बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

बरसाने लाल चतुर्वेदी की हास्य व्यंग्य रचनाएँ

दहेज

मेरे परौसी बजरबट्टू को ब्याह भयो,

बहू घर से लैकें आई ढेर भरी “डाउरी”।

सोफा लाई, कार लाई, पचास तोले सोनो लाई,

घर के सब बोले बधाये बजवाउरी।

फैन लाई, पलंग लाई, फ्रिज और साड़ी लाई,

तोऊ सब कहते वासे और लाऊ-लाउरी।

छोरी को डैडी फिर लैके पुलिस आयो,

भीतर सब भये अब बैठे गीत गाउरी।।

--

दहेज (2)

जा दिन ते घर की देहरी पै बहू पाँय धरे,

ससुर पछारो सास नोच-नोच खाई है।

पलका पै बैठी बैठी हुकुम चलात रहे,

दूर ते लखात मानो कालका की माई है।

बालम ते कहै पिवाय चाय करके मोय,

भयभीत जेठ कहे पूतना की जाई है।

नित्य के कलेसन लखि बोले परौसी सब,

पिटनो ही परैगो ये दहेज भौत लाई है।।

--

दोहावली

अफसर करे न अफसरी, फाइल करे न ‘वर्क’।

दास मलूका कहि गए, सब कुछ करता क्लर्क।।

 

छापा जब घर में परयो, पापा आए याद।

तस्करि करिबे पिय गये, हम हवे गये बरबाद।।

 

वोटर नेता सौं कहे, झांसौ मत दे मोई।

दिन चुनाव के आन दे मैं देखूंगो तोई।।

 

मक्खन खूब लगाइकै, देखि लेउ किन कोय।

पी.ए. बस करिबो कहा, मंत्रि बस में होइ।।

 

अखबारन ऐसी करी, दुश्मन हू न कराइ।

तस्कर हू अब जेल में, हँसि-हँसि के बतराइ।।

 

डिग्री लै लै जग मुआ, तत्व न निकसा कोय।

तस्करि-विद्या सीख कै, शीघ्र लखपती होय।।

 

होत सिफारिश तें सबै, विद्या से कछु नाहिं।

राई सौं परबत करै, ‘एवरेस्ट’ पहुँचाहि।।

 

करि सोसायटी कोठरी, नियमन पलंग बिछाय।

मित्रन के संग बैठिके, भूमि हड़प करि जाय।।

 

कथनी करनी एक जिमि, लैके जो दे देत।

वे नर ऐसे जायेंगे, मूरी को सौ खेत।।

 

रूखी सूखी खाइकैं, ठंडौ पानी पीव।

कार मिनिस्टर देखिकैं, मत ललचावै जीव।।

 

मंत्रि सुतहिं पढ़ावहीं, मूर्ख बनाइबो सीख।

मम कुल यही स्वभाव है, नहिं मांगोगे भीख।।

 

‘मम्मी’ तो बरफी भई, पिता भये बब्बूल।

‘डैडी’ जो नहिं कहि सकत, वे रहे ‘फूल’ के ‘फूल’।।

--

हास्य व्यंग्य कविता संग्रह - आधुनिक सुदामा से साभार.

रचनाकार – डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी

प्रकाशक – राम प्रसाद एंड संस, आगरा.

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  1. रवि रतलामी जी, विशिष्ठ प्रतिभा के धनी हमारे मथुरा के स्व श्री बरसाने लाल जी बैठे बैठे ही लोगों को हँसा देते थे| हमारे गुरु जी श्री प्रीतम जी के पास अक्सर आते थे, गुरुजी और इन की ठिठोलियाँ बहुत ही आनंद दायक होती थीं|

    कुल जमा एक बार इन के साथ मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत विद्यालय में काव्य पाठ का अवसर मिला था, तब उन से मिला आशीर्वाद आज मुझे सहसा याद हो आया|

    कई साल बाद आज फिर से उन्हें पढ़ने को अवसर उपलब्ध कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद|

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