प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता – मत करना मनमानी

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prabhudayal (Custom)

हाथी दादा थे जंगल में सबसे वृद्ध सयाने

डरे नहीं वे कभी किसी से किये काम मनमाने।

 

आया मन‌ तो सूंड़ बढ़ाकर ऊँचा पेड़ गिराया

जिस पर चढ़ा हुआ था बंदर नीचे गिरकर आया।

 

कभी सूंड़ में पानी भरकर दर्जी पर फुर्राते

मुझको देदो शर्ट पजामे हुक्म रोज फरमाते।

 

तब पशुओं ने शेर चचा से करदी लिखित शिकायत‌

शेर चचा ने आनन फानन बुलवाई पंचायत।

 

पंचायत ने किया फैसला करता जो मनमानी

बंद करेंगे पाँच साल तक उसका हुक्का पानी।

 

माफी मांगी तब हाथी ने लिखकर किया निवेदन‌

आगे अब न होगी ऐसी गलती करता हूँ ऐसा प्रण।

 

तुमसे भी कहते हैं बच्चों मत करना मनमानी

बंद तुम्हारा किया जायेगा वरना हुक्का पानी।

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6 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता – मत करना मनमानी"

  1. प्रभु दयाल जी आप के कारण बचपन में लौटने का बहाना मिलता है| आप को और भाई रवि रतलामी को कोटि कोटि धन्यवाद जो आज के दौर में भी इस तरह से साहित्य को समर्पित हैं|

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  2. बच्चों की कविताएं गेय होनी ही चाहिए, आपका यह बालगीत इस कौटी पर खरा उतरता है।...सुंदर रचना के लिए बधाई।

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  3. .

    सुन्दर रचना। बाल गीत लिखने के लिए आपका विशेष आभार। !

    .

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  4. प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी की लेखनी को सलाम। आपकी यह कविता बच्चों के पाठ्यपुस्तकों में शामिल होने का माद्दा रखती है।

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  5. बेनामी4:56 pm

    sabhi prashanshakon ko dhanyawad
    prabhudayal shrivastava

    उत्तर देंहटाएं

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