शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

विजय शर्मा की कहानी : मुसाफिर

‘‘अरी ! मुसाफिर भेजो नहीं तो यह पानी रुकने वाला नहीं है.’’ उसने कहा.
कई दिनों से पानी बरसता जा रहा है. लगातार. कभी झमाझम बरसता. कभी रिमझिम बौछार पड़ती. कभी टिपिर-टिपिर करता. कभी जोरों की झपास शुरु हो जाती. पर बरसता रहता. बरसना छूटता नहीं. इस बरस अच्छी बरखा के आसार हैं. आषाढ़ से ही शुरु हो गई है बरखा, और अब सावन जा रहा है. अभी भादों बाकी है. पहले एकाध दिन बारिश के साथ धूप निकलती रही. बादल आते. दो-तीन दिन बरसते. फिर मौसम खुल जाता. चटख धूप निकल आती. लोग बाग अपने काम निपटाने घर से बाहर निकल पड़ते. एक दो दिन में फिर काले-काले बादल उमड़-घुमड़ आते. पूरे आकाश में छा जाते. गरज-गरज कर धरती आकाश हिला देते. बिजली लरजती, चमकती. अंधेरे का पेट चीर देती. यहाँ से वहाँ तक एक सफेद लकीर खिंच जाती. बादलों की कड़कड़ाहट से कलेजा काँप जाता. टूट कर बरसते बादल. खूब पानी बरसता. फिर बादल फट जाते. धरती, पेड़ पौधे सारी प्रकृति धुल-पुँछ कर साफ-सुथरी हो जाती. सब सुहावना लगने लगता. चारों तरफ सब धुला-पुँछा दिखाई देता कि तभी फिर मेघ घिर आते. सारा आकाश ढ़ँक लेते. मोटे-मोटे, भारी-भारी बादलों से डर लगता. ऐसा लगता मानो अभी धरती पर कहर टूट पड़ेगा. कभी अंधड़ आता. जोरों की हवा चलती. हवा के झोंकों पर सवार मेघ किसी और दिशा को चल देते. किसी और देश में बरसने चले जाते.

 
वर्षा की आँख मिचौली शुरु में बहुत अच्छी लगी. गर्मी से राहत मिली. धरती से सोंधी खुशबू उठी. माटी की सुगंध नथुनों में भर कर तन-मन शीतल कर गई. चारों ओर हरियाली छा गई. नदी, नाले, तालाब सब उमग उठे. मेढ़क, झींगुर पावस के गीत गाने लगे. बड़ा मनभावन लग रहा था बादल-वर्षा, धूप-पानी का आना-जाना.

 
सबसे ज्यादा खुश थे बच्चे. पहले दिन अंधड़-पानी में स्कूल की छत उड़ गई. सो स्कूल जाने का झंझट खतम. वे खूब तालियाँ बजा-बजा कर नाच-गा रहे थे. खूब उछल-कूद चल रही थी. पानी में भींगना, एक दूसरे को पानी में ढ़केलना, जमा पानी के चबच्चों में छपछप करना. कॉपी किताब के पन्ने फाड़ कर नाव बनाना और उसे गढ़ों में भरे पानी में या नाली में तैराना. बड़ों की तो आदत होती है डाँट-फटकार करना. वे डाँट-फटकार रहे थे और बच्चे इससे बेअसर जम कर वर्षा का मजा उठा रहे थे. घमौरी ढ़ंडी करने के लिए उसने भी बच्चों के साथ अपनी पीठ पानी की पहली फुहार के सामने कर दी थी. फिर सिर नवा कर कहा, ‘‘धन्न भाग ! बरखा मैय्या ! तुम आई.’’

