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विजय शर्मा का आलेख : होलोकास्ट एवं सिनेमाः परदे पर मनुष्य की त्रासदी

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होलोकास्ट सिनेमा : आदमी की त्रासदी और जिजीविषा आ दमी इतिहास बनाता है मगर वह इससे कुछ सीखता नहीं है. इसीलिए इतिहास स्वयं को दोहराता रहता है ...

होलोकास्ट सिनेमा : आदमी की त्रासदी और जिजीविषा

दमी इतिहास बनाता है मगर वह इससे कुछ सीखता नहीं है. इसीलिए इतिहास स्वयं को दोहराता रहता है और आदमी बार- बार उन्हीं हादसों, उन्हीं त्रासदियों से गुजरने को अभिशप्त होता रहता है. आदमी का आदमी के प्रति क्रूर व्यवहार से इतिहास भरा हुआ है. प्राचीन काल से लेकर अब तक आदमी को आदमी के द्वारा दास बनाया जाना, समय-समय पर राजाओं द्वारा कत्लेआम, गाँव, शहर, बस्ती की बस्ती जला देना, उजाड़ देना, खड़ी फसल रौंद देना, उसमें आग लगा देना, स्त्रियों के साथ बलात्कार, सैनिकों द्वारा अगली नस्लों को संकर बना देना, पूरी-की-पूरी नस्ल, जाति का सफाया कर देना, धर्म के नाम पर लोगों को जिन्दा जला देना, डायन कह कर जिन्दगी समाप्त कर डालना आदि घटनाओं से इतिहास भरा हुआ है. मगर ये सारे कुकर्म और क्रूर कर्म पासंग बराबर भी नहीं ठहरते हैं, जब होलोकास्ट की बात हम करते हैं. होलोकास्ट के भुक्त भोगी विक्टर फ्रैन्कल लिखते हैं, ‘कोई भी सपना कितना भी भयंकर क्यों न हो यातना शिविर की हमारे आसपास की सच्चाई से भयंकर नहीं हो सकता है.’ और होलोकास्ट हुआ सोची-समझी, जानी-बूझी योजना के तहत. चालीस यातना शिविर की स्थापना करके एक व्यक्ति के आदेश पर यहूदियों, दासों, जिप्सियों, कम्युनिस्टों तथा समलैंगिकों को गैरजरूरी घोषित करके नष्ठ कर डाला गया. आदमी को सताने के विभिन्न औजारों का इज़ाद, गैस चैम्बर, घातक सूइयाँ, जीवित आदमी, औरतों तथा बच्चों पर तरह-तरह के भयंकर प्रयोग, क्या नहीं किया गया होलोकास्ट के दौरान.

होलोकास्ट मनुष्यता के चेहरे पर बदनुमा दाग है जिसे किसी भी तरह मिटाया नहीं जा सकता है. हिटलर मर चुका है. जर्मनी फिर से एकीकृत हो चुका है परंतु दुःखद बात यह है कि आज भी होलोकास्ट समाप्त नहीं हुआ है. किसी न किसी रूप में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में यह आज भी जारी है. पॉल पोट अभी हाल की घटना है, रुआंडा अभी हमारी यादों में ताजा है. नादिरशाह का कत्लेआम इनके सामने बहुत बौना नजर आता है.

होलोकास्ट शब्द दो ग्रीक शब्दों का मेल है, जिसमें ‘होलो’ का अर्थ होता है पूर्ण तथा ‘कस्टोस’ पद, जलाना क्रिया के लिए प्रयोग होता है. यह शब्द धार्मिक क्रियाकपाल में प्रयुक्त होता है जहाँ अग्नि को आहुति दी जाती है, जैसे हवन में विभिन्न वस्तुओं को डाला जाता है. लेकिन आज यह शब्द अपने इस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता है. आज इसका अर्थ रूढ़ हो गया है. इस शब्द का अर्थ बड़ी संख्या में नरसंहार के लिए प्रयोग किया जाता है. साहित्य तथा फिल्म में यह शब्द विशिष्ठ अर्थ में प्रयोग होता है. यहाँ इसका एक ही अर्थ है नात्सी जर्मनी द्वारा यूरोप में यहूदियों का सफाया. होलोकास्ट बीसवीं सदी की सर्वाधिक भयानक त्रासदी है. जब कोई समुदाय अपनी बुद्घि, मेहनत, लगन या किसी भी अन्य तरीके से उन्नति करता है. समाज में महत्वपूर्ण स्थान बना लेता है. विज्ञान, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण बन जाता है तो दूसरे समुदाय उससे भयभीत हो जाते हैं. घबराने लगते हैं. उन्हें लगने लगता है कि यदि इनका कुछ किया नहीं गया तो ये हमारे लिए खतरा बन जाएँगे. और किसी न किसी प्रकार इस समृद्घ समुदाय को नियंत्रित करने का काम प्रारम्भ कर दिया जाता है. यहूदी समुदाय के विषय में भी यही हुआ. जर्मन ईसाई समुदाय को लगा कि यदि इन्हें सबक न सिखाया गया तो ये हमारे सिर पर चढ़ बैठेंगे. हमारा समस्त व्यवसाय, अधिकार और सम्मान हजम कर जाएँगे. लेकिन होलोकास्ट की जड़ में जर्मन लोगों की अपनी नस्ल की श्रेष्टता के दम्भ का हाथ धार्मिक और आर्थिक कारणों से ज्यादा था. वे श्रेष्ट हैं और केवल उन्हें जीना चाहिए यह उनकी धारणा हो गई थी. इस तरह होलोकास्ट के रूप में ‘फाइनल सलूशन ऑफ ज्यूइश क्वैश्चन’ के लिए साठ लाख लोग यातना शिविरों में समाप्त कर दिए गए, चेल्मनो, बेल्जेक, सोबीबोर, ट्रेबलिंका, मेडेनेक, बिरकेनाऊ ,ऑस्क्विट्ज यातना शिविरों में क्राकोवा के करीब का ऑस्क्विट्ज शिविर सबसे बड़ा मृत्यु शिविर था. इस विशाल परियोजना के लिए सर्वोत्तम वैज्ञानिक, इंजीनियर्स, परिवहन तथा अन्य तमाम विषयों से जुड़े लोग काम पर लगाए गए थे. इन शिविरों में मानव यातना के नायाब तरीकों का इज़ाद हुआ जिसे सोच कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

जो नाममात्र के लोग इन मृत्यु स्थानों से बच निकले उनमें से ज्यादतर लोग मौन हो गए. इस चुप्पी के पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं. मनोविज्ञान के एक सिद्घांत के अनुसार व्यक्ति बड़े हादसों को स्मरण नहीं करना चहता है. उस स्मृति को विस्मृत कर देना चाहता है. मनुष्य दुःखद बातों से बचना चाहता है. यही उसका स्वभाव है. यह उसके लिए आवश्यक भी है. उसके जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक भी है. यहाँ तक कि वह यह भी स्वीकार नहीं करना चाहता है कि उसके साथ ऐसी कोई अमानवीय घटना घटी है. होलोकास्ट का धक्का इतना गहन तथा आकार में यह सदमा इतना भयंकर और बड़ा था कि जो लोग इससे बच गए वे स्तम्भित थे.

होलोकास्ट से निकल कर आए डॉ. विक्टर फ्रैन्कल अपनी पुस्तक ‘मैन्स सर्च फॉर मीनिन्ग’ में इसका एक अन्य कारण प्रस्तुत करते हैं. उनके अनुसार ‘होलोकास्ट से बचे हुए अधिकाँश लोग अपने अनुभवों के बारे में बात करना नापसन्द करते हैं, क्योंकि जो होलोकस्ट के भीतर थे उनके लिए इसकी किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है और जो लोग भीतर नहीं थे वे इसे समझ नहीं सकते हैं कि जो भीतर थे उन्हें वहाँ कैसे अनुभव हुए और आज भी वे क्या अनुभव करते हैं.’’ जो एकाध लोग बच गए उनमें से मात्र कुछ ने अपने अनुभवों को शब्दों में व्यक्त किया. इनमें से कुछ ने कहानी, उपन्यास लिखे, साक्षात्कार दिए, संस्मरण लिखे, कुछ ने फिल्म भी बनाई. कुछ और लोगों ने जिन्होंने ये अनुभव प्रत्यक्ष रूप से नहीं किए थे उन्होंने दूसरे के अनुभवों को कागज तथा पर्दे पर उतारा.

