टीना के मेम्पो गिराडिनेली गर्मियों में सर्दियों की अपेक्षा अधिक लिखते हैं और लिखते समय उनकी गर्दन पर मात्र एक तौलिया पसीना सोखने को होता है. बाकी कोई कपड़ा उन्हें अपने शरीर पर नहीं रुचता है.

किसी को लिखने के लिए खूब तामझाम की आवश्यकता होती है. लिखने के लिए विशेष मेज कुर्सी, खास कमरा उसकी विशिष्ठ सजावट चाहिए होती है. कोई बस कागज-कलम लेकर उसमें डूब जाता है. बाल्ज़ाक की लिखने की मेज उसके सुख दुःख की साथिन थी. उसके अन्दरूनी आनन्दों और कटुतम दुखों की हमराज थी. वह इसे अपनी बहुमूल्य वस्तुओं से भी ज्यादा चाहता था क्योंकि वह इस पर जिन्दगी यूँ ढ़ालता जैसे केमियागार अपना सोना ढ़ालता है. वह मेज उसके सारे इरादों को जानती थी. उसने उसकी गरीबी देखी थी. इसी पर कोह्लू के बैल की तरह खटते हुए उसने अपनी जान गँवा दी. वह एक ओर अपनी पसन्द के खास आकार-प्रकार के कागजों का बंडल रखता, कलम भी बड़े मनोयोग से चुनता. खुद निश्चित दुकानों से अपनी कॉफी खरीदता और खुद तैयार करता था.

कलाओं में लेखन कला को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है चूंकि इसके लिए बस कागज और कलम की आवश्यकता होती है. इन दोनों की सहायता से रचनाकार एक भरा-पूरा संसार रचता चला जा सकता है. न उसे कैनवास चाहिए, न रंग और न ही कूँची. वह इनके बिना दृश्य-पर-दृश्य उकेर सकता है. रंगारंग तस्वीरें गढ़ सकता है. शब्दों के खेल से जीवन के सब व्यापार, सारी अनुभूतियों को सजीव कर सकता है. यह बड़ी विचित्र और जटिल प्रक्रिया है. प्रारम्भ में रचनाकार चरित्रों का निर्माण करता है. मगर एक स्थिति ऐसी आती है जब चरित्र स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त कर लेते हैं. वे लेखक को संचालित करने लगते हैं. मनमाना व्यापार करने की छूट ले लेते हैं. चरित्रों की सृष्ठि होते-होते लेखक का अपना चरित्र निर्मित होने लगता है. चरित्रों के निर्माण के साथ-साथ उसके अपने चरित्र का भी निर्माण होता जाता है.

लेखन एक एकाकी प्रक्रिया है. कुछ लोगों को एकांत अच्छा लगता है. वे लेखन के इस पक्ष का आनन्द उठाते हैं. कभी-कभी यह परेशान करता है. पर एक बार लिखना शुरु करते ही लेखक अकेला नहीं होता है. लेखन का यह आयाम एक बड़ी चुनौती है. यह भी सत्य है कि मन में जो संगीत चल रहा होता है उसे पेपर पर नहीं उतारा जा सकता है. शब्द कभी अनुभव को बयान नहीं कर सकते हैं. रचनाकार मेरी गोर्डन के अनुसार लिखना बहुत खराब बात है क्योंकि मन में शब्दों का जो संगीत चलता है, उसे पेपर पर कभी नहीं उतारा जा सकता है. वर्जीनिया वुल्फ को शब्दों से प्यार है. लेकिन वे सोचती हैं कि शब्दों के साथ इतने अर्थ और स्मृतियाँ जुड़ी होती हैं अतः शब्दों का सही उपयोग कर पाना कठिन है. वे कहती हैं कि यह बहुत स्पष्ठ है लेकिन सदा रहस्यमय है कि एक शब्द एक एकल और अलग सत्ता नहीं है. यह सदा दूसरे शब्दों का हिस्सा होता है. असल में यह तब तक शब्द नहीं होता है जबतक कि किसी वाक्य का अंश नहीं होता है. शब्द एक दूसरे को बिलॉन्ग करते हैं. एलिस हॉफमैन लिखती हैं क्योंकि वे लिख कर सौंदर्य और उद्देश्य पाना चाहती हैं. वे जानना चाहती हैं कि प्रेम सम्भव है, वास्तविक और शाश्वत है. वे जब लिखने के लिए अपने टेबल पर बैठती हैं तो उन्हें विश्वास होता है कि कुछ भी सम्भव है. वाल्टर मोसले की सलाह है कि यदि आप लेखक बनना चाहते हैं तो आपको प्रतिदिन लिखना चाहिए. जब विलियम सेरोयन से पूछा गया कि कैसे लिखते हो तो उनका उत्तर बहुत स्वाभाविक था. तुम लिखते हो जैसे पुराना अखरोट का पेड़ हर साल हजारों की संख्या में पत्ते और फल देता चला जाता है.

