बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - मेरे मोहल्लेवालों का व्रत

हिंदुस्तान में व्रत रखने की बहुत ही प्राचीन परम्परा है। और हिन्दुस्तानी परम्परा को बनाये रखना जानते हैं। किसी भी रूप में ही सही। यह इनकी अनेकों खासियतों में से एक है। पहले हमारे ऋषि-मुनि व पूर्वज व्रत रखा करते थे। आज भी व्रत रखा ही जाता है। एक नहीं अनेकों लोग रखते हैं। रखने को तो आज के लोग बहुत कुछ रखते हैं। जो रखना होता है उसे भी और जो नहीं रखना होता है उसे भी। कुछ लोग तो जो या जिसे रखना होता है उसे रखते ही नहीं। और जो या जिसे नहीं रखना चाहिए, रख लेते हैं, रखते हैं और कुछ तो रखके घूमते हैं। खैर यहाँ व्रत रखने की चर्चा की जा रही है।

इस समय तो नवरात्रि का पावन पर्व चल ही रहा है। वैसे भी हर हफ्ते लोग कोई न कोई व्रत रख ही लेते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं। जो कहते हैं कि व्रत स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। इसलिए हर हफ्ते कम से कम एक उपवास कर ही लेना चाहिए। और यही उपवास किसी विशेष दिन कर लो तो व्रत हो जाता है। यानी एक पंथ दो काज। इन्हीं में से कुछ ज्ञानी कहते हैं कि इस समय व्रत रखने के कई लाभ हैं। यह बात विज्ञानी सिद्ध कर चुके हैं। जबकि कौन और कहाँ के विज्ञानी और कैसे तथा कब सिद्ध किया ? यह उन्हें तो क्या उनके बाप को भी नहीं मालुम है। फिर भी उनका कहना है कि इसलिए ही नवरात्रि में व्रत रखा जाता है। खैर आज, आज के ज्ञानियों का ही बोलबाला है। उन्हें ही लोग माला पहनाते हैं। जय-जयकार करते हैं।

मेरे मोहल्ले में बहुत से लोग व्रत रखते हैं। यह तो खुशी की ही नहीं बल्कि गर्व की बात है। दीगर है कि बहुत से लोग बिना कोई व्रत लिए ही व्रत रखते हैं। वैसे व्रत रखने के लिए कई चीजों का व्रत लेना पड़ता है। जैसे अन्न न ग्रहण करने का व्रत। संयमित दिनचर्या का व्रत, आदि । आराध्य-आराधना भी व्रत का एक प्रमुख अंग होता ही है। कुछ भी हो व्रत रखने वालों में मेरे मोहल्लेवालों और वालियों का कोई जोड़ नहीं है। आजकल मेरे मोहल्ले में व्रत की धूम है। विज्ञापन कराने में पैसा लगता है। नहीं तो कुछ लोग इस बात का विज्ञापन करा देते कि वे व्रत रख रहे हैं। यह नहीं कर पाते तो अगल-बगल वालों को, मिलने-जुलने वालों को बता-बता कर आत्म संतुष्टि करते हैं। दूर वालों को फोन से सूचित करने में भी नहीं पिछड़ते। आज एक लोग बताने लगे कि मैं व्रत रख रहा हूँ और वो भी पूरे नव दिन का। मैंने उन्हें याद दिलाया कि मुझे आप पहले ही दो बार बता चुके हैं।

मेरे एक पड़ोसी हैं जो व्रत नहीं रखते। लेकिन इनकी श्रीमतीजी नवों दिन का व्रत रख रही हैं। इनका कहना है कि अब नव दिन मुझे खिचड़ी खाकर ही बिताना है। कहते हैं कि किसी दिन खिचड़ी या तहरी बन जाय तो मुझे समझते देर नहीं लगती कि आज श्रीमतीजी का कोई न कोई व्रत जरूर है। इन्हें कौन समझाये कि कमसे कम खिचड़ी ही सही बना-बनाया तो मिल जाता है। खुद बनाना पड़े तो शायद खिचड़ी भी भारी पड़े। पत्नी खुद भूखी रह कर भी खिचड़ी खिला देती है तो क्या कम है ?