डॉ. विक्टर फ्रैन्कल, इमरे कर्टीज, एन फ्रैंक, प्रिमो लिवाई ने विभिन्न विधाओं में अपने इन अनुभवों को शब्दबद्घ किया. इमरे कर्टीज ने कलमबद्घ करने के साथ-साथ फिल्म विधा (फेटॅलेस) में भी अपने इन यातना भरे दिनों को व्यक्त किया. वैसे उन्होंने इस हादसे को एक बच्चे के नजरिए से देखा और उसे उसी रूप में व्यक्त भी किया, जिस पर प्रश्न उठाए जाते हैं. एक ही समय में एक घटना के भुक्तभोगी भी उसका वर्णन भिन्न-भिन्न तरह से करते हैं यह जानी मानी बात है. यह व्यक्ति के नजरिए, उसकी संवेदन शक्ति तथा सहन शक्ति, उसकी पृष्टभूमि पर निर्भर करता है कि घटना का उस पर कैसा और कितना प्रभाव पड़ता है. और वय अपनी अनुभूति को कैसे व्यक्त करता है व्यक्त करता भी है अथवा नहीं. कुछ लोग सदा आगे की ओर देखते हैं. कुछ मुड़ मुड़ कर पीछे भी देखते जाते हैं. कोई अतीत के अनुभवों से निराश होकर आगे भी अंधकार देखता है तो कोई अतीत को पीछे छोड़ कर भविष्य में आशा का दामन पकड़ता है.

इमरे कर्टीज अपने नोबेल भाषण में कहते हैं कि आज हम होलोकास्ट का भूमंडलीकरण, इसकी स्फीति अनुभव कर रहें हैं. होलोकास्ट से बचे हुए, ऑस्क्विट्ज के कष्ठ से गुजर कर बचे हुए लोग, जिन्होंने पीड़ा का अनुभव किया है वे इन सब बातों को वहाँ से मिले नजरिए से देखते हैं. ऐसा व्यक्ति मौन रहता है या स्पियलबर्ग फाउन्डेशन को साक्षात्कार देता है. वह मुआवजे के वायदे को पचास साल बाद पाता है या यदि वह बहुत प्रसिद्घ है तो स्वीडिश अकादमी में व्याख्यान देता है (यह वे स्वयं अपने लिए कह रहे हैं). एक-सी परिस्थिति में अलग-अलग लोग भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया करते हैं. यातना शिविर में भी लोगों का व्यवहार अलग-अलग तरह का था और बचकर बाहर निकले लोग भी अलग-अलग प्रतिक्रिया कर रहे थे. लाखों लोग यातना शिविर में मार डाले गए. बहुत सारे लोगों ने आत्महत्या कर ली. बहुत सारे लोग जीवित रहे. उनमें से कुछ ने बाहर आकर अपना जीवन स्वयं समाप्त कर डाला. कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने अपने जीवन को नए सिरे से प्रारम्भ किया. जीवन का अर्थ खोजा. स्वयं हिटलर और उसके साथियों को जब लगा कि अब उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं रह गया है तो उन लोगों ने आत्महत्या कर ली.

केमिस्ट्री में उच्च शिक्षा प्राप्त तथा मनोचिकित्सक के रूप में प्रशिक्षित विक्टर फ्रैन्कल ने यातना शिविर की सारी कार्यविधि का निरीक्षण एक प्रशिक्षित व्यक्ति के रूप में किया. उन्हें वहाँ प्रयोगशाला के काम में लगाया गया था. बचे हुए लोगों के विषय में उनका कहना है कि इन अमानवीय, क्रूर और कठिन परिस्थितियों में लोगों को बचे रहने और अपने अस्तित्व की रक्षा करने में प्रेम से मदद मिली. स्वयं वे पत्नी के चेहरे को निरंतर स्मरण करते रहे और जब उन्हें ज्ञात हो गया कि उनकी पत्नी मारी जा चुकी है तब भी वे उससे बातें करते रहे, मानो वह अब भी जीवित हो. वहीं उन्हें पहली बार कवियों और चिंतकों की बुद्घिमानी का पता चला, जो कहते हैं कि प्रेम चरम होता है. उन्हें काव्य और विचारों-विश्वासों का गूढ़ रहस्य मिला कि मनुष्य की मुक्ति प्रेम के द्वारा है, उसकी मुक्ति प्रेम में है. प्रेम भौतिक शरीर के पार जाता है. उन्होंने वहाँ खुद को तो बचाए रखा ही साथ ही दो अवसरों पर लोगों को आत्महत्या से बचाने का प्रयास किया. वे लोगों की काउंसिलिंग भी कर रहे थे. यातना शिविर से मुक्त होने पर उन्होंने फ्रायड के स्तर की एक और सकारात्मक मनःचिकित्सा प्रणाली ‘लोगोथेरेपी’ विकसित की. यातना शिविर के कैदियों की मनोदशा पर चिंतन-मनन कर, उन पर प्रयोग करके उन्होंने जीवन की गुत्थियों को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान में लोगोथेरेपी को समाहित किया. इस थेरेपी का सार है, ‘विल टू मीनिंग’. यह जानना चाहती है कि

‘जिन्दगी तुमसे क्या चाहती है ?’ यह इस बात पर बल नहीं देती है कि जिन्दगी से तुम क्या चाहते हो. यह एक सकारात्मक नजरिया प्रस्तुत करती है. इसके अनुसार जिन्दगी तुमसे जो चाहती है उसे तुम और केवल तुम पूरा कर सकते हो. कोई और व्यक्ति वह नहीं कर सकता है. कम से कम एक व्यक्ति इस दुनिया में ऐसा है जिसे तुम्हरी आवश्यकता है. दुनिया के लिए भले ही तुम एक आदमी हो मगर इस आदमी के लिए तुम दुनिया हो. अतः प्रत्येक आदमी को अपनी जिन्दगी का अर्थ जानने की इच्छा रखनी चाहिए. जैसे फ्रायड ‘विल टू प्लेज़र’ और एडगर ‘विल टू पावर’ की बात कहते हैं विक्टर फ्रैन्कल की लोगोथेरेपी ‘विल टू मीनिंग’ की बात करती है. यह भविष्य पर ध्यान केंद्रित करती है. उन बातों, उन दत्तकायर्ों और उनकी अर्थवत्ता पर ध्यान केंद्रित करती है जो व्यक्ति को भविष्य में पूरे करने हैं. जिन्हें केवल वही पूरे कर सकता है. जब व्यक्ति को अपने जीवन का अर्थ ज्ञात हो जाता है तो उसे जीने का एक उद्देश्य मिल जाता है. तब वह कोई भी कष्ठ सहन करने को प्रतिबद्घ हो जाता है. उसे ज्ञत होता है कि उसके अनुभव को दुनिया की कोई ताकत छीन नहीं सकती है. लोगोज का एक अर्थ आत्मा भी होता है. लोगोथेरेपी को ‘द थर्ड वियना स्कूल ऑफ साइकोथेरेपी’ कहा जाता है.

कृष्णा सोबती भारत विभाजन के सन्दर्भ में कहती हैं कि विभाजन भूलना कठिन है, पर याद रखना खतरनाक है. यह कथन होलोकास्ट के संबंध में भी सटीक उतरता है. शायद इसे किसी न किसी रूप में स्मरण करना एक बेहतर तरीका है. शायद फिल्म के रूप में प्रदर्शित करना और भी उचित होगा. हालाँकि इसमें खतरे भी कम नहीं हैं. साहित्य में, फिल्म में होलोकास्ट अवश्य आना चाहिए लेकिन आधिकारिक तरीके से. जिम्मेदारी के साथ आना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस तरह के हादसों का शिकार न हों. वे स्वयं भी ऐसी गर्हित हरकत न करें.

