सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

गोविंद सिंह असिवाल की पुस्तक समीक्षा – पी. दयाल श्रीवास्तव के बाल गीत संग्रह

समीक्षा
व्यंगकार पी दयाल श्रीवास्तव के
एक जोड़ी बाल गीत संग्रह

balgeet  (Custom)

समीक्षक .. गोविंद सिंह असिवाल
                                         2बी..विजय नगर लालघटी भोपाल
हर जिंदगी की बेहद हसीन आयु होती है बचपन। फिर तो चला गया तू लेकर मेरे जीवन की सबसे मस्त खुशी। [सुभद्रा कुमारी चौहान]बचपन की मुस्कानों से सैकड़ों किताबें भरी पड़ी हैं। उसका सौंदर्य उसकी बोली उसका अल्लहड़पन युगों युगों से साहित्यकारों की कल्पनाओं में नये नये आकार लेते रहे हैं।

हिंदी के वरिष्ठ व्यंग्यकार पी दयाल श्रीवास्तव[छिंदवाड़ा]के हाल में ही एक जोड़ी बाल गीत संग्रह प्रकाशित होकर आये हैं। नाम हैं "बचपन छलके छल छल छल” और " बचपन गीत सुनाता चल। " दोनों संग्रहों में 26 - 26 गीत हैं। प्रकाशक'बाल कल्याण एवं बाला साहित्य शॊध केन्द्र भोपाल हैं, मूल्य 50 - 50रुपये है।

हमारे देश में हमारे बचपन के तीन परिदृश्य स्पष्ट नजर आते हैं [1]उत्तम[गोल्डन स्पूनर [2]मध्यस्थ[3]विकृत। सामाजिक वर्गीय संरचना की प्रतिछाया[रिफ्लेकशन]बचपन पर भी है। प्रथम वर्ग सर्व सुविधा संपन्न वर्ग है। दूसरे परिश्रमी..प्रगतिशील हैं। तीसरे कुपोषण,गरीबी अभावों के शिकार हैं।

एक बार एक समाचार पढ़ा था जब एक वर्ग विशेष की महिलाओं का प्रसवकाल निकट आता है,तो कोई न कोई अपराध करतीं हैं ताकि प्रसव जेल में हो। सरकार के बालश्रम विरोधी कानून और सर्व शिक्षा अभियान उनके लिये बेमानी हैं। यहाँ तक कामन वेल्थ खेलों के खेल गाँव के निर्माण में भी बालश्रम के दाग मौजूद हैं। खुशी की बात यह है कि मेरे मित्र पी दयाल श्रीवास्तव के ये बालगीत किसी भी खांचे में नहीं रखे हैं। सिर्फ बाल गीत हैं,सर्वप्रिय विश्वव्यापी बालगीत। कोई भी पढ़कर गुनगुना सकता है।

बचपन की केलियों का लुत्फ उठा सकता है। वह शीत युद्ध का दौर था। एक अमेरिकी विद्वान सोवियत यूनियन से लौटा। किसी पत्रकार ने उससे पूछा"क्या सोवियत यूनियन में वर्ग हीन समाज स्थापित हो गया है?"उसका उत्तर था.."कौन कहता है रूस में विशिष्ट वर्ग नहीं है। वहां बच्चे हैं, सोवियत यूनियन में बच्चे विशिष्ट वर्ग हैं। यह मैंने भी अपनी इन दो छोटी छोटी काली काली आँखों से1987 में बुल्गारिया में देखा है। उसका लालन पालन शिक्षा स्वास्थ्य की पूरी जुम्मेवारी देश की थी इसलिये कुपोषण निरक्षरता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ हर बच्चा राजकुमार था, हर कन्या राजकुमारी थी। हो सकता है ये अंकुर दयालजी के मानस में रहे हों। वे इन पुस्तकों में इस प्रकार प्रस्फुटित हुये हैं।

"बच्चे हैं जीवन का सार/होते ईश्वर का अवतार.....। बच्चों को भगवान न समझे/वह सच्चा इंसान नहीं...बच्चे लगते वेद पुराण...। " बचपन छलके छल छल छल बच्चों की कल्पना का एक प्राकृतिक झरना लगता है। वही छल छल छल छलकता है बहता है। इस गीत संग्रह के हर गीत में सीख है। जो आम आदमी के जीवन ,समाज और भविष्य के लिये लाभकारी है। प्रबल बोध है। इन गीतों में कहीं कोई वर्ग विद्वेश नहीँ है। हर कविता में मनोवैग्यानिक पुट है,संदेश है,स्वचरित्र निर्माण की पद्धति है,परंपरा है।