बहुत से लोग जिनमें महिलाएं कुछ आगे ही रहती हैं, जब व्रत आरम्भ करना होता है, उसके एक दिन पूर्व बहुत अच्छी-अच्छी पकवान बनाती हैं। जब कल से उपवास ही करना है तो क्यों न आज ही आगामी दिनों का भी खबर ले लिया जाय। इनका मानना होता है कि आज ठीक से खा लो क्योंकि कल या कल से व्रत रखना है। मानो रोज ठीक से खाते ही नहीं। कुछ लोगों के तो इसी चक्कर में पलटी भी हो जाती है। कुछ का पेट खराब हो जाता है।

मेरे पड़ोसी के पास एक से एक खबर है। बता रहे थे कि तिवारीजी कहते हैं कि व्रत रखने का मतलब यह नहीं है कि अपनी काया जला डालो। इसलिए वे दिन भर व्रत रखते हैं और शाम को पूरी-सब्जी, दाल-भात, आदि दबा कर खाते हैं। मतलब अन्न से कोई परहेज नहीं और व्रत भी रख लेते हैं। तिवारी जी का कहना है कि अन्न से परहेज होता तो भगवान अन्न बनाते ही नहीं। रही बात व्रत की तो दिन में सिर्फ एक ही बार तो खाता हूँ। रात में कुछ भी नहीं। पता नहीं व्रत के पहले रात भर खाते रहते थे क्या ? खैर नव दिन का व्रत रखते हैं।

श्रीमती शर्मा, तिवारी जी की बहुत बुराई करती हैं। इनका कहना है कि भूखे नहीं रह सकते तो न रहें। लेकिन अन्न क्यों खाते हैं ? मैं तो अन्न को हाथ नहीं लगाती। सिंगाड़े का आटा लाती हूँ। उसी की पूड़ी और आलू-टमाटर की सब्जी बनाती हूँ। सेंधा नमक इस्तेमाल करती हूँ। बाकले की दाल और तिन्नी का चावल तथा चौराई का साग। यही सब खाकर व्रत रखती हूँ। लेकिन अन्न नहीं छूती हूँ। लेकिन भूखी रहने पर भी पेट खराब हो जाता है, अपच हो जाता है। इतने परहेज के बाद भी।

श्रीमती वर्मा जी के घर में उनकी देवरानी व्रत नहीं रखती। लेकिन इनके फलाहार का सारा इंतजाम करती है। दिन भर में कम से कम डेढ़ किलो दूध, दो दर्जन केला, दो किलो सेब, संतरा, अंगूर आदि तथा जूस और दही मिला चीनी का रस, मूंगफली, बादाम, छुहारा, किसमिस इत्यादि ऊपर से। कल दोनों में कुछ खटपट हो गयी। देवरानी किसी से बोली कि दीदी के फलाहार का इंतजाम करने जा रही हूँ। आधा घंटा कम से कम लग जाता है। इस पर वर्मा जी बोलीं कि भूखी न पियासी और फलाहार के लिए लबर-लबर किये रहती हैं। अब देवरानी की बारी थी बोली इतना सब खाकर व्रत रखना हो तो कौन नहीं रख लेगा ? मैं तो हंसी-खुशी महीनों रह जाऊं। सच है व्यवस्था और इतनी व्यवस्था हो तो कुछ लोग तो कई महीने तक व्रत रखने के लिए तैयार हो जायेंगे।

बहुत से लोग दर्शन के बहाने शहर निकल जाते हैं। और पार्कों आदि में घूम कर आनंद मनाते हैं। कुछ लोग तो सिनेमा देखकर व दिखाकर मनोरंजन करते हैं। एक महिला जो पूरे दिन घूम कर आई थी। सहेली से बता रही थी, शेर देखा हाथी देखा। अब तक तो ठीक था। सुनने वाले समझते थे कि दर्शन करके आई है। लेकिन आगे और सुनने पर पता चला कि वह चिड़ियाघर देख कर आई थी। खैर कुछ लोग कुछ भी देखने को और दिखाने को ही दर्शन बोलते हैं। आज का समय ही ऐसा है कि हर चीज की परिभाषा बदल रही है।