 
लेकिन इस बार जो पानी शुरु हुआ तो रुकने का नाम ही न ले. बादलों की परत फटने के कोई लच्छन नहीं. धूसर आकाश देख-देख कर आँखें थक गई. बीच-बीच में तीखी, तेज हवा चलती. तूफान आया हुआ है. दिन-रात पानी, पानी और पानी. लगता है आकाश में छेद हो गया है. मूसलाधार बरसे जा रहा है. जाने कहाँ से आ रहा है इतना पानी. खेत-खलिहान सब में पानी भर गया है. चारों ओर पनारे बह रहे हैं. कच्ची दीवारें, छतें ढ़ह गई हैं. दीवारों पर जगह-जगह लोनी लग गई है. आँगन, रास्ते पर काई जम गई है. इतनी फिसलन हो गई है कि जरा सी गफलत हुई, पैर फिसला और हाथ, पैर, कमर टूटी. कई दिनों से सूरज के दर्शन नहीं हुए हैं. सब कमरों, कपड़ों और बिस्तर में सीलन समा गई है. अलमारी, गद्दे, चादर, तकियों से अजीब- सी गंध आ रही है. रसोई और भंडार के सामानों में फफून्द लग गई है. घर की औरतों के लिए सौ बखेड़े खड़े हो गए हैं. बेसन कड़ुआ हो गया है. सूजी में सुसरी पड़ गई है. नमक पानी-पानी हो गया है. अचार बच जाए तो गनीमत है. कितना बचाया जाए, कितना संभाला जाए. लकड़ी घर में रखी लकड़ी, चैला, छिप्पट सब भींग गए हैं. जलावन का भींगा होना मतलब आँखों का फूटना. फूँकते रहो. धूँआ आँख, कान, नाक सबमें भर जाएगा पर गीली लकड़ियाँ जलने का नाम न लेंगी. धूँए से घर भर जाएगा पर चूह्ला जलना तो दूर चिंगारी नहीं दीखेगी, लपट नहीं उठेगी. केवल धुँआता रहेगा. सिर पीटते रहो. घड़ी-घड़ी फूँकते रहो तब कहीं जाकर रसोई तैयार होगी.
लगातार बारिश से कहीं आना-जाना मुहाल हो गया है. सब आजिज आ गए हैं इस मौसम से. बच्चे भी उकता गए हैं. उनके गली कूँचे, मैदान सब उनसे छिन गए हैं. उनके सारे बाहरी खेल बन्द हो गए हैं. खेल की जगह सिकुड़ गई है. ओसारे, कमरों में खेल कम धमाचौकड़ी, झगड़ा, मारपीट ज्यादा हो रही है. बड़ों की डाँट-फटकार, कनैठी उसी अनुपात में बढ़ गई है. सब घुटा-घुटा, बँधा-बँधा-सा है, इस लगातार बारिश के कारण.
इस लगातार बारिश से दादी चिंतित है. अपनी खाट पर बैठी सोच रही है, ‘‘जो जे पानी अब न रुका तो ? खेत खलिहान सब बह जाएँगे. परलय आ जाएगी. लगता है गंगा मैय्या गुसा गई हैं. सब बहा ले जाएँगी. पानी न थमा तो गरीब-गुरबा क्या करेगा ?’’ उसे मालूम है इस बिपत का हाल. वह सोचती जा रही है, ‘‘नाज का दाम बढ़ जाएगा. पहले ही इतना मँहगा है सब. अभी पानी बढ़ा है तो इतनी मुसीबत. फिर जब पानी उतरेगा तो और मुसीबत होगी. हारी, बीमारी, महामारी आएगी. हे भगवान ! रच्छा करो.’’ वह आँख मूँद कर हाथ जोड़ कर बार-बार सिर नवा देती है.

 
बच्चों की धींगामस्ती ने उसका ध्यान तोड़ा. वह झल्लाई, ‘‘अरे नासपीटों चुप रहो. काहे घर सिर पर उठाए हुए हो. एक तो जे पानी चैन नहीं लेने दे रहा है, ऊ पर से इन बालकन को देखो खाट तोड़े डार रहे हैं. अरे खाट पर च्यों कूद रहे हो. टूट जाएगी. सारी अदवायन ढीली हो जाएगी. अरे कोई रोको इन ढ़ोर-डंगरों को.’’ मगर कौन सुनता. कौन रोकता. कौन रुकता. पानी बरसता रहा. बच्चे उत्पात करते रहे. दादी बड़बड़ाती रही.
तंग आ गई है दादी इस निगोड़ी बरसात से. उसकी कोई नहीं सुनता. उसे मालूम है बरखा रोकने का उपाय. उसकी माँ, नानी, दादी सब इसी जतन से पानी रोकती आई हैं. जब भी चार-पाँच दिन लगातार पानी बरसता वे मुसाफिर भेजतीं. भगवान से प्रार्थना करती, ‘‘हे भगवान जी दया करो. मुसाफिर जा रहा है. वह भींग जाएगा. उसका दाना-पानी, ईधन भींग जाएगा. वह खाना कैसे बनाएगा ? हे भगवान दया करो. पानी बन्द कर दो.’’ और पानी रुक जाता. उसने भी सदा यही किया है. जब भी जरूरत से ज्यादा पानी बरसता वह मुसाफिर भेजती. भगवान से प्रार्थना करती. भगवान सदा उसकी सुनते और पानी बन्द कर देते. इस बार भी जब कई दिन लगातार बरसा हुई तो उसने बहुओं से कहा, ‘‘अरी ! अब मुसफिर भेजो, नहीं तो यह पानी रुकने वाला नहीं है.’’