यह सीख प्रात: की बेला से शुरू होती है.."बिस्तर को फटकारो रोज./चादर को झटकारो रोज" आम घरों में पीने के पानी का घड़ा जरूरी है। मटके के बचाव की सीख है..रहे छिपकुली दीवारों पर उनसे इसे बचाके रखना,गिर न जाये वह पानी में,ढक्कन जरा दबा के रखना"ऐसी सीखों से ओतप्रोत हैं"हम सबको है बहुत जरूरी धरती का पर्यावरण बचाना"अभी से बचपन को ताक़ीद दी है.."कल तक था बिल्कुल कंगाल/आज हो गया मालामाल.....ये है पक्का रिश्वतखोर ..। "आज का सबसे बड़ा खतरा आतंक है। कहते हैं.. जब चाहा आतंक मचाया/इनको कोई पकड़ न पाया। बम गिराया दस को मारा/हुये बाद में नौ दो ग्यारह। बाल साहित्यकारों एवं घरों के स्यानों की प्रचंड शिकायत है कि बच्चे टी. वी. से चिपके रहते हैं। कम्प्युटर पर खाना सोना पढ़ना सब भूल जाते हैं।

यह बचपन पर भारी वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक हमला है। उससे उनकी पढ़ाई ,सोच चिन्तन,और निर्णयकारी क्षमता का क्षरण हो रहा है। इस सबके बावजूद आज का बचपन कुशाग्र है,शार्प है,और विशाल जानकारियों का कोष हैं। इतना समझदार बचपन पहिले कभी नहीं था। श्रीवास्तव साहब ने बचपन का ध्यान कुछ ज्वलंत मुद्दों की ओर आकर्षित किया है,जैसे"हिदी भारत के कण कण में/हिंदी ही संपूर्ण वतन है। सब भाषायें बहनें बहनें हिंदी सबकी बड़ी बहिन है। "भाषा, धर्म,क्षेत्र को लेकर ही तो वितंडावाद खड़ा किया जाता है।

दयालजी ने विवादित मुद्दों को बड़ी शालीनता से अपने बालगीतों में प्रस्तुत किया है..हिंदु/मुस्लिम/ सिख/ईसाई रहते हैं सब मिलजुलकर। एक बेहतरीन उदाहरण फूल का है.."बड़े बड़े मंदिर समाधि/और देवों के सिर चढ़ते/धर्म भले लड़ते आपस में/फूल कभी न लड़ते/"कवि ने पुराना उदाहरण देकर चेतावनी दी है.. टुकड़ों टुकड़ों बटे देश पर/परदेशी क्यों छाये/इसी फूट के कारण वर्षों/ कब्जा रहे जमाये। "कवि ने भारत माता की सोंधी सोंधी गंध वाली मिट्टी की"मिट्टी" कविता में प्रशंसा की है। अंत में बचपन के हाथ में सितार देकर कहा है...बचपन गीत सुनाता चल/हँसता चल मुस्काता चल। ...मिले तिरंगे से संबल/एक झंडा फहराता चल। "भाषा भी बालोपयोगी सरस सुगम है।

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prabhudayal (Custom)

परिचय‌
पी. दयाल श्रीवास्तव  [प्रभुदयाल श्रीवास्तव]
जन्म      4 अगस्त 1944 धरमपुरा दमोह {म.प्र.]
शिक्षा वैद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि
व्यवसाय विद्युत मंडल की सेवा से सेवा निवृत कार्यपालन यंत्री
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख,        बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन
प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत, अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस, पंजाब केसरी, एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ। पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित।
कृतियां       1 दूसरी लाइन [व्यंग्य संग्रह]शैवाल प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित
            2 बचपन गीत सुनाता चल[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र
भोपाल से प्रकाशित
            3 बचपन छलके छल छल छल[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र
भोपाल से प्रकाशित
प्रकाशनाधीन  1 बिल क्लिंटन का नाम करण संस्कार[व्यंग्य संग्रह}शैवाल प्रकाशन
            2 शाला है अनमोल खजाना[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल
            3 बच्चे सरकार चलायेंगे[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण.....................
प्रसारण आकाशवाणी छिंदवाड़ा से बालगीतों,बुंदेली लघु कथाओं एवं जीवन वृत पर परिचर्चा का प्रसारण
सम्मान राष्ट्रीय राज भाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भारती रत्न "एवं "भारती भूषण सम्मान"
श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान वैदिक क्रांति देहरादून एवं हम सब साथ साथ पत्रिका दिल्ली
द्वारा "लाइफ एचीवमेंट एवार्ड"
भारतीय राष्ट्र भाषा सम्मेलन झाँसी द्वारा" हिंदी सेवी सम्मान"
शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम होशंगाबाद द्वारा"व्यंग्य वैभव सम्मान"
युग साहित्य मानस गुन्तकुल आंध्रप्रदेश द्वारा काव्य सम्मान
संबद्धता संस्थाओं के नाम अध्यक्ष बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल, छिंदवाड़ा जिला इकाई के अध्यक्ष
विशेष बुंदेली लोक गीत,गज़लें बुंदेली साहित्य पर लेख। वर्ष 2009 में साहित्य अकादमी दिल्ली में आयोजित बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल के कार्यक्रम में रवींद्र भवन दिल्ली में बुंदेली की दक्षिणी सीमाऐं विषय पर आलेख का पाठन।
संप्रति सेवा निवृत कार्यपालन यंत्री म. प्र.विद्युत मंडल छिंदवाड़ा से
संपर्क        12, शिवम सुंदरम नगर छिंदवाड़ा[ म.प्र.]480001
         Email ID- pdayal_shrivastava@yahoo.com

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