तीस के दशक में जर्मनी में फिल्म उद्योग खूब फल-फूल रहा था. करीब 130 की सालाना दर से फिल्में बन रहीं थीं. मगर 1933 में नात्सियों के उदय के साथ अन्य सब कलाओं के साथ-साथ फिल्म व्यवसाय भी नष्ठ हो गया. फिल्म निर्माण समाप्त होने का एक कारण यह भी था कि फिल्म से अधिकाँश रूप में यहूदी जुड़े हुए थे और यहूदियों के समस्त अधिकार समाप्त किए जा चुके थे. हाँ प्रोपेगंडा फिल्में खूब बनने लगीं.

होलोकास्ट के समाप्त होने के बरसों बाद तक इस विषय पर फिल्म निर्माण मौन रहा. एक्का-दुक्का फिल्में बनीं. होलोकास्ट पर बनने वाली शुरुआती और महत्वपूर्ण फिल्मों में स्टीवन स्पीयलबर्ग की ‘शिंडलर्स लिस्ट’ का नाम पहले आता है. इस फिल्म की प्रेरणा एक वास्तविक व्यक्ति है. ऑस्कर शिंडॅलर 1908 में चेकोस्लोवाकिया में जन्मा था. इस जर्मन उद्योगपति ने यहूदियों को होलोकास्ट के समय जर्मनों के हाथ से नष्ठ होने से बचाया था. क्राकोवा में उसका एनेमल सामानों का एक कारखाना चलता था जो यहूदी मजदूरों के लिए स्वर्ग समान था. जब क्राकोवा को यातना शिविर में परिवर्तित कर दिया गया तो ऑस्कर अपना कारखाना उठा कर चेकोस्लोवाकिया ले गया और उसने घूस देकर अपने यहूदी कामगरों को भी वहाँ पहुँचा दिया. इस तरह खतरा मोल लेकर उसने 1100 यहूदियों को नष्ठ होने से बचा लिया. फिल्म में ऑस्कर शिंडलर का किरदार लिआम नीसन ने निभाया है. फिल्म एक छोटे से रंगीन दृश्य के साथ प्रारम्भ होती है लेकिन बाद में पूरी फिल्म श्वेत-श्ग्याम है. रंगों का यह तालमेल फिल्म को यथार्थ की अनुभूति में तब्दील कर देता है. ऑस्कर शिंडलर अपने यहूदी वर्कर्स को मुफ्त में काम के एवज में बहुत बड़ी मुक्ति प्रदान करता है. वह उन्हें मौत के मुँह से निकाल लेता है. इसमें उसका फायदा है मगर उसकी मानवीयता भी है. फिल्म में ऑस्कर की मानवीयता को उभारने के लिए एमोन गोयेथ (राल्फ फियेंस द्वारा अभिनीत) का किरदार है. यह खलनायक एक यहूदी हेलेन हिरश्च (एम्बेथ डेविट) को अपना दास बना लेता है, लेकिन शीघ्र ही खुद को उसके प्रेम में पाता है. एक और समय बेमतलब अपनी बालकनी में जाता है और अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर लोगों को मार डालता है. हेलेन घृणा से देखती है. वह मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति है. पल में माशा, पल में तोला. एक क्षण में एक बच्चे के प्रति दया दिखाता है अगले क्षण उसे मार डालता है.

एक यहूदी इज़ाक शिंडलर का एकाउंटेंट है. जिसका प्रभाव शिंडलर पर पड़ता है क्योंकि इस व्यक्ति में अपने आदशर्ों, विश्वास, आस्था तथा मूल्यों के लिए सीना तान कर उठ खड़े होने का साहस है. बेन किंसले (गाँधी फिल्म में गाँधी की भूमिका करने वाले) मँजे हुए कलाकार हैं. उन्होंने इस यहूदी की भूमिका बखूबी निभाई है. मगर पूरी फिल्म में नीसन ने बाजी मारी है. असली ऑस्कर की भाँति ही यहाँ भी उसकी शुरुआत औरत, पैसे और पावर के पीछे भागने वाले व्यक्ति के रूप में होती है लेकिन फिल्म के अंत में वह एक दूसरा व्यक्ति नजर आता है. वह ज्यादा मानवीय हो गया है. साथ ही मानवीयता का मूल्य चुकाते हुए भी उसे दिखाया गया है, जिसके पास एक अँगूठी के अलावा अपना कहने को बहुत कुछ नहीं है. मगर यथार्थ जीवन में ऑस्कर शिंडलर का दिवाला निकल गया था और 1974 में मरते समय तक वह पियक्कड़ के रूप में बरबाद हो चुका था. स्पीयलबर्ग ने बहुत तरह-तरह की और बहुत सारी फिल्में बनाई हैं. जब भी उनकी फिल्मों की चर्चा होगी शिंडलर्स लिस्ट की बात अवश्य होगी. यह 1993 की सर्वोत्तम फिल्म थी जिसे उस साल का सर्वोत्तम पिक्चर, सर्वोत्तम निर्देशक, सर्वोत्तम एडॉप्टेड स्क्रीनप्ले, सर्वोत्तम आर्ट निर्देशन, तथा सर्वोत्तम एडीटिंग, सर्वोत्तम मौलिक संगीत के लिए पुरस्कार प्राप्त हुए. और तमाम अन्य श्रेणियों में इसे पुरस्करों के लिए नामांकित किया गया.

शिंडलर्स लिस्ट के पहले और बाद में होलोकास्ट को विषय बना कर बहुत सारी फिल्में बनी. इस पर नरेटिव और डॉक्यूमेंट्री दोनों तरह की फिल्में बनीं. पिछली सदी के चौथे दशक से ही यूरोप में होलोकास्ट पर फिल्में बनने लगीं. यूरोप, अमेरिका में इस विषय पर अब तक बहुत सारी फिल्में बन चुकी हैं और आगे भी यह सिलसिला थमने वाला नहीं है. ऑर्सन वेल्स की ‘द स्ट्रेंजर’ किर्क डगलस को नायक के रूप में प्रस्तुत करती है. ‘द जगलर’, ‘डायरी ऑफ एन फ्रैंक’ (अएन फ्रैंक की डायरी पर कई बार फिल्में बनीं), लियोन यूरिस के उपन्यास पर आधारित ‘एक्जोडस’ (फिल्म जो कभी सामान्य दर्शकों के लिए रिलीज न हो सकी), ‘द डे द क्राउन क्राइड’, एलेन जे. पकुला की ‘सोफीज च्वाइस’, एलान जॉनसन की ‘टू बी ओर नोट टू बी’, मार्क हरमन की ‘द बॉय इन द र्स्ट्राइप्ड पजामास’, एडवर्ड ज्विग का ‘डिफाएंस’, स्टीफन डाल्ड्राई की ‘द रीडर’, के अलावा इस विषय पर ‘लाइफ इज ब्यूटिफुल’, ‘सनशाइन’, ‘द पियानिस्ट’ आदि कुछ प्रसिद्घ फिल्में हैं.