लेखन सृजन है. यह एक सृजनात्मक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में रचनाकार विभिन्न अनुभवों से गुजरता है. ये अनुभव आनन्ददायक होते हैं. इसीलिए काव्य (साहित्य) को रसो वै सः कहा गया है. अगर एक रचना पाठक को रुला या हँसा सकती है तो कल्पना की जा सकती है कि उसे रचते समय रचनाकार ने कैसा अनुभव किया होगा ? कुंट को अन्य कायर्ों की अपेक्षा लेखन बौद्घिक और भावात्मक रूप से ज्यादा संतोषजनक लगता है. मस्ती (ग्रेट फन) करना लगता है. क्योंकि वे मानते हैं कि यदि लिखते समय लेखक को मजा नहीं आता है तो उसके लिखे को पढ़ कर पाठक कैसे मजा करेंगे ? सफल लेखन का यही गुर है. खूब लिखने वाले लेखक की सफलता का यही मंत्र है कि वह लेखन प्रक्रिया के दौरान मजा करे, अपना मनोरंजन करे. अपने लेखन के संग हँसे, रोए, रोमांचित हो. अपने चरित्रों के संग जीए. यदि ऐसा होगा तो शायद एक बड़ा पाठक वर्ग मिले. न भी मिले तो लेखक का अपना जीवन भरा-पूरा, सुखी-सम्पन्न होगा. कुंट अपनी सफलता किताब की प्रतियों के बिकने की संख्या से नहीं लगाते हैं वरन लिखते समय और लिख कर किताब समाप्त करने से मिलने वाले संतोष से लगाते हैं. लेखन पूर्ण करने के बाद लेखक को वही खुशी और वही संतोष मिलता है जो किसान को अपने लहलहाते खेत और माँ को अपने नवजात शिशु को देख कर मिलता है. एक ओर लेखन समाप्त करने का संतोष मिलता है दूसरी ओर लेखन कभी समाप्त नहीं होता है. सदा मन में लगा रहता है कि लिखे हुए को अच्छा और बेहतर बनाया जा सकता है. शरीर थक जाता है. मन तरोताजा रहता है. यह गूँगे का गुड़ है. अव्याख्य है. बड़ी अजीब स्थिति है. जब लिख नहीं रहे होते हैं तब लिखने के विषय में सोच रहे होते हैं.

वैज्ञानिक हैंस जर्गेन इसेनेक अपनी पुस्तक ‘जीनियसः द नेचुरल हिस्ट्री ऑफ क्रियेटिविटी’ में सृजनात्मकता और मस्तिष्क के रसायनों का संबंध स्थापित करते हैं. उनके अनुसार सृजनात्मक चिंतन के समय उच्च स्तर का दिमागी रसायन डोपामाइन निम्न स्तर के सेरोटोनिन से मजबूत संबंध बनाता है. शायद किसी दिन विज्ञान स्क्रीन पर यह दिखाने में कामयाब हो जाए कि जब रचनाकार लिख रहा होता है तब उसका दिमाग कैसा दीखता है. शायद इस समय दिमाग से बहुत सारा स्फूर्तिदायक रसायन निकलता है. शायद किसी दिन वैज्ञानिक ऐसे रसायन प्रयोगशाला में बना कर दिमाग में डालने में सक्षम हो जाए. तब सृजनात्मक लेखन कैसा होगा ? क्या तब यह असल में सृजनात्मक लेखन होगा ? या तब यह लेखन मात्र ‘मेड टू ऑर्डर’ बन कर रह जाएगा ? तब इसके उद्देश्य और विषय वस्तु भी बाहर से नियंत्रित होने लगेगी. यह आंतरिक स्फूर्ति पर निर्भर न होकर बाह्य कारकों से नियंत्रित होने लगेगा. लिखते समय ये रसायन मस्तिष्क से निकलते हैं. क्या बाहर से रसायन डालने पर सृजन होने लगेगा ? फिर तो विज्ञान का भस्मासुर क्या गुल खिलाए बताना मुश्किल है.