इतना ही नहीं बहुत से नवयुवक चुनरी सर पर बांध कर घूमते हैं। शायद अपने भक्त होने का तथा अपनी भक्ति का खुलेआम एलान करने का वीणा उठा चुके हैं। लेकिन सर पर चुनरी बंधी होने के बाद भी कुछ तो ताक-झाक करने और किसी लड़की को घूरने से बाज नहीं आते। मेले में मौका मिलने पर कुछ और कर गुजरने को तैयार रहते हैं। एक लड़का पंडित जी से हाथ में कलाई बांधने को कह रहा था। पंडित जी बोले कि हवन के समय, धुएं में सेंक कर बाँधना चाहिए। नहीं माना तो बांधने लगे। लड़का बोला कि यह जरा सा क्या बांध रहे हो। दिखाई ही नहीं पड़ेगी तो बाँधने से क्या फायदा होगा ? मेरा दोस्त तो इतना मोटा बांधकर घूमता है कि दूर से ही सबको दिख जाती है।

एक लोग किसी दूसरे के देवता को पूज कर आ रहे थे। और होने वाले लाभ को बढ़ा-चढ़ाकर गा रहे थे। तिवारी जी से भिड़ंत हो गयी। बोले तुम कलंक हो कलंक। ये महोदय बोले जहाँ लाभ होगा वहाँ जायेंगे। तिवारी जी बोले सच ही कहा है कि ‘घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध’। तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को छोड़कर इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे हो। घर की परोसी हुयी थाली को छोडकर इधर-उधर कौर-कौर के लिए कुत्ते की तरह घूम रहे हो कि कोई टुकड़ा फेंक देगा। तैंतीस करोड़ में से चुन लो किसी को। जरूरत है तो सिर्फ प्रेम, श्रद्धा और विश्वास की। रही बात लाभ की तो यह श्रद्धा और विश्वास से होता है। कमल के पंखुड़ियों में बसने का आनन्द एक भँवरा ही जान सकता है, गुबुरौला नहीं। जबतक वह मल की बास अपने मन में बसाये रहता है। कमल में भी उसे पहले वाली ही बास मिलेगी। मन की शुद्धता और प्रेम व विश्वास के बिना न कोई सिधि मिलती है और न ही कोई देवता खुश होकर कुछ देते हैं।

क्या बिडम्बना है कि पूजा-पाठ, व्रत, उपवास और दर्शन आदि भी दिखावे और मौज-मस्ती के लिए होने लगे हैं। गोस्वामीजी ने कहा है कि ‘प्रभु जानत सब बिनहि जनाए, कहौ कौन सिधि लोक रिझाये’। लेकिन आज सबसे बड़ी सिधि यही है। आम लोग तो क्या बड़े-बड़े साधु-महात्मा भी इसी सिधि को बड़ी सिद्ध मानते हैं। जिसको रिझाने के लिए सब कुछ किया जाना चाहिए। उस ओर ध्यान ही नहीं जा पाता। हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी के विकास के लिए अंग्रेजी में कसमें खाने वाली बात हो रही है। असल चीज प्रेम, विश्वास और त्याग ही नहीं है तो क्या मायने हैं इन चीजों का । भगवान प्रेम रुपी भोजन के भूखे होते हैं। छल, द्वेष और पाखंड के नहीं। निश्छल प्रेम, श्रद्धा और विश्वास भगवान को पत्थर में से भी प्रकट कर देता है-

‘‘प्रेम बदौ प्रहलादहिं को जो पाहन से परमेश्वर काढ़े”

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एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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1 blogger-facebook:

  1. विज्ञापन कराने में पैसा लगता है। नहीं तो कुछ लोग इस बात का विज्ञापन करा देते कि वे व्रत रख रहे हैं।---
    सही कहा आपने। आजकल दिखावा अधिक और कर्मभाव कम। अच्छा लगा व्यंग। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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