स्पीयलबर्ग चाहते थे कि शिंडॅलर्स लिस्ट का निर्देशन रोमन पोलांस्की करें मगर पोलांस्की ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. कारण था कि वे होलोकास्ट के भुक्तभोगी हैं. उनका अनुभव कहता है कि होलोकास्ट से जो बच रहे वे भाग्य और संयोग के फलस्वरूप बच रहे, ऑस्कर जैसे लोगों के महत्व पर वे ज्यादा बल नहीं देते हैं. रोमन पोलांस्की की माँ यातना शिविर में गैस चेम्बर में मारी गई थीं. यह हादसा उनके लिए इतना कष्ठप्रद है कि उनकी अपनी मृत्यु के साथ ही इसका पटाक्षेप होगा. स्वयं वे एक बालक के रूप में अपने पिता की होशियारी से बचे. पिता ने उन्हें नात्सी सैनिकों की आँख बचा कर शिविर के कंटीले तारों के पार ढ़केल दिया था. निरीह, भयभीत, एकाकी बालक बहुत समय तक क्रोकावा और वार्सा में भटकता रहा. अनजान लोगों की दया के फलस्वरूप वह जीवित बच रह पाया. अतः जब उन्हें इसी तरह के एक अन्य व्यक्ति के जीवन पर फिल्म बनाने का अवसर मिला तो उन्होंने ‘द पियानिस्ट’ फिल्म बनाई. ‘द पियानिस्ट’ कहने से इस फिल्म का सही महत्व, इसकी वास्तविक गहराई का भान नहीं होता है. यह फिल्म भी एक वास्तविक जीवनानुभवों पर आधारित है. 1939 में पोलैंड का एक महान पियानोवादक जर्मनी द्वारा अधिकृत वार्सा में सारे समय अकेला जीता है. वह एक संयमी, निर्लिप्त व्यक्ति है जो मात्र भाग्य से बचा रहता है. यह फिल्म व्लैडीस्लाव स्पीलमैन के संस्मरण पर आधारित है. जब पहली बार वार्सा पर बम वर्षा होती है वह रेडिओ स्टेशन पर चोपिन बजा रहा था. उसका समृद्घ परिवार सुरक्षा की दृष्ठि से वहाँ से निकला जाना चाहते हैं. मगर वह कहता है, ‘‘वह कहीं नहीं जा रहा है.’’ उसे विश्वास है कि शीघ्र ही नात्सी अत्याचार समाप्त होगा और सब कुछ सामान्य हो जाएगा. मगर दर्शक बेबस देखता रहता है और नात्सी शिकंजा यहूदियों पर कसता चला जाता है. वार्सा के यहूदियों को शहर छोड़ कर घेटो में सिमटना पड़ता है. ईटों की चिनाई का दृश्य भुलाए नहीं भूलता है. नात्सी नियमों को लागू करने के लिए यहूदियों की पुलिस को बाध्य किया जाता है. एक मित्र की सहायता से स्पीलमैन जिसे यातना शिविर के लिए ट्रेन में चढ़ना था, बच निकलता है.

इसके बाद पियानोवादक स्पीलमैन (फिल्म में यह किरदार एड्रियन ब्रोडी ने निभाया है) पोल प्रतिरोध दस्ते के लोगों की सहायता से कैसे जीवित रहता है, फिल्म यह कहानी विस्तार से दिखाती है. चाक्षुष रूप से यह फिल्म हमें स्तम्भित करती है. नायक का विश्वास है कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. इस बात का विश्वास वह दूसरों को भी बराबर देता है. मगर उसका यह विश्वास किसी सूचना पर आधारित नहीं है. न ही उसे आशावादी दिखाया गया है. उसका एक सहज विश्वास है कि जैसे वह पियानो बजाता है वैसा कोई भी बजाएगा उसके साथ सब ठीक होगा. सेट डिजाइनिंग वार्सा में एकाकी पियानोवदक को ऐसे स्थान पर स्थापित करती है जहाँ से वह पियानो पर बैठा अपनी ऊँ ची खिड़की से बाहर के सारे क्रिया कलाप देखता है. वह सुरक्षित है मगर भूखा, बीमार, एकाकी और भयभीत है. विडम्बना यह है कि बाद में वह एक ऐसे स्थान में शरण लेता है जहाँ एक पियानो है मगर वह उसे बजाने का साहस कैसे करे ? फिल्म के अंत में स्पीलमैन कैसे बचता है ? कौन उस पर दया करता है ? उसके बच निकलने में पियानो की क्या भूमिका है ? यह देखने की चीज है, मात्र पढ़ने की बात नहीं. क्योंकि पोलांस्की ने जिस बेहतरीन तरीके से इस अंतिम दृश्य को फिल्माया है वह फिल्म इतिहास में दर्ज करने योग्य है. अक्सर होलोकास्ट की फिल्में दिखाती है कि जो इससे बच रहे वे अपने साहस से बचे. वे बहादुर थे. मगर पोलांस्की दिखाते हैं कि सब बहादुर नहीं थे. सब बहादुर नहीं हो सकते थे. फिर भी वे बच निकले. कई समीक्षक उनके इस नजरिए से सहमत नहीं हैं, उन्हें लगता है कि फिल्म बहुत ज्यादा उदासीन है. उसमें उकसाने, आग्रह करने की कमी है. पियानोवादक हीरो या जुझारू, लड़ाकू नहीं था फिर भी बच निकला. वह अपना जीवन बचाने के लिए जो कर सकता था उसने किया. मगर वह नहीं बचता यदि उसका सौभाग्य और कुछ अन्य गैर यहूदी लोगों की दया और सहायता उसे न मिलती. पूरी फिल्म में पियानोवादक मात्र एक दर्शक, एक साक्षी रहता है, जो वहाँ था. जिसने सब कुछ अपनी आँखों से देखा और उसे स्मरण रखा. बाद में शब्दों में पिरोया. नात्सी समाप्ति पर युद्घोपरांत स्पीलमैन वार्सा में रह कर पियानो बजाता है. यह आत्मकथा युद्घ समाप्ति के तत्काल बाद प्रकाशित हुई थी. मगर इसमें कुछ यहूदियों को गलत और एक जर्मन को दयालु चित्रित किया गया है अतः कम्युनिस्ट अधिकारियों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था. बाद में 1990 के आसपास यह पुनः प्रकाशित हुई, जिसने पोलांस्की का ध्यान आकर्षित किया और उन्होंने इसे अपनी फिल्म का विषय बनाया.

‘शिंडॅलर्स लिस्ट’ और ‘द पियानिस्ट’ दोनों होलोकास्ट पर आधारित फिल्में हैं. मगर दोनों के अप्रोच में फर्क है. ऑस्कर के जटिल व्यक्तित्व में आए परिवर्तन पर शिंडलर्स लिस्ट का ध्यान केंद्रित है. जबकि पियानिस्ट का नायक अपने भीतर के अपराध बोध से लड़ते हुए जीवित है, जो उसे जिजीविषा प्रदान करता है. उसमें जीवन की आदिम इच्छा है. पोलांस्की नात्सी अत्याचार को बड़ी सूक्ष्मता औए कुशलता से पर्दे पर उतारते हैं कहीं भी वे उसे हल्का करके नहीं दिखाते हैं. अभिनेता ब्रोडी की संभावनाओं और प्रतिभा का इस फिल्म मे पूरा-पूरा उपयोग हुआ है. उसका चुनाव इस भूमिका के लिए सटीक है. उसकी लम्बी अँगुलियाँ, उसके चेहरे और आँखों का भाव सब मिलकर फिल्म को दर्शक के लिए अनुभव नहीं, एक अनुभूति बना देते हैं. क्योंकि वह वर्बल से ज्यादा नॉन वर्बल तरीके से अपना कथ्य सम्प्रेषित करने में सक्षम है. भाषिक रूप से नहीं, अपनी शारीरिक मुद्राओं और चेहरे की रेखाओं तथा आँखों के भाव से पूरी फिल्म को सम्प्रेषित करता है.

रोनाल्ड हारवुड ने आत्मकथा से द पियानिस्ट का स्क्रीन प्ले तैयार किया है और पोलांस्की ने पुस्तक के प्रति ईमानदारी बरतते हुए अपने अनुभवों को भी फिल्म में पिरोया है. इस फिल्म की गुणवत्ता का पता मेरे एक अनुभव से पाठकों को लग सकता है (जिन्होंने स्वयं यह फिल्म नहीं देखी है). मैंने यह फिल्म कई बार देखी है और हर बार उसी तन्मयता से. एक बार यह हमारे शहर की फिल्म सोसायटी के द्वारा फिल्म महोत्सव में लाई गई. जिसकी मैं आजीवन सदस्य हूँ अतः अपने साथ एक अन्य दर्शक ले जाने की विशेष छूट मुझे प्राप्त है. मगर क्लास में मैंने इसकी कुछ ऐसी प्रशंसा की कि कई छात्र इसे देखना चाहते थे. हालँकि इनमें से कई छात्र गम्भीर फिल्मों से परिचित न थे. उन्होंने केवल हिन्दी की लोकप्रिय फिल्में देखी थीं. विदेशी फिल्में उन्होंने कभी नहीं देखी थी. भाषा की भी समस्या थी. मगर वे इसे देखने को उत्सुक थे. मैं भी उन्हें बेहतरीन फिल्मों का चस्का लगाना चाहती थी. नतीजन विशेष इंतजाम करके ये लोग मेरे साथ ‘द पियानिस्ट’ देखने पहुँचे. इन लोगों ने फिल्म देखी और फिल्म की समाप्ति पर भी ये सीट पर बैठे रहे. बाहर आकर भी सब चुप थे. काफी देर बाद एक ने कहा, ‘‘मैडम, मालूम नहीं था कि फिल्म ऐसी भी होती है.’’