 
जब भी पानी बरसता वो यही कहती. इस बार भी दोनों बड़ी बहुओं ने सुन कर अनसुना कर दिया. छोटी अभी परिवार में नई- नई आई थी. उसे अभी इस परिवार की परम्पराओं, रीति-रिवाजों की ज्यादा जानकारी न थी. इस विचित्र बात को सुन कर उसके मन में उत्सुकता जगी. विश्वास नहीं हुआ सुन कर. भला पानी बरसने और मुसाफिर भेजने का क्या रिश्ता है ? कौन मुसाफिर ? कैसा मुसाफिर ? कहाँ जाना है ? क्या करेगा मुसाफिर ? कई प्रश्न उठे उसके मन में. पर वह ठहरी सबसे छोटी बहु. सास, जिठानियों के बीच वह क्या बोलती, क्या पूछती. चुप रह गई. बात आई गई हो गई. पानी बरसता रहा.

 
वैसे वह बचपन से देखती सुनती आई थी पनी रोकने के टोटके. उसके यहाँ भी पानी रोकने के लिए ननिहाल में जन्में लड़के को नंगा करके लुत्ती लेकर आँगन में भेजा जाता रहा है. एक बार तो बहुत तमशा हुआ था. रमन का जनम उसकी नानी के घर हुआ था. उसे नंगा करके लुत्ती लेकर आँगन में भेजा गया. ऐसे समय कोई हँसता नहीं है सब चुपचाप खड़ी भगवन से प्रार्थना करते हैं वह तब छोटी थी. उसे रमन को नंगा देख कर बड़ी हँसी आई थी. उसकी मँ ने उसे हँसता देख कर बहुत मारा था. रमन की माँ ने उसे माँ की पिटाई से बचाया था. रमन को याद करके उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई. मगर मुसाफिर की बात उसने कभी नहीं सुनी थी.

 
छठे दिन उसने फिर कहा, ‘‘अरी भागवानों ! मुसाफिर भेजो. तभी रुकेगी यह परलय. नहीं तो सब बह जाएगा.’’ बहुएँ अपने- अपने काम में लगी रहीं. हजारों काम होते हैं घर में. करते जाओ, करते जाआ.े कभी खतम नहीं होंगे. हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़ते जाएँगे. वर्षा हो या आँधी-पानी, भूकम्प आए या प्रलय. ये पेट कहाँ मानने वाला है. इसमें दोनों शाम आग लगी रहती है. समय पर ईधन झोंकना पड़ता है. इतने बड़े परिवार की देखभाल करना, रसोई बनाना कोई हँसी खेल नहीं है. तिस पर ये मरी बरसात. बहुएँ अपने काम में लगी रहीं. किसे फुरसत है जानने की कि कहाँ बाढ़ आई है, कौन बहा है, कितने मरे हैं. घर की चिंता कम है जो दुनिया की चिंता करे. किसके पास समय है जो बुढ़िया की बात सुने. मुसाफिर भेजे. रुकना होगा तब अपने आप रुकेगा. रुके न रुके उनकी बला से. बुढ़िया को कोई काम धंधा तो है नहीं. बस खट पर बैठी बींजना हिलाएगी और हुकुम जमाएगी. बड़बड़ करते रहने की आदत पड़ गई है. मानो सारे संसार की चिंता इन्हीं के सिर पर है. भला मुसाफिर भेजने से पानी बन्द होगा. अगर ऐसे ही पानी रुकने लगे तब तो हो गया. इन्हीं की सुनने को बैठा है भगवान. भगवान को और कोई काम नहीं है. सास की बात इस कान सुन उस कान निकाल वे अपने काम में लगी रहीं.

