बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल – ख़ुदगरज़ तेरी मुहब्बत की हवा है

sanjay dani

ख़ुदगरज़ तेरी मुहब्बत की हवा है,
रोज़ जिसकी छत बदलने की सज़ा है।

सैकड़ों मशगूल हैं सजदे में तेरे,
तू जवानी के मजारों की ख़ुदा है।

मैं पुजारी ,इश्क़ के मंदिर का तेरा,
देवी दर्शन पर मुझे मिल ना सका है।

आंधियों के क़त्ल का ऐलान है अब,
सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है।

दिल के भीतर सैकड़ों दीवारें हैं अब,
रिश्तों का बाज़ार पैसों पर टिका है।

है ज़रूरी पैसा जीने के लिये पर,
इश्क़ का गुल्लक भरोसों से भरा है।

तुम भी तड़पोगी वफ़ा पाने किसी की,
एक हुस्ने-बेवफ़ा को बद्दुआ है।

सच्चा आशिक़ सब्र के सागर में रहता,
तू किनारों के हवस में मुब्तिला है।

आगे राहे-इश्क़ में बढना तभी ,गर
दानी कुरबानी का दिल में हौसला है।

6 blogger-facebook:

  1. dil ke bhitar saikaro diwaren hai ab
    rishto ka bazar paiso par tika hai
    bahoot sunder.badhai ho.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आंधियों के क़त्ल का ऐलान है अब,
    सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है।
    एक उम्दा ग़ज़ल का सबसे बेहतरीन शे‘र...बधाई डॉ. साहब।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है।
    इश्क़ का गुल्लक भरोसों से भरा है।

    संजय भाई ये मिसरे बहुत ही ताज़गी भरे लगे|
    पूरी की पूरी ग़ज़ल बार बार पढ़ने लायक है| बधाई क़ुबूल कीजिएगा|

    http://thalebaithe.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. आंधियों के क़त्ल का ऐलान है अब,
    सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है।

    दिल के भीतर सैकड़ों दीवारें हैं अब,
    रिश्तों का बाज़ार पैसों पर टिका है।

    गे राहे-इश्क़ में बढना तभी ,गर
    दानी कुरबानी का दिल में हौसला है।
    वाह बहुत खूब। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. विजय वर्मा जी ,महेन्द्र वर्मा जी नवीन सी चतुरवेदी जी और निर्मला कपिला जी को उनकी टिप्पणियों के लिये आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  6. दिल के भीतर सैकड़ों दीवारें हैं अब,
    रिश्तों का बाज़ार पैसों पर टिका है।
    rishton ki parchhaiyaan harsoo hai dekhi
    Aaj ka sooraj uge bin dhal chuka hai

    Daad ke saath

    उत्तर देंहटाएं

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