यहीं पर आकर ‘शिंडलर्स लिस्ट’ मार खा जाती है और ‘पियानिस्ट’ बाजी मार ले जाती है. ‘शिंडलर्स लिस्ट’ फिल्म होलोकस्ट को होलोकस्ट नहीं रहने देती है. अगर होलोकास्ट पर कोई आधिकारिक फिल्म बनती है तो उसे फिल्म को देखने के बाद दर्शक के मन में भयंकर अविश्वास की भावना उठनी चाहिए, उसे स्तम्भित हो जाना चाहिए. उसे इस बात पर विश्वास करने में दिक्कत आनी चाहिए कि भला कोई इतना भी अमानुषिक कैसे हो सकता है. क्या मानव द्वारा मानव पर ऐसा अत्याचार संभव है ? मगर शिंडलर लिस्ट देखकर हाल से बाहर निकलने पर दर्शक मानवता का पक्का विश्वास लेकर निकलता है कि सदारचा-परोपकार जीवित है. उसे अच्छा लगता है कि मानवता जिन्दा है और जब तक मानवता जिन्दा है तब तक किस बात की चिंता ? उसे लगता है कि जब तक मानवता जिन्दा है अच्छाई की सदा जीत होती रहेगी. बुराई सदा हारती रहेगी. कि बुरी-से-बुरी परिस्थिति में भी लोग अपनी अच्छाई बनाए रखते हैं. क्या यही होलोकस्ट था ? क्या यही हुआ था होलोकास्ट में ? क्या यही उसकी सच्चाई है ? इस फिल्म को देखकर दर्शक राहत की सांस लेता है. मनुष्यता के प्रति आश्वस्त होकर हाल से बाहर निकलता है. होलोकास्ट पर बनने वाली अधिकाँश फिल्मों की कथावस्तु को कम करके (सबड्यू) दिखाया जाता है, ताकि दर्शक उसे आसानी से पचा सके. मगर वस्तविकता काफी जटिल और भयंकर है जिसे ‘द ग्र ज़ोन’ नामक फिल्म में दिखाया गया है. इसमें दर्शाया गया है कि अमानवीय परिस्थितियों में मृत्यु एक तरह की राहत है. यह बात इस फिल्म में एक किशोरी के माध्यम से दर्शाई गई है जब वह मारे जाने की पूरी विधि विस्तार से देखती है तो यह बात उसकी समझ में कौंध जाती है और वह भागना बल्कि तैरना शुरु कर देती है. परंतु तत्काल मारी जाती है यही वह चाहती भी थी. इसीलिए बिना एक शब्द बोले वह यह कदम उठाती है.

मगर सब लोग न तो यातना शिविर से छुटकारा पाने के लिए साहस के साथ भागे, न ही वहाँ रहते हुए मरे ही. वे जब वहाँ से निकले तब भी उनके मन में नात्सियों के लिए कोई कटुता न रही. नोबेल पुरस्कृत लेखक इमरे कर्टीज अपने ही आत्मकथात्मक उपन्यास ‘फेटलेस’ को के रूप में देखकर पूर्णरूपेण अभिभूत हैं. एक बालक के रूप में वे स्वयं यातना शिविर में थे. उनके उपन्यास पर बनी यह फिल्म यातना शिविर को एक बच्चे की नजर से देखती है. बच्चा जिसके पास वयस्कों की भाँति अनुभव नहीं हैं. इस फिल्म को 2005 में अनेकानेक पुरस्कार प्राप्त हुए. स्वयं कर्टीज ने इसका स्क्रीनप्ले लिखा है. बस में सफर कर रहे मात्र चौदह साल के बालक कोव्स और उसके दोस्तो को नात्सी सैनिकों ने गिरफ्तार किया. पहले उन्हें कस्टम हाउस में नजरबन्द रखा गया. उन्हें काम का आश्वासन दिया गया. उन्हें सच्चाई का कुछ पता नहीं था. बाद में उन्हें एक ईटभट्टे में रखा जाता है जहाँ हजारों यहूदी लाए जाते हैं. फिर यहूदी कौंसिल से बातचीत करके उन्हें एक ऑफर दिया जाता है कि वे स्वेच्छा से काम करने के लिए राजी हो जाएँ. उन्हें बताया जाता है कि अभी चलो नहीं तो बाद में जाने वाली ट्रेन में बहुत भीड़ हो जाएगी. ‘तब सच में सोचने के लिए बहुत गुंजाइश नहीं थी.’ और वे बच्चे तथा अन्य लोग ट्रेन में सवार हो जाते हैं. बालक यातना शिविर की रूटीन को अपना लेता है.

एक साल बाद जब कोव्स के लिए मुक्ति आती है वह बुचनवॉल्ड के बैरक अस्पताल में बीमर मरने के कगार पर था. अपने दोस्तों के समूह में बचने वाला वह एकमात्र व्यक्ति था. एक पीला, कंकाल. सूखे बूढ़े चेहरे वाला. जिसके रोम-रोम में घाव था. मगर जितने समय यह बालक यातना शिविर में था वह प्रत्येक नई परिस्थिति को जानने-समझने का प्रयास करता है और अपने बचने के लिए जो भी उपाय कर सकता था करता है. यहाँ तक कि दूसरे लोगों को मार दिए जाने पर भी यह सोच कर संतुष्ठ है कि अब इन मृत लोगों का राशन और कपड़े उसे मिल जाएँगे. यहाँ तक कि प्रारम्भ में वह नात्सी सैनिकों की कार्यकुशलता को आश्चर्य और प्रशंसा के भाव से देखता है. लेकिन कुछ दिनों के बाद उसे नजर आता है कि जो गार्ड हैं उनका रूप और शरीर-सौष्टव नहीं बिगड़ा है जबकि बाकी लोग इतने शक्तिहीन और बीमार हो गए हैं कि पहचाने नहीं जाते हैं.

विक्टर फ्रै न्कल यातना शिविर में व्यक्ति के अनुभवों के तीन चार्ण बताते हैं पहला जब वह वहाँ लाया जाता है. दूसरे चरण में वह वहाँ के वातावरण से अनुकूलन करके भोथरा हो जाता है और तीसरा चरण यदि वह बच रहा है वहाँ से निकल आया है तब प्रारम्भ होता है जिसमें पहले उसे अपने बचे रहने और मुक्ति का विश्वास नहीं होता है तब कुछ लोग अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं. कुछ लोग सोचते हैं कि घर पर परिवार जन उनकी प्रतिक्षा कर रहे हैं . यही भोली आशा उसे अब तक जीवित रखे हुए थी क्रूरता अत्याचार सहन करने की क्षमता दे रही थी. मगर घर लौट कर वह पाता है कि परिवार जन हैं ही नहीं वहाँ तो अजनबियों का निवास है. या हैं भी तो उसे समझ नहीं पाते हैं. उसे सामान्य जीवन में वापस लौटने में बहुत समय लगता है और वह कभी भी वास्तव में सामान्य नहीं हो पाता है. कुछ कटु हो जाते हैं और बह्त थोड़े से लोग कटुता भुला कर जीवन के सकारात्मक पक्ष को देखना प्रारम्भ करते हैं.