 
उसका घर गाँव में ऊँ चे ठीये पर है. उतनी चिंता नहीं है. पर नीचे गरीब गुरवा रहते हैं. नीची बस्ती में पिछले तीन दिन से कमर भर पानी ठहरा हुआ है. बढ़ गया तो क्या होगा. जिस बरस हरिया के बाबू मरे थे, छोटका पैदा होने वाला था. उस बरस भी खूब बारिस हुई थी. उस दिन छः दिन तक पानी बस्ती में रुक गया था. नीचे बस्ती में घुटनों-घुटनों तक पानी जमा रहा. पानी जाता कहाँ जब गंगा मैया उपला गई थीं. कैसी हरहर बहती है. जो पेट में समाए सबको निगलते हुए. लोचन की भैंस पानी में बह गई थी. कितना फूट-फूट कर रोया था वह. एक रात बाबाजी अपनी मढ़ैया के साथ पानी में कहाँ बिला गए किसी को कुछ पता न चला. मढ़ैया के बगल का मूक गवाह पीपल आज भी खड़ा है.
और जब पानी उतरा तो हैजा फैल गया. नीचे बस्ती से दस लहास निकली थीं. उनके घर में भी हैजा घुस गया था. सास, पति, और बेटा तीनों हैजे की चपेट में थे. सास और हरिया की हालत बड़ी खराब थी. वह तीनों की सेवा टहल में फिरकी-सी घूँम रही थी. वैद जी ने कह दिया था बिढ़िया शायद ही बचे. सुन कर वह रोने लगी थी. वैद जी ने कहा था कि हरिया के पिता को अगले दिन पथ्य दिया जा सकेगा. हरिया के बारे में वो कोई निश्चय नहीं कर पा रहे थे. वैद जी के जाते ही हरिया के बाबू को पान की तलब लगी. वैद जी ने पानी की बूँद देने तक को मना किया था. पर नहीं माने जिद करने लगे. ‘‘पान दे दो. मुँह का स्वाद खराब हो गया है. वे पान खाएँगे नहीं बस चुभला कर थूक देंगे. उसने अपने हाथ से अपने बाबू को जहर दे दिया. मुँह में पान रखते ही बाबू की आँख उलट गई. उसके एक दिन बाद सास भी चल दी. हाँ हरिया बच गया. कैसी हाहाकारी बरसात थी. अपने साथ उसका सुहाग और सहारा सब ले गई. पति जाने से वह विधवा हुई. पर सास न रहने से वह अनाथ हो गई.

 
बारिश थमी नहीं. छठा दिन भी निकल गया. पानी बरसता रहा. कभी तेज बौछार, कभी मूसलाधार. रुका नहीं. बुढ़िया खाट पर बैठी दुनिया जहाँ की चिंता से परेशान, अब प्रलय आने नें उसे कोई शंका नहीं थी. अब वह और नहीं रुक सकती. यूँ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से काम नहीं चलेगा. अपने सर पर छत होने का यह मतलब नहीं कि दूसरों की चिंता न की जाए. कितनों के पास इस भयंकर वर्षा में सर छुपाने का ठौर ठीया है. अदमी तो आसरा ढ़ूँढ़ लेगा पर गाय गोरू वे क्या करें पंक्षी जानवर उनका क्या होगा. वे कहाँ जाएँ क्या खाएँ. अब हर हाल में वर्षा रोकनी होगी. मुसाफिर भेजना होगा. बुढ़िया ने ठान लिया. बहुओं से उसे उम्मीद न रही. जाके फटे न बिबाई सो का जाने पीर पराई. इन्हें दूसरों के दुःख दरद से क्या लेना देना. इन्हें तो बस दोनों टैम पेट भर खाने और दिन भर गलचौर करने को मिलता रहे. बस बाकी पत्थर पड़े कि बज्जर. इन्हें कोई मतबल नहीं.

 
बहुओं से नाउम्मीद होकर वह निराश नहीं हुई. उसने भाइयों के साथ उधम चौकड़ी करती अपनी पोती को आवाज लगाई, ‘‘ओ री भागवंती ! सुन, यहाँ आ.’’
‘‘क्या है दादी ?’’ पुकार सुन कर भागवंती दौड़ी आई.
‘‘क्या है, क्या ?’’ देखती नहीं पानी बरसे जा रहा है.अकास फटा पड़ रहा है और तुझे खेल से फुरसत नहीं.’’
मानो पानी बरसने का सारा दारोमदार भागवंती के खेल पर हो. भागवंती की समझ में नहीं आया कि उसके खेलने और वर्षा के रुकने या न रुकने का क्या संबंध है. वह ज्यादा पचड़े में नहीं पड़ी. हाँ उसे दादी पर लाड़ आ गया. दादी के गले में बाँहें डाल कर लड़ियाती आवाज में बोली, ‘‘तो मैं क्या करू ?’’
‘‘ले करेगी क्या. मुसाफिर भेज. इतनी बड़ी हो गई फिर भी लड़कों के साथ धींगामस्ती करती रहती है. चल पानी बन्द करने के लिए मुसाफिर भेज.’’
मुसाफिर शब्द कान में पड़ते ही छोटी बहु कुतुहलवश सास की खाट के पास आ कर खड़ी हो गई.