स्टीफन स्वाइग का कथन बहुत सटीक है, ‘... अनगिनत, अव्याख्येय पहेलियों से भरी इस दुनिया में सृजन का रहस्य अभी भी सबसे गहरा और सबसे ज्यादा रहस्यमय बना हुआ है...’ लेखक कलाकार होता है और कलाकार स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है. अभिव्यक्त किए बिना रह नहीं सकता है. कोई बाल्ज़ाक की तरह कॉफी पीकर लिखता है. कोई भाँग पी कर, तो कोई सिगरेट पर सिगरेट फूँकता हुआ लिखता है. शराब पी कर लिखने वालों की भी कमी नहीं है. और शराब पीना छोड़ कर लिखने वालों के उदाहरण भी मिलते हैं. रचनाकार एक बेचैन आत्मा होता है. लिखना उसकी मजबूरी है. जब तक लिखे नहीं उसे चैन नहीं मिलता है. बिना लिखे वह जीवित नहीं रह सकता है. गाओ ज़िंग्जियान कहते हैं कि लिखने की स्वतंत्रता लेखक पर नवाजी नहीं जाती है. इसे खरीदा भी नहीं जा सकता है. यह लेखक की अपनी आंतरिक आवश्यकता से आती है. गुंटर ग्रास कहते हैं लेखन एक खतरनाक पेशा है. सत्ता में बैठे लोग लेखक के संग कुछ भी कर सकते हैं. वह सत्ता हथियाए हुए लोगों की आँख की किरकिरी होता है. पर क्या बिगाड़ के भय से वह सत्य न कहेगा ? लेखक सारे खतरे उठा कर भी सत्य उद्घाटित करता है. क्योंकि वह छद्म जी नहीं सकता है. लेखक लिखता है क्योंकि उसके अन्दर का विचार उसे चैन नहीं लेने देता है. 1982 में ‘शिंडलर्स आर्क’ के लिए बुकर पुरस्कार पाने वाले ऑस्ट्रेलिया के लेखक थॉमस केनिली का कहना है कि आप तभी लिख सकते हैं जब आपमें लिखने की आकांक्षा है, आपमें लिखने की भूख है.

सृजन एक सहज स्फूर्त प्रक्रिया है.

लिखते समय रचनाकार किसी और लोक में होता है. सृजन की उच्चतम अवस्था में व्यक्ति का मन और मस्तिष्क उस स्थिति में होता है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान धारा स्थिति (फ्लो स्टेट) कहता है. इस अवस्था में गहन थीटा तरंगें मस्तिष्क में चलती हैं. कभी रचनाकार फ्लो स्टेट से प्रारम्भ करता है और कभी वह लिखते-लिखते फ्लो स्टेट में चला जाता है. उसे इसका चस्का लग जाता है. वह इसी स्थिति को बारम्बार पाना चाहता है. उसकी यही चाहत उसका पागलपन है. आधुनिक मनोविज्ञान के विद्वान जैसे मिहाई चिकसेंटमिहाई कहते हैं कि फ्लो की इस स्थिति में रचनाकार खुद को खो देता है. यह स्थिति इतनी आनन्ददायक है कि रचनाकार को उसका नशा हो जाता है और लेखन उनके लिए एक उन्माद हो जाता है. लेखकों के लिए लेखन एक अनिवार्यता बन जाने का कारण शायद हमेंं इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य में खोजना होगा. जब मम्मट कहते हैं कि लेखन का उद्देश्य आनन्द प्राप्ति है - परनिवृतये - तो कदाचित उनका इशारा मस्तिष्क और स्नायु तंत्र को अपने चंगुल में ले लेने वाले इसी अतींद्रीय आनन्द के प्रति है.