कोव्स को असली धक्का यातना शिविर से बाहर आने पर लगता है. क्योंकि जब वह अपने घर लौटता है तो वहाँ सब नए चेहरे हैं. आस-पड़ोस सब अजनबियों से भरा हुआ है, जिन्हें उसके किसी अनुभव पर विश्वास नहीं है. उसके सब परिचित या तो नात्सी हाथों होम हो गए हैं अथवा वह स्थान छोड़ कर कहीं और चले गए हैं. इस अजनबी माहौल से उसे यातना शिविर का वातावरण ज्यादा अपना लगता है. वह बार-बार उसे याद करता है. जहाँ सब कुछ जाना पहचाना हो गया था. बाहर निकल कर वह नहीं जानता है कहाँ जाए, कहाँ रहे और किससे स्वयं को जोड़े (रिलेट करे). इतनी नपी-तुली फिल्में कम ही बनती हैं और कम ही फिल्मों में शुरु से अंत तक इतनी सघनता कायम रह पाती है. हालाँकि यह निर्देशक लाजोस कोल्टाई की पहली फिल्म थी मगर उन्होंने अपने निर्देशन की रेंज इसमें प्रदर्शित की है. और कोव्स के लिए मार्सेल नागी का चुनाव बताता है कि नायक की शारीरिक बनावट और चेहरे के भाव कथानक को किस हद तक सम्प्रेषित कर सकते हैं. उसकी बड़ी-बड़ी आँखें और उनमें अभिव्यक्त अविश्वास जो कह जाता है वह लम्बे-लम्बे डॉयलॉग के द्वारा कभी संभव न होता. पूरी फिल्म का रंग ऐसा धूसर है जो जिन्दगी के इस पहलू की उजाड़ता को स्पष्ठ करता है. होलोकास्ट की आत्मा को स्पर्श करने वाली यह फिल्म दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों के द्वारा सराही गई.

मगर होलोकास्ट की भयानकता और गाम्भीर्य को क्या अपने नन्हें बच्चे को बताया-समझाया जा सकता है ? क्या कोई माता-पिता अपने चार साल के बच्चे को बता सकता है कि वे सब समाप्त होने वाले हैं शायद किसी का कलेजा इतना बड़ा और क्रूर नहीं होगा. इसी लिए ‘लाइफ इज़ ब्यूटिफुल’ में पिता गुइडो अपने चार वर्ष के बालक को कभी नहीं बताता है कि वास्तविकता क्या है. बल्कि वह बच्चे से कहता है कि हम एक खेल खेलने जा रहे हैं. जिसमें हमें पॉइन्ट जमा करने हैं और जब काफी संख्या में हम अंक जमा कर लेंगे तो हमारे पास एक टैंक होगा. खिलौना टैंक नहीं, सच का टैंक. एक समय का लटपटाने और लुजपुज ढँंग से बैयरागिरी करने वाला गुइडो एक खूबसूरत धनी स्त्री का मन अपनी ऊ टॅपटाँग हरकतों से जीत लेता है. स्त्री के मंगेतर और माता-पिता से विमुख होकर उससे विवाह करती है. दोनों का बेटा होता है जिसके चौथे जन्मदिन पर वे गिरफ्तार हो जाते हैं. फिल्म का पूर्वार्द्घ देख कर लगता है कि फिल्म स्लैपेस्टिक कॉमेडी है. मगर उत्तरार्द्घ होलोकास्ट की त्रासदी में बदल जाता है. दर्शक हँसता है, मगर उसके आँसू निकल आते हैं. और वह उदास होकर हॉल से निकलता है. कुछ समीक्षक इसे होलोकास्ट की कॉमेडी की संज्ञा देते हैं. फिल्म इतिहास नहीं होती है न ही जीवन की हू ब हू नकल. अतः अगर इस फिल्म को इस दृश्टि से देखा जाए कि मृत्यु की छाया में ऐसे भी जीया जा सकता है तो क्या हानि है ? क्या जिन्दगी सच में खूबसूरत नहीं है ? यह फिल्म हमें जिन्दगी का एक भिन्न नजरिया प्रदान करती है.

इटैलियन हास्य अभिनेता रोबर्टो बेनिग्नी शुरु में दर्शकों का मनोरंजन करता है. मगर बाद में अपने बेटे के मनोरंजन के लिए त्रासद परिस्थितियों में भी हँसी-मजाक करता है. तमाशे दिखाता है. वह बनावटी कोशिश करता है और यह दिखाने का प्रयास करता है कि यह सब एक खेल है और इसी खेल के द्वारा वह अपने बच्चे को सुरक्षा प्रदान करता है. उसकी जान बचाने में सफल होता है. बालक अपने पिता के आधिकारिक अभिनय और अपनी मासूमियत के कारण अपने आसपास की क्रूरता और भयावहता पर कोई शक नहीं करता है. न ही कोई प्रश्न पूछता है. वह खेल में मस्त रहता है. हालाँकि पिता आहूति चढ़ जाता है. बच्चे को पता ही नहीं चलता है कि उसके पिता को नात्सी सैनिकों ने गोली मर दी है. मगर संयोग से उसी समय अमेरिकन टैंक आते हैं. बच्चा सोचता है कि वह खेल जीत गया है. बाद में वह अपनी माँ से मिलता है और बरसों बाद उसे अपने पिता की कुर्बानी की बात पता चलता है. फिल्म में वह बाद में अपनी कहानी कह रहा है, दिखा रहा है. मासूम प्यारे बच्चे के रूप में गिओगिओ कांटारिनी का अभिनय मनमोहक है. बेनिग्नी की पत्नी डोरा की भूमिका निकोलेटा ब्रास्ची ने बहुत शानदार तरीके से की है. इटली में बनी यह फिल्म इटैलियन, जर्मन, स्पैनिश तथा अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है.

लाइफ इस ब्यूटीफुल की भाँति ही होलोकस्ट पर काफी काल्पनिक साहित्य रचा गया है और इस तरह की कई फिल्में भी बनी हैं, जिनमें होलोकास्ट की भयंकर घटना से अपने-अपने तरीके से निपटने की बात की गई है. इतिहास को धता बता कर मनचाहे (विशफुल थिंकिंग) ढंग से प्रस्तुत किया गया है. ऐसी ही परिकल्पना की एक उड़ान है ‘इनग्लोरियस बास्टर्ड’. 2009 में बनी

इस फिल्म में उसकी सेना के सारे उसके प्रमुख व्यक्तियों के साथ हिटलर को ही एक थियेटर में जला कर मार डाला जाता है. पूरी फिल्म गहनता से आगे बढ़ती है प्रथम दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक परदे से निगाहें नहीं हटती हैं. अंतिम दृश्य अविश्वसनीय होने पर भी दर्शक राहत की सांस लेता है. उसे एक तरह की प्रसन्नता, एक तरह की तुष्ठि मिलती है. ऐसे नरपिशाच का ऐसा ही अंत होना चाहिए था. क्वेंटिन टारांटीनों (‘किल बिल’ भाग एक तथा दो, ‘डेथ प्रूफ’ के निर्देशक) ने पूरी फिल्म पाँच अध्याय में बाँट कर प्रस्तुत की है. ब्रैड पिट के प्रशंसकों की कमी नहीं है उन्हें यह फिल्म जरूर अच्छी लगेगी. नायिका सुसेना के रूप में मेलानी लौरेन्ट से ज्यादा सुन्दर अभिनेत्री की कल्पना नहीं हो सकती है. फिल्म फोटोग्राफी, अभिनय, सेट्स, आउटडोर और इनडोर दोनों स्थानों की बेहतरीन शूटिंग, कैमरा एंगल्स, रंगों और कोस्ट्यूम्स के चुनाव, एडिटिंग सब दृष्ठि से एक बेहतरीन फिल्म है. मगर दर्शक इतिहास से परिचित है अतः यम मात्र मनोरंजन की फिल्म सिद्घ होती है हाँ मन में कहीं यह अभिलाषा जन्म लेती है कि काश इतिहास इसी तरह होता. काश हिटलर को इसी तरह जला कर समाप्त कर दिया गया होता. हाँ इस फिल्म को देखने समझने के लिए दर्शक का बहुभाषीय होना आवश्यक है क्योंकि फिल्म धड़ल्ले से जर्मन, फ्रैंच, इटॅइलियन भाषा का प्रयोग करती है वैसे सबटाइटिल्स संग में चलते हैं. इस फिल्म में दो प्लॉत साथ साथ चलते हैं एक में एक थियेटर की युवा मालकिन नात्सी प्रमुख को समाप्त करके लिए प्रयासरत है दूसरे में लेफ्टिनेंट आल्डो रायने (ब्रैड पिट) यहूदी मित्र सैनिक यही काम करने में जुटे हुए हैं कौन सफल होता है यह फिल्म देख कर पता करना होगा.

