शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

मंजरी शुक्ल की कविता - जोकर

manjari shukla (Custom)

मैंने कल इक शादी में

मोटा सा एक जोकर देखा

हँसते चेहरे पर उसके

ढेर पावडर पोते देखा

उसे देख दौड़ते बच्चे

हँसते और मचलते बच्चे

प्यार से उसके पास जाते

हाथ मिला खुश हो जाते

जहाँ कही भी वो जाता

हर चेहरा खिल जाता

मोटा पेट जब उसका हिलता

बूढों का भी दिल खिलता

फिर एक कोने में दिखा वो

बहते आंसू हुआ पोंछता

दूर कही इस भीड़ से

तन्हाई में कुछ सोचता

कहता जाता था खुद से

भूखा हूँ मैं दिनभर से

नकली हंसी रहा हँसता

दुःख मेरा है सबसे सस्ता

सबके हाथ में थाली है

पर मेरा पेट खाली है

बच्चे राह तकते होंगे

हर आहट पे जगते होंगे

भूखे पेट सोएंगे कैसे

सूखे आंसूं रोयेंगे कैसे

हँसता हूँ मैं सबके आगे

रातों को में रोता हूँ

दिन रात हूँ मेहनत करता

ख्वाबों में ही सोता हूँ

अमीरों के बच्चों को मैं

गुदगुदाकर हँसाता हूँ

अपने ही बच्चों को रोज

खाली पेट सुलाता हूँ

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6 blogger-facebook:

  1. hum sab bhi jokar hi hain, fark sirf make-up ka hai

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच्चाई के साथ एक मार्मिक कविता ,बहुत बढिया

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप तो हमेशा ही अच्छा लिखती है

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छी कविता, जोकर तो इक प्रतीक है,हर छोटे व ग़रीब कर्मचारी के साथ कमो-बेश ये बात जुड़ी हुई है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. vichitr hain dastoor duniyan ke... bhare pet ko khilate hain, hanste ko hansate hai lekin bhooke ko khilane wale ya rote-sisakte ko hansa de jo vo jaane kahan hain... joker to hum sabhi hai...

    उत्तर देंहटाएं
  6. "अमीरों के बच्चों को मैं
    गुदगुदाकर हँसाता हूँ
    अपने ही बच्चों को रोज
    खाली पेट सुलाता हूँ"
    जिंदगी की असलियत कुछ और ही होती है , अच्छी रचना के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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