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सन्दर्भ :

- ऑरवेल, जॉर्ज. ह्वाई आई राइट

- किंग, स्टीफन. नाइटमेयर्स एंड ड्रीम्सकैप्स

- कुंट, डीन. स्ट्रेन्ज हाईवेज

- निन, एनाइस. अ वूमन स्पीक्स

- नोर्डक्येस्ट, रिचर्ड. राइटर्स ऑन राइटिंग

- बुल्फ, वर्जीनिया. अ रूम वन्स ओन

- मम्मट. काव्य प्रकाश

- मिहाई चिकसेंटमिहाई. फ्लो द साइकालॉजी ऑफ ओप्टीमल एक्सपीरियन्स

- रॉस, सिरो बियांची. टेल मी, ह्वाई डू यू राइट ?

- स्वाइग, स्टीफन. वो गुजरा जमाना (अनुवादः ओमा शर्मा)

- स्वाइग, स्टीफन. बाल्ज़ाक का एक रोज़ और कार्य शैली (अनुवादः ओमा शर्मा)

- शर्मा, विजय. अपनी धरती, अपना आकाश — नोबेल के मंच से

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- विजय शर्मा 151 न्यू बाराद्वारी, जमशेदपुर 831 001

ई मेल —

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  1. ek dam thik kaha aapne

    kabhi yaha bhi aaye
    www.deepti09sharma.blogspot.com

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  2. इतनी अच्छी पोस्ट कम ही पढ़ने में आती है यह लेख अपने सबसे रचनात्मक क्षण में तब पहुंचता है जब बाल मनोविज्ञान पर लेखन की बात आती है। लेखन से जुड़ा चमत्कार जितना बचपन में महसूस किया अब महानतम रचनाएं भी वैसा आनंद नहीं देती कि क्योंकि जब हम दुनिया को समझते जाते हैं तो कल्पना लोक हमसे दूर होता जाता है और हमारी किताबें नीरस हो जाती हैं परियों के बिना

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  3. बहुत अच्छी जानकारियाँ मिली इस आलेख से। विजय जी और आपका धन्यवाद।

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  4. एक बार संगीतकार नौशाद से किसी ने पूछा था कि संगीत का क्या महत्व है. नौशाद साहब का जवाब कि क्या आपने किसी संगीत कार को हत्या-डकैती करते देखा है...संगीत आदमी को आदमी बनाता है. लेखन भी कुछ-कुछ ऐसा ही करता है.

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  5. बहुत सही लिखा--- थोड़े से प्रतिभा सम्पन्न मेधावी लोग भी हैं. दृढ़ इच्छा शक्ति वाले. जो अंत तक अपना जीवन जीने का पक्का इरादा रखते हैं. लेखक इसी श्रेणी का प्राणी है.
    ---बाह्य और आंतरिक संसार में सौंदर्य देखना. शब्द और उसकी संरचना में सौंदर्य निहारना.
    ---- यह लेखक की ही विशिष्टता है कि उसने एक श्लोक में ही सब कुछ लिख दिया--लेखक इसीलिये लिखता है।
    ‘काव्यं यशसे, अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये
    सद्यःपरनिवृतये कांतासम्मितयोपदेशयुजे’.
    ---बस दुख इतना है कि लेखक ने सारे विदेशी लेखकों के संदर्भ देकर अपनी जानकारी का परिचय तो दिया, परन्तु भारतीय लेखकों को इस योग्य नहीं समझा, क्या तुलसी, व आचार्य ममट के अतिरिक्त कोई भी भारतीय कवि, लेखक उन्हें संदर्भ के योग्य, या आचार्य मम्मट व तुलसी के समान योग्य( सिवाय विदेशी रचनाकारों के )नहीं दिखा?
    ---क्यों हम अभी भी ्पाश्चात्य-मानसिकता से ग्रस्त है, कब तक।

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  6. भारतीय शास्त्रीय कथन है---यदि आप चाह्ते हैं कि म्रित्यु के उपरान्त शीघ्र ही संसार आप को भूल न जाय तो-पढने योग्य श्रेष्ठ रचनाओं की श्रिष्टि करें या वर्णन योग्य श्रेष्ठ कर्म करें।

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