यथार्थ और थोड़ी कल्पना को मिलकर ‘डाउनफॉल’ तैयार हुई है. यह फिल्म हिटलर पर आधारित है असल में हिटलर पर उतनी नहीं जितनी उसके सहयोगियों उसके अनुयायियों पर आधारित है. जीवन की विडम्बना यह है कि हम अपनी युवावस्था में तमाम लोगों से जाने अनजाने प्रभावित हो जाते हैं हमारे अन्दर प्रौढ़ता, विचारों की परिपक्वता का अभाव होता है और हम गलत लोगों को अपना आदर्श मान बैठते हैं. बिना जाने समझे उनके उचित अनुचित सब कामों में हाथ बँटाने लगते हैं. युवावस्था में ऐसा ही कुछ नोबेल पुरस्कृत रचनाकार गुंटर ग्रास ने किया जिसकी स्वीकारोक्ति उन्होंने अभी हाल में की और जिसे लेकर साहित्य जगत में बहुत हंगमा मचा. इसी तरह एक स्त्री ट्राउडल युंग अपनी युवावस्था में हिटलर करीश्माई व्यक्तित्व से आकर्षित होकर उसके यहाँ काम करती रही. वह हिटलर से उत्सुकता के कारण जुड़ी किसी सैद्घांतिक आदर्श के तहत नहीं बाद में उसने मेलिसा मूलर के संग मिलकर अपना संस्मरण ‘अंटिल द फाइनला आवर : हिटलर्स लास्ट सेक्रेटरी’ लिखा. हिटलर पर इतिहासकार जोआशिम फेस्ट ने ‘इनसाइड हिटलर्स बंकर : द लास्ट डेज़ ऑफ द थर्ड रीच’ लिखा. इन्हीं दोनों किताबों से सामग्री लेकर निर्देशक ओलिवर हीर्सबिगल ने ‘डाउनफॉल’ बनाई है. यह फिल्म हिटलर को दिखाती है कि कैसे वह अंतिम भोजन करता है. आराम से हाथ पोंछता है और अत्महत्या के लिए चल देता है मगर जाते जाते अपने अनुयायियों को तमाम निर्देश देता जाता है. फिल्म में हिटलर और उसके महत्वपूर्ण लोगों के कारनामें हैं मगर वे कारनामें नहीं जो उन लोगों ने यहूदियों के साथ किए थे इसमें उनके वे कारनामें दर्ज हैं जो रूसी सेना के आ जाने, हिटलर के चारों ओर से घिर जाने पर किए जाते हैं. इस में सैल्यूलाइड पर उनके द्वारा की गई हत्याओं का चित्रण न होकर उनकी आत्महत्याओं का चित्रण है. हिटलर के लोग जिन्होंने बड़ी बेहरहमी से, बिना किसी क्रोध के लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया मात्र आदेश और कर्तव्य मान कर लोगों की क्रूरतम तरीके से जानें लीं यही लोग उतनी ही निर्लिप्तता से स्वयं को भी समाप्त करते हैं. इतना ही नहीं चेहरे पर कोई शिकन लाए बिना अपने छः-छः बच्चों को कडुवी दवा की तरह साइअनाइड गटकवा देते हैं. स्वयं भी क्रूरता कायरता से एक दूसरे को समाप्त करते हुए नष्ठ हो जाते हैं. कितने भावनाविहीन, संवेदनहीन लोग थे यह देखकर रीढ़ में सनसनी दौड़ जाती है. अपने बच्चों को कर्तव्य के रूप में मारते हुए माग्दा कोरीन हारफौश) का हाथ एक बार भी नहीं काँपता है न ही उसका पति जोसेफ गोबेल (उलरिच मैथेस) विचलित होता है. एक बार जब यह पक्का हो जाता है कि उनके बच्चे सदा के लिए सो चुके हैं तब फिर दोनों खुद को भी समाप्त कर लेते हैं. इन कोल्ड ब्लडेड मर्डर्स को देखना अपने आपमें एक दहला देने वाला अनुभव है. जब दर्शक फिल्म का अंत तक आते-आते हिटलर और उसके सहयोगियों की इस तरह की उत्तेजनाविहीन

आत्महत्याओं से सहानुभूति प्रकट करने के मूड में आने लगता है तभी फिल्म के अंत में भयंकर वाक्य और संख्या (पचास करोड़ युद्घ में मारे गए. साठ लाख यहूदियों का कत्लेआम हुआ) प्रदर्शित होती है जो हमें है नात्सियों के क्रूर, अमानुषिक अत्याचार की पुनः याद दिलाता देता है और हम दुःख हताशा और मानव द्वारा स्वयं अपने ऊ पर और दूसरों पर किए जानेवाले जघन्य अपराधों की स्मृति लिए काफी समय तक सोचने-विचारने को मजबूर हो जाते हैं. यह सोच कर आश्चर्य होता है कि मनुष्य पतन की कितनी अधम गहराइयों तक गिर सकता है.

अपने आसपास के लोगों की आसुरी प्रवृतियों तथा परिस्थितियों की विसंगति, भयावहता, वीभत्स विभीषिका को बच्चे असहायता के साथ भोगते रहते हैं निरीहि भाव से देखते रहते हैं. मगर गुंटर ग्रास का तीन वर्ष का बालक ऑस्कर अपने परिवेश के वयस्कों का दयनीय, छद्म व्यवहार सहन नहीं कर पाता है और विद्रोह के रूप में शारीरिक रूप से और न बढ़ने का पक्का निश्चय कर लेता है. मगर उसकी मानसिक उम्र बढ़ती रहती है उसके उसी तीसरे जन्मदिन पर उपहार स्वरूप उसकी माँ ने उसे एक टिन ड्रम खेलने के लिए दिया था. दिन रात गले में लटका वह टिन ड्रम उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाता है जब भी कोई ड्रम उससे अलग करने की चेष्ठा करता है अथवा ऑस्कर किसी बात से नाखुश होता है वह भयंकर रूप से चीखता है उसकी कानफाड़ू चीख में इतना दम है कि शीशे की वस्तुएँ चकनाचूर हो जाती हैं. जब परिस्थितियाँ उसके निअयंत्रण के बाहर हो जाती हैं वह अपना ड्रम निरंतर पागल की तरह पीटने लगता है. गुंटर ग्रास की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘टिन ड्रम’ दो भागों में है. परंतु इसके पहले भाग पर इसी नाम से 1979 में निर्देशक वोल्कर स्लोनडोर्फ ने फिल्म बनाई जो उस साल की बेहतरीन फिल्म कहलाई. निर्देशक ने फ्रैंज़ सिट्ज़ के साथ मिलकर इसका लेखन भी किया. फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जिन्हें बाल यौनिकता से जोड़ा गया और इसे काफी समय के लिए प्रतिबंधित भी किया गया था.

ऑस्कर अराजकतावादी, आत्मकेंद्रित है. अपने ओढ़े हुए बचपन, स्वनिर्मित कैद में से वह अपना दृष्ठिकोण अभिव्यक्त करता है. अपने चारों ओर के झूठ, फरेबभ्रष्ठाचार और क्रूरता का शिकार बने लोगों पर टिप्पणी करता है वह बहुत अशिष्ठ, मुँहफट, अश्लील औअर पड़पीड़क है. युद्घ काल और युद्घोपरांत का युग इसी तरह की विसंगतियों का युग रहा है खसकर यूरोप में. उसमें ऐसा होना स्वाभाविक है. यह दुनिया की भयावहता पर कटाक्ष है. एक असहाय व्यक्ति व्यंग्य तो कर ही सकता है चाहे इसके लिए उसे अपना बलिदान ही क्यों न देना पड़े. फ्रायड का कहना है कि जो काम विकृत व्यक्ति मजबूरन करते हैं और जिनसे बचने की कोशिश में लोग विक्षिप्त हो जते हैं वो सब काम एक मानवशिशु चाहता भी है और अपनी क्षमता के भीतर करता भी है. ऑस्कर हमारे युग की विडम्बनाओं की साकार प्रतिमा है. डेविड बेनेट ने ऑस्कर की भूमिका कमाल के आधिकरिक तरीके से की है.

