सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल

sanjay dani

दिल के घर में हर तरफ़ दीवार है,
जो अहम के कीलों से गुलज़ार है।

 
तौल कर रिश्ते निभाये जाते यहां,
घर के कोने कोने में बज़ार है।

 
अब सुकूं की कश्तियां मिलती नहीं,
बस हवस के बाहों में पतवार है।

 
ख़ून से लबरेज़ है आंगन का मन,
दुश्मनों सा हर गली का यार है।

 
थम चुके विश्वास के पंखे यहां,
धोखेबाज़ी आंखों का श्रृंगार है।

 
ज़ुल्म के तूफ़ानों से कमरा भरा,
सिसकियां ही ख़ुशियों का आधार है।

 
हंस रहा है लालची बैठका का फ़र्श,
कुर्सियों की सोच में हथियार है।

 
मुल्क का फ़ानूस गिरने वाला है,
हां सियासत की फ़िज़ा गद्दार है।

 
सर के बालों की चमक बढ़ने लगी,
पेट की थाली में भ्रष्टाचार है।

 
न्याय की छत की छड़ें जर्जर हुईं,
चंद सिक्कों पे टिका संसार है।

 
टूटी हैं दानी मदद की खिड़कियां,
दरे-दिल को आंसुओं से प्यार है।

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7 blogger-facebook:

  1. दिल के घर में हर तरफ दीवार है,
    जो अहम के कीलों से गुलजार है
    और
    तौल कर रिश्ते निभाये जाते यहां,
    घर के कोने कोने में बज़ार है।
    यथार्थ का चित्रण करते नायाब शे‘र,
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल ...बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. तौल कर रिश्ते निभाये जाते यहां,
    घर के कोने कोने में बज़ार है।

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. Ha!siyasat ki fiza gaddar hai.
    mukkamal ghazal.badai ho.

    उत्तर देंहटाएं
  4. GAZAL UMDA HAI MATALE KE DOOSARE MISHARE MEN VYAKARNIT (LINGIYE)DOSH LAGATA HAI

    उत्तर देंहटाएं
  5. वर्मा जी ,सदा जी,विजय वर्मा जी व दामोदर जी का उनकी टिप्पणियों के लिये शुक्रिया ।दामोदर जी आप कौन से वाक्य में व्याकरण दोष की बात कर रहे हैं मै समझ नहीं पा रहा हूं। हां दूसरे मिसरे की दूसरी पंक्ति में एक मिस प्रिन्ट है "बज़ार" ,सही शब्द है "बाज़ार" इस ग़लती को मैं अब चाह कर भी सुधार नहीं पा रहा हूं। मुस्तक़बिल में भी आप मेरी कमियों को उजागर करेंगे तो मैं आप का मुसलसल आभारी रहूंगा, धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  6. gajal ki har panktl pankh pasaare hai,
    padh kar na bhula dena, dil de kune men saja dena
    bas yahi hai mera kahana ! a heart touching poem. badhaai

    उत्तर देंहटाएं
  7. घर के कोने कोने में बज़ार है।
    धोखेबाज़ी आंखों का श्रृंगार है।
    पेट की थाली में भ्रष्टाचार है।

    भाई संजय दानी जी, आप की ग़ज़ल बरबस ही ध्यानाकर्षित करती हैं| आगे भी ऐसे और भी मौके दीजिएगा|

    उत्तर देंहटाएं

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