शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

विजयलक्ष्मी ‘विभा’ की ग़ज़ल

 

कोई मौसम का हाल क्या जाने

कब बदल लेगी रूख हवा जाने

 

मेरी कश्ती है आज दरिया में

क्या हो लहरों का फैसला जाने

 

मुझको खुद भी नहीं खबर अपनी

कैसे कोई मेरा पता जाने

 

बोलता है जो झूठ सच की तरह़

सारी दुनिया उसे भला जाने

 

है अगर बेकसूर तो उसको

क्यों डराता है आईना जाने

 

साथ अश्कों ने मेरा छोड़ा है

हो गई कौन-सी खता जाने

 

बाजी हर बार जीत लेता है

जाने वो कौन सी कला जाने

 

मैंने तो सिर्फ हाल पूछा था

फिर वो क्यों रो पडा खुदा जाने

 

जख्म भर जाएंगे कभी न कभी

वक्त हर दर्द की दवा जाने

 

ग़म में कितना सुकून होता है

राज की बात ये ‘विभा’ जाने

--

149, जी/2, चकिया, इलाहाबाद (उप्र)

(साभार – दिव्यालोक, अंक 14 वर्ष 2010)

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