फिल्म का प्रथम दृश्य जब ऑस्कर गर्भ में है और उसका जन्म होने वाला है. जन्म के समय प्रसव प्रक्रिया चल रही है वहीं से लोगों का व्यवहार ऑस्कर को नापसन्द होने लगता है लेकिन जब तक वह विरोध करना चाहता है वह दुनिया में आ चुका होता है. गर्भनाल काट दिया जाता है और तभी स्पष्ठ हो जाता है कि वह वापस जाएगा. वह जब पैदा होता है तभी उसका व्यक्तित्व पूर्णरूपेण विकसित है. अपने न बढ़ने को तार्किक बनाते हुए जब उसके जन्म दिन की पार्टी चल रही थी जहाँ ऑस्कर के अलावा सबको मजा आ रहा था और लोग पीकर धुत्त थे ऑस्कर सेलर की सीढ़ियों से गिरने का नाटक करता है जिससे उसके सिर में गूमड़ निकल आता है और सब मान लेते हैं कि उसकी बाढ़ इसी करण बाधित हो गई है. शूटिंग के दौरान डेविड बेनेट ग्यारह बारह सल का था मगर वह कहीं से भी तीन साल से बड़ा नहीं लगता है. पूरी फिल्म में उसकी आकृति नहीं बदलती है परंतु मानसिक उम्र बढ़ने के साथ साथ उसके व्यवहार, उसके मैनरिज्म, उसका व्यंग्य करने का लहजा, उसका आधिकरिक बर्ताव सब बदलता जाता है. पूरी फिल्म की कहानी ऑस्कर की जबानी कही गई है जब वह उम्र में बड़ा हो चुका है और अपने परिवार के अंतिम व्यक्ति के मरने के बाद पुनः शारीरिक रूप से बढ़ने के बाद विक्षिप्त व्यक्ति के रूप में मानसिक अस्पताल में है. टिन ड्रम जैसे विशाल और जटिल उपन्यास को पर्दे पर उतारना खतरे से खाली नहीं है मगर निर्देशक ने यह खतरा उठाया है और सफलतापूर्वक उठाया है. मगर यदि आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो फिल्म की बहुत सरी बातें आपके सिर के ऊपर से निकल जाएँगी. अतः नात्सी और उनके बाद के कल पर आक्षेप करती इस फिल्म को समझना हो इसका पूरा लुफ्त उठाना हो तो उपन्यास पढ़ना लाजमी है.

किसी व्यक्ति के व्यवहार को तब तक पूरी तरह नहीं समझा जा सकता जब तक अतीत में उसके अनुभवों की जानकारी न हो. 1947 में एक दक्षिण अमेरिकी युवा स्टिन्गो (पीटर मैक्निकोल) लेखक बनने की अभिलाषा पाले ब्रूकलिन आता है. वह एक बोर्डिंगहाउस में ठहरता है. वहीं केमिस्ट्री में शोध कर रहा नाथन लैन्डाऊ (केविन क्लीन) और उसकी पॉलिश शरणार्थी गर्लफ्रेंड सोफी ज़ाविस्टोवस्का (मेरिल स्टीप) रह रही है. स्टिन्गो उनसे दोस्ती करता है. अनुभवहीन स्टिन्गो के मन में प्रेम, मृत्यु, भय इत्यादि को लेकर तरह तरह के काल्पनिक और बचकाने भाव हैं. वह लेखक के रूप में आत्ममुग्ध है. नाथन और सोफी के आपसी प्रेम संबंध को लेकर चकित और उत्साहित है. इसके साथ ही वह सोफी की ओर आकर्षित भी है, जो बहुत स्वाभाविक है. जल्द ही वह देखता है कि सोफी और नाथन के स्ंाबंध में कुछ असामान्य है. नाथन का मूड पल-पल बदलता रहता है. उसे शक है कि सोफी उसके प्रति वफादार नहीं है और वह इस बात को लेकर जब तब आक्रमक हो उठता है. स्टिन्गो यह भी अनुभव करता है कि सोफी कोई रहस्य छिपाए हुए है.

जो आँखों से दीखता है, वही सच नहीं होता है. सच्चाई के कई रंग और कई रूप होते हैं. सोफी और नाथन की सच्चाई बहुत जटिल और कटु है. नाथन ने अतीत में भूख से मरती सोफी को बचाया था. नाथन का कहना है कि उसकी शोध के फलस्वरूप एक दिन दुनिया में तहलका मचेगा और उसे नोबेल पुरस्कार मिलेगा. असल में नाथन एक असंतुलित मस्तिष्क का व्यक्ति है, और उसकी केमिस्ट्री में शोध का हव्वा मात्र एक बकवास है.

एक दिन नाथन के आक्रमक व्यवहार से परेशान सोफी और स्टिन्गो एक होटल में पनाह लेते हैं वहाँ वे दोनों शारीरिक संबंध कयम करते हैं यहीं उसे ज्ञात होता है कि सोफी शादीशुदा थी. उसका पिता नात्सियों से सहानुभूति रखता था और उसके पिता और पति की हत्या हो चुकी है. सोफी का एक प्रेमी जोसेफ था जो अपनी सौतेली बहन वान्डा (कार्लहेंज़ हैकल) के संग रहता था. वान्डा सोफी को गेस्टॉपो के कागजात अनुवाद करने के लिए कहती है जिससे सोफी इंकार कर देती है. उसे भय है कि इससे उसके बच्चों जान (जोसेफ लिओन) तथा एवा (जेनिफर लॉन) को खतरा होगा. इंकार करने के बावजूद सोफी नात्सी सैनिकों द्वरा गिरफ्तार कर ली जाती है. ऑस में उसे चुनाव करने को कहा जाता है कि कह अपने बेटे को बचाना चाहती है अथवा बेटी को बचाएगी. एक माँ के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा जाता है अंततः वह बेटे को बचाती है जिसे बच्चों के यातना शिविर में भेज दिया जाता है एवा के लिए मौत क्रेमैटोरियम नम्बर दो में इंतजार कर अर्ही है. यही सोफी का विकल्प है यही उसका चुनाव है और इसे से फिल्म को अपना नाम मिला है जो विलियम स्टीरॉन के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है. स्टिन्गो कल्पना की उड़ान से यथार्थ के धरातल पर उतरता है. यह अनुभवहीन एक युवा के वयस्क होने, प्रौढ़ होने (कमिंग ऑफ एज़) की कहानी भी है.

अधिकाँश फिल्म फ्लैशबैक में चलती है. सोफी बोर्डिंगहाउस लौट आती है मगर सोफी तथा नाथन सायनाइड खाकर आत्महत्या कर लेते हैं स्टिन्गो वापस दक्षिण लौट कर एक उपन्यासकार बनता है.

सोफी के रूप में मेरिल स्टीप का अभिनय उन्हें सर्वोत्तम अभिनेत्री का पुरस्कार दिलाने में कामयाब रहा. अपनी अन्य फिल्मों की अपेक्षा सोफीज़ च्वॉयस में उन्हें विभिन्न भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर मिला. शायद ही कोई ऐसी भावना है जिसका अभिनय उसे इस फिल्म में न करना पड़ा हो. कोई मानवीय संवेदना उससे छूटी नहीं है. उसके अभिनव का फैलाव क्षेत्र इतना विस्तृत है कि भावनाओं की हर छटा, हर रंग को नैसर्गिक रूप में अभिव्यक्त करने में सफल रही है. पूरी फिल्म की गरिमा उसके स्वाभाविक अभिनय से बढ़ गई है. ब्यॉयफ्रेंड नाथन के रूप में केविन का अभिनय काबिले तारीफ है क्योंकि वह एक जटिल चरित्र है. फिल्म का कथानक इतना नाजुक है कि किसी सामान्य निर्देशक के हाथ में पड़ कर इसका कबाड़ा हो सकता था परंतु एलान जे. पाकुला के सधे हाथों में उपन्यास सुरक्षित रहा और होलोकास्ट की पृष्टभूमि पर एक बेहतरीन फिल्म बनी.

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- विजय शर्मा 151 न्यू बाराद्वारी, जमशेदपुर 831 001

ई मेल —

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रचनाकार: विजय शर्मा का आलेख : होलोकास्ट एवं सिनेमाः परदे पर मनुष्य की त्रासदी
विजय शर्मा का आलेख : होलोकास्ट एवं सिनेमाः परदे पर मनुष्य की त्रासदी
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