सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

संजय दानी की ग़ज़लें

sanjay dani

(1)

सर झुकाता ही नहीं हंगामे- इश्क़,
इसलिये सबसे उपर है नामे-इश्क़।

 
है नहीं सारा ज़माना रिंद पर,
कौन है जो ना पिया हो जामे-इश्क़।

 
इश्क़ में कुर्बानी पहली शर्त है,
इक ज़माने से यही अन्जामे-इश्क़।

 
दुश्मनों से भी गले दिल से मिलो,
सारी दुनिया को यही पैग़ामे-इश्क़।

 
फिर खड़ी है चौक पे वो बेवफ़ा,
फिर करेगी शहर में नीलामे-इश्क़।

 
जिसको पहले प्यार का गुल समझा था,
निकली अहले-शहर की गुलफ़ामे-इश्क़।

 
हुस्न के मंदिर में घुसने ना मिला,
ये अता है ये नहीं नाकामे-इश्क़।

 
बस तड़प बेचैनी रुसवाई यही,
मजनूं को है लैला का इनआमे-इश्क़।

 
तर-ब-तर हो जाता हूं बारिश में मैं,
दानी का बेसाया क्यूं है बामे-इश्क़।

हंगाम - समय। रिंद - शराबी। अहले-शहर - शहर वालों। अता - देन। बामेइश्क़ - इश्क़ का छत।

-----

(2)

इस भीड़ भरी ट्रेन में कोई नहीं मेरा,
तन्हाई के बिस्तर में तसव्वुर का बसेरा।

 
रफ़्तार बहुत तेज़ है बैठा भी न जाता,
मजबूरी के चादर में ग़मे-जिस्म लपेटा।

 
मुझको नहीं मालूम कहां है मेरी मन्ज़िल,
कब ये ख़ौफ़ज़दा रस्ता सख़ावत से हटेगा।

 

मैं एक नई नौकरी करने चला परदेश,
माज़ी के ग़मों का जहां होगा न बखेड़ा। 

 

मग़रूर था उस फ़ेक्टरी का दिल जहां था मैं,
सम्मान नये स्थान में महफ़ूज़ रहेगा।

 
हम नौकरों को झेलना ही पड़ता है ये सब,
मालिक के बराबर कहां ठहराव मिलेगा।

 
अपनों से विदा ले के चला हूं मैं सफ़र में,
अब हश्र तलक अपनों को ये दिल न दिखेगा।

 
सच्चाई दिखानी है वहां अपने ज़मीं की,
अब झूठ का दरिया वहां पानी भरेगा।

 
किस्मत का बदलना मेरे बस में नहीं दानी,
भगवान ही दानी की ख़ता माफ़ करेगा।

---

( सख़ावत- दानशीलता, माज़ी - बीता समय)

13 blogger-facebook:

  1. फिर खड़ी है चौक पे वो बेवफ़ा,
    फिर करेगी शहर में नीलामे-इश्क़।


    bahut sundar sanjay ji

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  2. संजय भाई इस ग़ज़ल का काफिया 'अ' तथा रदिफ़ 'ए' और 'आ' है ना? कृपया मुझे बताईएएगा ज़रूर! जानने की उत्सुकता है|

    मुझे आपकी इस ग़ज़ल के नौकरी, मालिक, झूठ का दरिया वाले मिसरे बहुत ही पसंद आए हैं| कृपया आपका उत्तर मुझे नोटिफाइ करें या मुझे navincchaturvedi@gmail.com ya navincchaturvedi@hotmail.com पर भेजें|

    उत्तर देंहटाएं
  3. लाजवाब गज़लें हैं संजय जी को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. नवीन जी काफिया तो आमे है और रदीफ इश्क ही रहेगा क्यों कि इश्क हिल नही रहा है। मुझे ऐसा लगता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदरणीय नवीन जी व आदरणीया निर्मला जी को सर्व प्रथम मेरा सलाम । नवीन जी आप शायद दूसरी ग़ज़ल की बात कर रहे हैं, पहली ग़ज़ल तो जैसे निर्मला जी ने लिखा है *इश्क़* रदीफ़ है उसके ठीक पहले वाले हुर्फ़ जुदा होकर भी तुकबंदी की इक ख़ास समानता से लबरेज़ हैं ( आम,बाम, नीलाम, पैग़ाम)ये सभी क़ाफ़िया के लंबरदार हैं। वहीं दूसरी ग़ज़ल ,कविता के अन्दाज़ से लिखी गई है,जो बिना रदीफ़ की है,जो मेरा , बसेरा , लपेटा , बख़ेड़ा जैसे शब्दों के क़ाफ़ियों साथ यानी 122 के संयोजन में *आ* यानि *अलिफ़* की क़ैद में हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. Sanjay ji apki gazlein behad khoobsoorat hein

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर ग़ज़ल... ग़ज़ल की तकनीक तो नहीं जानता लेकिन बात अच्छी लगी...

    उत्तर देंहटाएं
  8. निर्मला जी आपके उत्तर के लिए आभार| संजय जी मेरा अभिप्राय समझ गये, मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया|

    आप दोनो से प्रार्थना है स्नेह बनाए रखिएगा|
    कृपया मेरा ब्लॉग भी जोइन करने की कृपा करें |
    http://thalebaithe.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. एकता नाहर जी ,अरुण सी राय जी व भारतीय नागरिक के आक़ा जी को धन्यवाद उनकी टिप्पणियों के लिये। Indian citizen जी को ज़ियादा धन्यवाद उनने दोनों रचनाओं में बिल्कुल क्लियर टिप्पणी की है। सर जी दूसरी रचना में प्रिथ्वी लोक से परलोक जाने वाले एक युवक के ख़ुशियों कि बयानी है। ट्रेन और सफ़र को बिम्ब के रूप में उपयोग किया गया है, नये फ़ेक्टरी का मालिक ईश्वर है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. hamesha ki tarah bahoot hi umda ghazals.Pl.badhai swikaar karen.

    उत्तर देंहटाएं
  11. सच्चाई दिखानी है वहां अपनी ज़मीं की,
    अब झूठ का दरिया वहां पानी भरेगा।

    गहरे अर्थों वाली खू़बसूरत ग़ज़लें...बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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