 
‘‘मुसाफिर वो क्या दादी ?’’ भागवंती ने पूछा.
‘‘अरी देखती नहीं इतने दिनों से पानी बरसे जा रहा है. भगवान जी गुसा गए हैं. कोप में सब बहा देंगे. मुसाफिर भेज. बिनती कर. तभी उनका गुस्सा शांत होगा. इन्दर देवता को मना तभी बरसा बन्द होगी.’’ दादी ने पोती को समझाया.
भागवंती का कौतुहल जाग उठा. छोटी बहु और करीब सरक आई. ‘‘वो कैसे अम्माजी ?’’
‘‘मुसाफिर बना कर खड़ा कर दे उसे बीच आँगन में. प्रार्थना कर भगवान से. फिर देख कैसे नहीं सुनता है भगवान.’’ श्रोता पा दादी उत्साहित हो उठी. पोती और बहु में भी उत्साह उमग आया.
‘‘कैसे बनेगा मुसाफिर ?’’ दोनों ने एक साथ पूछा.
‘‘देख तू नारियल की झाडू का मोटा तिनका, दातून या फिर बाँस की खपच्च ले आ.’’ उसने पोती को निर्देश दिया.
दादी की बात पूरी होने के पहले

पोती दौड़ पड़ी और झाडू की एक सींक की जगह पूरी झाडू और दातून का पूरा का पूरा बंडल उठा लाई.
‘‘अरी पूरी झाडू नहीं. बस एक तिनका चाहिए जलावन बनाने को.’’ उसने से एक मोटी सींक झाडू में से खींच कर निकाल ली. दातून के बंडल से एक अच्छी सी दातून निकाल ली.
‘‘जा झाडू और दतून जगह पर रख आ. नहीं तो तेरी माँ चिल्लाएगी.’’ पोती ने दौड़ कर आज्ञा का पालन किया.

 
झाडू और दातून जगह पर वापस रख दादी से सट कर खड़ी हो गई. बहु चुपचाप देख रही थी. दादी ने अपने सिरहाने बिछावन के नीचे से पुरानी साड़ी की एक लीर निकाली. बित्ते से नाप कर एक-एक बित्ते के दो टुकड़े दातून खट-खट तोड़ लिए. बाएँ हाथ में दातून का एक टुकड़ा खड़ा पकड़ कर दाएँ हाथ से नाप कर ऊ पर सिरे से दो अंगुल छोड़ कर दातून के दूसरे टुकड़े को आड़ा कर लीर की सहायता से बाँध दिया. दोनों दातून मिल कर क्रॉस की आकृति बन गई. ठीक वैसी ही जैसी बाँस से बिजूका की आकृति खेत में खड़ा करते हैं. आड़ी दातून दोनों हाथ बन गए. खड़ी दातून का ऊ परी सिरा सिर और निचला सिरा धड़ बन गया. ऊ पर के निकले दो अंगुल के हिस्से पर लीर से दादी ने मुरैठा बाँध दिया. देखते-देखते जहाँ कुछ नहीं था वहाँ मुसाफिर बन कर तैयार खड़ा था. बहु को इस खेल में मजा आ रहा था.

 
‘‘चाची ! देखो ये तो पुतला बन गया.’’ भागवंती ने अपनी पुलक में चाची को शामिल किया.
‘‘पुतला नहीं मुसाफिर.’’ चाची और दादी दोनों ने एक साथ कहा.
‘‘दुह्लन तू भंडार घर से नेक-सा चावल दाल ले आ.’’ उसने बहु को सामान लाने भेजा. बहु बच्चों के से उत्साह से थोड़ा-सा दाल चावल ले आई. दादी ने लीर से चार अंगुल चौड़ा और एक हाथ लम्बा टुकड़ा फाड़ा. बहु को उसके दोनों छोर पर चावल और दाल बाँधने के लिए दिया. बहु ने दोनों छोर पर छोटी दो गठरियाँ बना दीं. मुसाफिर की रसद उसकी गर्दन के पीछे से जाकर दोनों कंधों पर होती गुई दोनों बाजूओं से होकर नीची झूलने लगी.

 
‘‘रस्ते में भूख लगेगी तो मुसाफिर खाना कैसे बनाएगा.’’ बहु और पोती को समझाते हुए उसने झाडू की सींक के चार-चार अंगुल के टुकड़े किए और उसे मुसाफिर के बाएँ कंधे पर लीर से बाँध दिया. ‘‘ये हुई उसके खाना बनाने को लकड़ियाँ.’’
पोती की खुशी और अचरज का ठिकाना न था. जहाँ कुछ देर पहले कुछ न था वहीं अब मुरैठा बाँधे, कांधे पर दाल चावल की बँहगी लटकाए और लकड़ियों का बोझा लिए चल पड़ने को तैयार खड़ा था मुसाफिर. मुसाफिर को तैयार खड़ा देख कर पोती ताली बजा कर नाच उठी. छोटी मुस्कुराने लगी.

 
‘‘ले जा अब इसे बीच आँगन में खड़ा कर दे. फिर आँख मूँद कर भगवान जी से कहना, ‘हे भगवान जी पानी बन्द करो. मुसाफिर जा रहा है. इसकी यात्रा में बिघिन मत डालो. यह भींग जाएगा. इसका चावल दाल खराब हो जएगा. लकड़ियाँ गीली हो जाएंगी. इसे भूख लगेगी तो यह खाना कैसे बनाएगा. आग कैसे जलाएगा. अब बरखा बन्द करो भगवान जी. बहुत हुआ अब हम पर किरपा करो.’ दादी पोती और बहु को प्रार्थना की पूरी विधि समझा रही थी. हाथ में मुसाफिर लिए पोती बड़े ध्यान से एक-एक शब्द पी रही थी. दादी बच्ची के से उत्साह से बोलती जा रही थी, ‘‘भगवान हमारी जरूर सुनेगा. पानी बरसाना बन्द कर देगा.’’ दादी को पूरा विश्वास था.

 
पोती मुसफिर के साथ बीच आँगन में पहुँची. छोटी बहु हाथ जोड़े उसके साथ थी. मुसाफिर को जमीन पर खड़ा किया. दोनों ने मिल कर मुसाफिर को आँगन की कच्ची जमीन में रोपा. हाथ जोड़ कर आँख बन्द की और दोनों प्रार्थना दोहराने लगीं, ‘‘हे भगवान ! पानी बन्द करो. मुसाफिर यात्रा पर जा रहा है. वह भींग जाएगा. उसका दाल-चावल खराब हो जाएगा. उसकी लकड़ियाँ गीली हो जाएँगी. उसे भूख लगेगी तो वह खाना कैसे बनाएगा. भगवान जी अब वर्षा बन्द करो. हम पर दया करो.’’

 
दादी ने अपनी अपनी खाट पर बैठे बैठे हाथ जोड़ लिए आँखें बन्द कर ली और सिर नवा कर बुदबुदाने लगी, ‘‘हे भगवानजी दया करो. बरखा बन्द करो. मुसाफिर जा रहा है. बहुत हुआ अब बस करो... पूरी आस्था से वह प्रार्थना दोहरा रही थी.
प्रार्थना समाप्त कर सब अपने काम में लग गए. भागवंती खेलने चल दी. बहु जेठानियों का हाथ बँटाने. बस अपनी खाट पर बैठी दादी एकटक मुसाफिर को देखे जा रही थी. मुसाफिर अकेला आँगन में खड़ा था. दिन भर खड़ा रहा. पानी कभी कम कभी ज्यादा पड़ता रहा.

 
रात को दादी को नींद नहीं आ रही थी. वह छटपटा रही थी. मुसाफिर में उसे अपने हरिया का बाबू दीख रहा था. वह अकेला खड़ा था और साथ के लिए उसे बुला रहा था.
सुबह छोटी बहु उठ कर आँगन में आई तो उसकी चीख निकल गई. अनंत यात्रा पर जा रहे मुसाफिर के पास दादी पड़ी थी.
दूर बादलों का एक कोना फट रहा था. आकाश के उस छोर से उजास फूट रहा था. वर्षा थम चली थी.

 
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